जंगल
#जंगल
मैंने कहा था स्पेयर टायर चेक करवा लेना निकलने से पहले, लेकिन तुम को तो बस हर बात मज़ाक लगती है। सुदीप ने गुस्से में झुंझलाते हुए रवि से कहा। उफ्फ नेटवर्क भी नहीं है मोबाइल में और इस घने जंगल में कोई दिख भी नहीं रहा।
🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲🌲
नहीं छोड़ना चाहता था।"
"पर तुमने छोड़ा," रवि ने कहा, उसकी आवाज़ में एक तीखी धार थी। "तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया। उस अँधेरे में। उस खाली कमरे में। तुम्हें लगता है मुझे वह रात भूल गई?"
"मुझे पता है," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी लाचारी थी। "मुझे पता है कि मैंने तुम्हें चोट पहुँचाई है। और मैं उसके लिए माफी चाहता हूँ। मैं तुम्हें फिर से चोट नहीं पहुँचाऊँगा। मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।"
"तो क्या तुम मुझे यहाँ हमेशा के लिए रखना चाहते हो?" रवि ने पूछा, उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी चुनौती थी। "इस जंगल में? इस गाड़ी में? जब तक हम मर नहीं जाते?"
"अगर तुम चाहो," सुदीप ने कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। "मैं तुम्हारे साथ यहाँ हमेशा के लिए रह सकता हूँ। हम एक-दूसरे के लिए काफी हैं। हमें किसी और की ज़रूरत नहीं है।"
रवि ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह सुदीप के शब्दों का मतलब समझने की कोशिश कर रहा हो। "तुम्हें लगता है कि यह सब सच है?"
"हाँ," सुदीप ने फुसफुसाया। "यह सब सच है। तुम मेरे हो। हमेशा से। और मैं तुम्हें कभी नहीं जाने दूँगा।"
उनकी साँसें फिर से तेज़ हो गईं, और उनके हाथ एक-दूसरे के कपड़ों में उलझ गए। बाहर जंगल की आवाज़ें और तेज़ हो गईं, जैसे वे उनकी दुनिया को निगलने को तैयार हों। पर अंदर, उनकी दुनिया सिमट कर रह गई थी, जहाँ सिर्फ वे दोनों थे, उनकी इच्छाएँ, उनके डर, और उनका प्यार।
"तुम्हें याद है," रवि ने सुदीप के होंठों को थोड़ा अलग करते हुए फुसफुसाया, उसकी साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं। "जब हम पहली बार इस जंगल से गुज़रे थे? तुमने कहा था कि यह जगह भूतों की है। कि यहाँ कोई आत्मा भटकती है, जो प्यार करने वालों को अपनी ओर खींच लेती है।"
"हाँ," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हँसी थी। "मुझे लगता है कि वह आत्मा हमें खींच रही है। हमें अपने पास बुला रही है।" उसने रवि के गाल पर अपना माथा टिका दिया। "तुम्हें डर नहीं लग रहा?"
"अब नहीं," रवि ने फुसफुसाया। "अब मुझे किसी चीज़ से डर नहीं लग रहा। बस तुमसे डर लगता है। कि तुम मुझे फिर से छोड़ दोगे।"
"मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा," सुदीप ने कहा, उसके शब्द एक प्रतिज्ञा की तरह थे। "हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा। इस जंगल में, या कहीं भी।" उसने रवि को अपनी ओर और खींचा, उनकी साँसें एक-दूसरे में घुल गईं। "तुम्हें याद है, हमारी शादी की रात? तुमने कहा था कि तुम मेरे साथ अपनी पूरी ज़िंदगी बिताना चाहते हो। कि तुम मेरे बिना नहीं रह सकते।"
"हाँ, कहा था," रवि ने फुसफुसाया, उसकी उँगलियाँ सुदीप की पीठ पर धीरे-धीरे सरक रही थीं। "और तुमने भी कहा था कि तुम मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ोगे। तुमने कहा था कि तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे, चाहे कुछ भी हो जाए।"
"और मैं हूँ ना, तुम्हारे साथ?" सुदीप ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जीत थी। "हम यहाँ फँसे हैं, और मैं तुम्हारे साथ हूँ। हम अकेले हैं, और मैं तुम्हारे साथ हूँ।" उसने रवि के कान में फुसफुसाया, "तुम्हें लगता है कि यह सब बस एक इत्तेफाक है?"
रवि ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह सुदीप के शब्दों का मतलब समझने की कोशिश कर रहा हो। "तुम क्या कहना चाहते हो, सुदीप?"
"मैं कहना चाहता हूँ कि यह सब होना ही था," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गहराई थी। "हमें यहाँ फँसना ही था। हमें अकेले होना ही था। ताकि हम एक-दूसरे को फिर से पा सकें। ताकि हम अपनी पुरानी बातों को भूल सकें। ताकि हम एक नई शुरुआत कर सकें।"
"एक नई शुरुआत?" रवि ने एक बेतरतीब हँसी हँसी। "तुम्हें लगता है कि हम एक नई शुरुआत कर सकते हैं, जब हम जंगल के बीच में फँसे हैं, जहाँ कोई नेटवर्क नहीं है, कोई मदद नहीं है, और रात हो रही है? तुम्हें लगता है कि यह सब बस एक 'नई शुरुआत' है?"
"हाँ," सुदीप ने कहा, उसकी आँखें रवि की आँखों में गहराई से झाँक रही थीं। "यह एक नई शुरुआत है। एक ऐसी शुरुआत जहाँ हम सिर्फ एक-दूसरे के लिए हैं। जहाँ हमें कोई और नहीं देख रहा। जहाँ हमें कोई और नहीं सुन रहा।" उसने रवि के बालों में अपनी उँगलियाँ फँसाईं और उसके सिर को धीरे से पीछे धकेला, ताकि वह उसके चेहरे को देख सके। "तुम्हें याद है, तुमने हमेशा कहा था कि तुम्हें आज़ादी चाहिए? तुम्हें लगता है कि यह आज़ादी नहीं है? इस जंगल में, जहाँ हम अकेले हैं, हम जो चाहें कर सकते हैं।"
रवि ने एक गहरी साँस ली, उसकी नज़रें सुदीप की आँखों में टिकी थीं। "तुम क्या करना चाहते हो, सुदीप?"
"जो हम हमेशा से करना चाहते थे," सुदीप ने फुसफुसाया, और उसके होंठ एक बार फिर रवि के होंठों से मिल गए। इस बार उनकी किस में एक अजीब सी बेचैनी थी, एक भूख थी जो उनकी आत्माओं को जला रही थी। उनके हाथ एक-दूसरे के कपड़ों में उलझ गए, और गाड़ी का छोटा सा केबिन उनकी साँसों और धड़कनों से भर गया।
"तुम्हें याद है," रवि ने सुदीप के होंठों से खुद को अलग करते हुए फुसफुसाया, उसकी साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं, "जब हम पहली बार मिले थे? तुमने कहा था कि तुम्हारी आँखें मुझे कहीं और ले जाएँगी, जहाँ कोई और नहीं जा सकता।"
"और ले आया ना?" सुदीप ने रवि के बालों को सहलाते हुए कहा। "तुम्हें लगता है कि यह सब किस्मत थी? या कुछ और?"
रवि ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी। "मुझे लगता है कि यह सब तुम्हारी चालाकी थी। तुमने मुझे यहाँ फँसाया है, है ना?"
"चालाकी नहीं, प्यार," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गहराई थी। "मैं तुम्हें अपने पास रखना चाहता था। हमेशा।" उसने रवि के गाल पर अपनी उँगली फेरते हुए कहा, "तुम्हें याद है, उस रात को? जब हम पहली बार... जब मैंने तुम्हें छुआ था? तुमने कहा था कि तुम्हें डर लग रहा है, पर तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही थीं।"
"मेरी आँखें हमेशा सच बोलती हैं," रवि ने फुसफुसाया। "और तुम्हारी आँखें... तुम्हारी आँखें मुझे आज भी डराती हैं।"
"क्यों?" सुदीप ने पूछा, उसके होंठ रवि के कान के पास थे। "तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें चोट पहुँचाऊँगा?"
"नहीं," रवि ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कमज़ोरी थी। "मुझे लगता है कि तुम मुझे ऐसा बना दोगे कि मैं तुम्हारे बिना रह नहीं पाऊँगा। मुझे लगता है कि तुम मुझे अपनी मुट्ठी में बंद कर लोगे।"
"और क्या गलत है उसमें?" सुदीप ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जीत थी। "तुम मेरी मुट्ठी में सुरक्षित रहोगे। इस जंगल में, जहाँ तुम्हें कोई नहीं देख रहा, कोई नहीं सुन रहा, तुम मेरे हो। सिर्फ मेरे।"
बाहर हवा तेज़ी से चल रही थी, और पेड़ों की पत्तियाँ एक अजीब सी धुन में सरसराहट कर रही थीं। कभी-कभी कोई टहनी टूट कर गिरती, और उसकी आवाज़ जंगल की खामोशी में गूँज उठती। गाड़ी के अंदर, उनकी दुनिया सिमट कर रह गई थी।
"तुम्हें याद है, उस दिन?" रवि ने पूछा, उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी उदासी थी। "जब तुमने कहा था कि तुम मुझे छोड़ कर जा रहे हो? तुमने कहा था कि तुम मुझसे ऊब गए हो। कि तुम्हें कुछ और चाहिए।"
सुदीप का चेहरा तना हुआ। "मैंने ऐसा कभी नहीं कहा था, रवि। मैंने कहा था कि मैं काम से जा रहा हूँ। मैंने कहा था कि मुझे कुछ समय के लिए दूर रहना होगा। तुमने गलत समझा।"
"मैंने गलत समझा?" रवि ने हँसते हुए कहा, पर उसकी हँसी में कोई खुशी नहीं थी। "मैंने देखा था तुम्हें, उस लड़की के साथ। तुमने सोचा था कि मुझे पता नहीं चलेगा? तुमने सोचा था कि मैं अंधा हूँ?"
सुदीप ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे उसे रवि की बात से चोट पहुँची हो। "वह... वह कुछ नहीं था, रवि। वह बस एक गलती थी। एक ऐसी गलती जिसे मैं सुधारना चाहता हूँ। मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ना चाहता था।"
"पर तुमने छोड़ा," रवि ने कहा, उसकी आवाज़ में एक तीखी धार थी। "तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया। उस अँधेरे में। उस खाली कमरे में। तुम्हें लगता है मुझे वह रात भूल गई?"
"मुझे पता है," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी लाचारी थी। "मुझे पता है कि मैंने तुम्हें चोट पहुँचाई है। और मैं उसके लिए माफी चाहता हूँ। मैं तुम्हें फिर से चोट नहीं पहुँचाऊँगा। मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।"
"तो क्या तुम मुझे यहाँ हमेशा के लिए रखना चाहते हो?" रवि ने पूछा, उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी चुनौती थी। "इस जंगल में? इस गाड़ी में? जब तक हम मर नहीं जाते?"
"अगर तुम चाहो," सुदीप ने कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। "मैं तुम्हारे साथ यहाँ हमेशा के लिए रह सकता हूँ। हम एक-दूसरे के लिए काफी हैं। हमें किसी और की ज़रूरत नहीं है।"
रवि ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह सुदीप के शब्दों का मतलब समझने की कोशिश कर रहा हो। "तुम्हें लगता है कि यह सब सच है?"
"हाँ," सुदीप ने फुसफुसाया। "यह सब सच है। तुम मेरे हो। हमेशा से। और मैं तुम्हें कभी नहीं जाने दूँगा।"
उनकी साँसें फिर से तेज़ हो गईं, और उनके हाथ एक-दूसरे के कपड़ों में उलझ गए। बाहर जंगल की आवाज़ें और तेज़ हो गईं, जैसे वे उनकी दुनिया को निगलने को तैयार हों। पर अंदर, उनकी दुनिया सिमट कर रह गई थी, जहाँ सिर्फ वे दोनों थे, उनकी इच्छाएँ, उनके डर, और उनका प्यार।
"तुम्हें याद है," रवि ने सुदीप के होंठों को थोड़ा अलग करते हुए फुसफुसाया, उसकी साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं। "जब हम पहली बार इस जंगल से गुज़रे थे? तुमने कहा था कि यह जगह भूतों की है। कि यहाँ कोई आत्मा भटकती है, जो प्यार करने वालों को अपनी ओर खींच लेती है।"
"हाँ," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हँसी थी। "मुझे लगता है कि वह आत्मा हमें खींच रही है। हमें अपने पास बुला रही है।" उसने रवि के गाल पर अपना माथा टिका दिया। "तुम्हें डर नहीं लग रहा?"
"अब नहीं," रवि ने फुसफुसाया। "अब मुझे किसी चीज़ से डर नहीं लग रहा। बस तुमसे डर लगता है। कि तुम मुझे फिर से छोड़ दोगे।"
"मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा," सुदीप ने कहा, उसके शब्द एक प्रतिज्ञा की तरह थे। "हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा। इस जंगल में, या कहीं भी।" उसने रवि को अपनी ओर और खींचा, उनकी साँसें एक-दूसरे में घुल गईं। "तुम्हें याद है, हमारी शादी की रात? तुमने कहा था कि तुम मेरे साथ अपनी पूरी ज़िंदगी बिताना चाहते हो। कि तुम मेरे बिना नहीं रह सकते।"
"हाँ, कहा था," रवि ने फुसफुसाया, उसकी उँगलियाँ सुदीप की पीठ पर धीरे-धीरे सरक रही थीं। "और तुमने भी कहा था कि तुम मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ोगे। तुमने कहा था कि तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे, चाहे कुछ भी हो जाए।"
"और मैं हूँ ना, तुम्हारे साथ?" सुदीप ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जीत थी। "हम यहाँ फँसे हैं, और मैं तुम्हारे साथ हूँ। हम अकेले हैं, और मैं तुम्हारे साथ हूँ।" उसने रवि के कान में फुसफुसाया, "तुम्हें लगता है कि यह सब बस एक इत्तेफाक है?"
रवि ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह सुदीप के शब्दों का मतलब समझने की कोशिश कर रहा हो। "तुम क्या कहना चाहते हो, सुदीप?"
"मैं कहना चाहता हूँ कि यह सब होना ही था," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गहराई थी। "हमें यहाँ फँसना ही था। हमें अकेले होना ही था। ताकि हम एक-दूसरे को फिर से पा सकें। ताकि हम अपनी पुरानी बातों को भूल सकें। ताकि हम एक नई शुरुआत कर सकें।"
"एक नई शुरुआत?" रवि ने एक बेतरतीब हँसी हँसी। "तुम्हें लगता है कि हम एक नई शुरुआत कर सकते हैं, जब हम जंगल के बीच में फँसे हैं, जहाँ कोई नेटवर्क नहीं है, कोई मदद नहीं है, और रात हो रही है? तुम्हें लगता है कि यह सब बस एक 'नई शुरुआत' है?"
"हाँ," सुदीप ने कहा, उसकी आँखें रवि की आँखों में गहराई से झाँक रही थीं। "यह एक नई शुरुआत है। एक ऐसी शुरुआत जहाँ हम सिर्फ एक-दूसरे के लिए हैं। जहाँ हमें कोई और नहीं देख रहा। जहाँ हमें कोई और नहीं सुन रहा।" उसने रवि के बालों में अपनी उँगलियाँ फँसाईं और उसके सिर को धीरे से पीछे धकेला, ताकि वह उसके चेहरे को देख सके। "तुम्हें याद है, तुमने हमेशा कहा था कि तुम्हें आज़ादी चाहिए? तुम्हें लगता है कि यह आज़ादी नहीं है? इस जंगल में, जहाँ हम अकेले हैं, हम जो चाहें कर सकते हैं।"
रवि ने एक गहरी साँस ली, उसकी नज़रें सुदीप की आँखों में टिकी थीं। "तुम क्या करना चाहते हो, सुदीप?"
"जो हम हमेशा से करना चाहते थे," सुदीप ने फुसफुसाया, और उसके होंठ एक बार फिर रवि के होंठों से मिल गए। इस बार उनकी किस में एक अजीब सी बेचैनी थी, एक भूख थी जो उनकी आत्माओं को जला रही थी। उनके हाथ एक-दूसरे के कपड़ों में उलझ गए, और गाड़ी का छोटा सा केबिन उनकी साँसों और धड़कनों से भर गया।
"तुम्हें याद है," रवि ने सुदीप के होंठों से खुद को अलग करते हुए फुसफुसाया, उसकी साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं, "जब हम पहली बार मिले थे? तुमने कहा था कि तुम्हारी आँखें मुझे कहीं और ले जाएँगी, जहाँ कोई और नहीं जा सकता।"
"और ले आया ना?" सुदीप ने रवि के बालों को सहलाते हुए कहा। "तुम्हें लगता है कि यह सब किस्मत थी? या कुछ और?"
रवि ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी। "मुझे लगता है कि यह सब तुम्हारी चालाकी थी। तुमने मुझे यहाँ फँसाया है, है ना?"
"चालाकी नहीं, प्यार," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गहराई थी। "मैं तुम्हें अपने पास रखना चाहता था। हमेशा।" उसने रवि के गाल पर अपनी उँगली फेरते हुए कहा, "तुम्हें याद है, उस रात को? जब हम पहली बार... जब मैंने तुम्हें छुआ था? तुमने कहा था कि तुम्हें डर लग रहा है, पर तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही थीं।"
"मेरी आँखें हमेशा सच बोलती हैं," रवि ने फुसफुसाया। "और तुम्हारी आँखें... तुम्हारी आँखें मुझे आज भी डराती हैं।"
"क्यों?" सुदीप ने पूछा, उसके होंठ रवि के कान के पास थे। "तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें चोट पहुँचाऊँगा?"
"नहीं," रवि ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कमज़ोरी थी। "मुझे लगता है कि तुम मुझे ऐसा बना दोगे कि मैं तुम्हारे बिना रह नहीं पाऊँगा। मुझे लगता है कि तुम मुझे अपनी मुट्ठी में बंद कर लोगे।"
"और क्या गलत है उसमें?" सुदीप ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जीत थी। "तुम मेरी मुट्ठी में सुरक्षित रहोगे। इस जंगल में, जहाँ तुम्हें कोई नहीं देख रहा, कोई नहीं सुन रहा, तुम मेरे हो। सिर्फ मेरे।"
बाहर हवा तेज़ी से चल रही थी, और पेड़ों की पत्तियाँ एक अजीब सी धुन में सरसराहट कर रही थीं। कभी-कभी कोई टहनी टूट कर गिरती, और उसकी आवाज़ जंगल की खामोशी में गूँज उठती। गाड़ी के अंदर, उनकी दुनिया सिमट कर रह गई थी।
"तुम्हें याद है, उस दिन?" रवि ने पूछा, उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी उदासी थी। "जब तुमने कहा था कि तुम मुझे छोड़ कर जा रहे हो? तुमने कहा था कि तुम मुझसे ऊब गए हो। कि तुम्हें कुछ और चाहिए।"
सुदीप का चेहरा तना हुआ। "मैंने ऐसा कभी नहीं कहा था, रवि। मैंने कहा था कि मैं काम से जा रहा हूँ। मैंने कहा था कि मुझे कुछ समय के लिए दूर रहना होगा। तुमने गलत समझा।"
"मैंने गलत समझा?" रवि ने हँसते हुए कहा, पर उसकी हँसी में कोई खुशी नहीं थी। "मैंने देखा था तुम्हें, उस लड़की के साथ। तुमने सोचा था कि मुझे पता नहीं चलेगा? तुमने सोचा था कि मैं अंधा हूँ?"
सुदीप ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे उसे रवि की बात से चोट पहुँची हो। "वह... वह कुछ नहीं था, रवि। वह बस एक गलती थी। एक ऐसी गलती जिसे मैं सुधारना चाहता हूँ। मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ना चाहता था।"
"पर तुमने छोड़ा," रवि ने कहा, उसकी आवाज़ में एक तीखी धार थी। "तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया। उस अँधेरे में। उस खाली कमरे में। तुम्हें लगता है मुझे वह रात भूल गई?"
"मुझे पता है," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी लाचारी थी। "मुझे पता है कि मैंने तुम्हें चोट पहुँचाई है। और मैं उसके लिए माफी चाहता हूँ। मैं तुम्हें फिर से चोट नहीं पहुँचाऊँगा। मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।"
"तो क्या तुम मुझे यहाँ हमेशा के लिए रखना चाहते हो?" रवि ने पूछा, उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी चुनौती थी। "इस जंगल में? इस गाड़ी में? जब तक हम मर नहीं जाते?"
"अगर तुम चाहो," सुदीप ने कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। "मैं तुम्हारे साथ यहाँ हमेशा के लिए रह सकता हूँ। हम एक-दूसरे के लिए काफी हैं। हमें किसी और की ज़रूरत नहीं है।"
रवि ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह सुदीप के शब्दों का मतलब समझने की कोशिश कर रहा हो। "तुम्हें लगता है कि यह सब सच है?"
"हाँ," सुदीप ने फुसफुसाया। "यह सब सच है। तुम मेरे हो। हमेशा से। और मैं तुम्हें कभी नहीं जाने दूँगा।"
उनकी साँसें फिर से तेज़ हो गईं, और उनके हाथ एक-दूसरे के कपड़ों में उलझ गए। बाहर जंगल की आवाज़ें और तेज़ हो गईं, जैसे वे उनकी दुनिया को निगलने को तैयार हों। पर अंदर, उनकी दुनिया सिमट कर रह गई थी, जहाँ सिर्फ वे दोनों थे, उनकी इच्छाएँ, उनके डर, और उनका प्यार।
"तुम्हें याद है," रवि ने सुदीप के होंठों को थोड़ा अलग करते हुए फुसफुसाया, उसकी साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं। "जब हम पहली बार इस जंगल से गुज़रे थे? तुमने कहा था कि यह जगह भूतों की है। कि यहाँ कोई आत्मा भटकती है, जो प्यार करने वालों को अपनी ओर खींच लेती है।"
"हाँ," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी हँसी थी। "मुझे लगता है कि वह आत्मा हमें खींच रही है। हमें अपने पास बुला रही है।" उसने रवि के गाल पर अपना माथा टिका दिया। "तुम्हें डर नहीं लग रहा?"
"अब नहीं," रवि ने फुसफुसाया। "अब मुझे किसी चीज़ से डर नहीं लग रहा। बस तुमसे डर लगता है। कि तुम मुझे फिर से छोड़ दोगे।"
"मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूँगा," सुदीप ने कहा, उसके शब्द एक प्रतिज्ञा की तरह थे। "हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा। इस जंगल में, या कहीं भी।" उसने रवि को अपनी ओर और खींचा, उनकी साँसें एक-दूसरे में घुल गईं। "तुम्हें याद है, हमारी शादी की रात? तुमने कहा था कि तुम मेरे साथ अपनी पूरी ज़िंदगी बिताना चाहते हो। कि तुम मेरे बिना नहीं रह सकते।"
"हाँ, कहा था," रवि ने फुसफुसाया, उसकी उँगलियाँ सुदीप की पीठ पर धीरे-धीरे सरक रही थीं। "और तुमने भी कहा था कि तुम मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ोगे। तुमने कहा था कि तुम हमेशा मेरे साथ रहोगे, चाहे कुछ भी हो जाए।"
"और मैं हूँ ना, तुम्हारे साथ?" सुदीप ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जीत थी। "हम यहाँ फँसे हैं, और मैं तुम्हारे साथ हूँ। हम अकेले हैं, और मैं तुम्हारे साथ हूँ।" उसने रवि के कान में फुसफुसाया, "तुम्हें लगता है कि यह सब बस एक इत्तेफाक है?"
रवि ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह सुदीप के शब्दों का मतलब समझने की कोशिश कर रहा हो। "तुम क्या कहना चाहते हो, सुदीप?"
"मैं कहना चाहता हूँ कि यह सब होना ही था," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गहराई थी। "हमें यहाँ फँसना ही था। हमें अकेले होना ही था। ताकि हम एक-दूसरे को फिर से पा सकें। ताकि हम अपनी पुरानी बातों को भूल सकें। ताकि हम एक नई शुरुआत कर सकें।"
"एक नई शुरुआत?" रवि ने एक बेतरतीब हँसी हँसी। "तुम्हें लगता है कि हम एक नई शुरुआत कर सकते हैं, जब हम जंगल के बीच में फँसे हैं, जहाँ कोई नेटवर्क नहीं है, कोई मदद नहीं है, और रात हो रही है? तुम्हें लगता है कि यह सब बस एक 'नई शुरुआत' है?"
"हाँ," सुदीप ने कहा, उसकी आँखें रवि की आँखों में गहराई से झाँक रही थीं। "यह एक नई शुरुआत है। एक ऐसी शुरुआत जहाँ हम सिर्फ एक-दूसरे के लिए हैं। जहाँ हमें कोई और नहीं देख रहा। जहाँ हमें कोई और नहीं सुन रहा।" उसने रवि के बालों में अपनी उँगलियाँ फँसाईं और उसके सिर को धीरे से पीछे धकेला, ताकि वह उसके चेहरे को देख सके। "तुम्हें याद है, तुमने हमेशा कहा था कि तुम्हें आज़ादी चाहिए? तुम्हें लगता है कि यह आज़ादी नहीं है? इस जंगल में, जहाँ हम अकेले हैं, हम जो चाहें कर सकते हैं।"
रवि ने एक गहरी साँस ली, उसकी नज़रें सुदीप की आँखों में टिकी थीं। "तुम क्या करना चाहते हो, सुदीप?"
"जो हम हमेशा से करना चाहते थे," सुदीप ने फुसफुसाया, और उसके होंठ एक बार फिर रवि के होंठों से मिल गए। इस बार उनकी किस में एक अजीब सी बेचैनी थी, एक भूख थी जो उनकी आत्माओं को जला रही थी। उनके हाथ एक-दूसरे के कपड़ों में उलझ गए, और गाड़ी का छोटा सा केबिन उनकी साँसों और धड़कनों से भर गया।
"तुम्हें याद है," रवि ने सुदीप के होंठों से खुद को अलग करते हुए फुसफुसाया, उसकी साँसें अभी भी तेज़ी से चल रही थीं, "जब हम पहली बार मिले थे? तुमने कहा था कि तुम्हारी आँखें मुझे कहीं और ले जाएँगी, जहाँ कोई और नहीं जा सकता।"
"और ले आया ना?" सुदीप ने रवि के बालों को सहलाते हुए कहा। "तुम्हें लगता है कि यह सब किस्मत थी? या कुछ और?"
रवि ने अपनी आँखें बंद कर लीं, उसके होंठों पर एक हल्की सी मुस्कान थी। "मुझे लगता है कि यह सब तुम्हारी चालाकी थी। तुमने मुझे यहाँ फँसाया है, है ना?"
"चालाकी नहीं, प्यार," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गहराई थी। "मैं तुम्हें अपने पास रखना चाहता था। हमेशा।" उसने रवि के गाल पर अपनी उँगली फेरते हुए कहा, "तुम्हें याद है, उस रात को? जब हम पहली बार... जब मैंने तुम्हें छुआ था? तुमने कहा था कि तुम्हें डर लग रहा है, पर तुम्हारी आँखें कुछ और कह रही थीं."
"मेरी आँखें हमेशा सच बोलती हैं," रवि ने फुसफुसाया। "और तुम्हारी आँखें... तुम्हारी आँखें मुझे आज भी डराती हैं।"
"क्यों?" सुदीप ने पूछा, उसके होंठ रवि के कान के पास थे। "तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हें चोट पहुँचाऊँगा?"
"नहीं," रवि ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी कमज़ोरी थी। "मुझे लगता है कि तुम मुझे ऐसा बना दोगे कि मैं तुम्हारे बिना रह नहीं पाऊँगा। मुझे लगता है कि तुम मुझे अपनी मुट्ठी में बंद कर लोगे।"
"और क्या गलत है उसमें?" सुदीप ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी जीत थी। "तुम मेरी मुट्ठी में सुरक्षित रहोगे। इस जंगल में, जहाँ तुम्हें कोई नहीं देख रहा, कोई नहीं सुन रहा, तुम मेरे हो। सिर्फ मेरे।"
बाहर हवा तेज़ी से चल रही थी, और पेड़ों की पत्तियाँ एक अजीब सी धुन में सरसराहट कर रही थीं। कभी-कभी कोई टहनी टूट कर गिरती, और उसकी आवाज़ जंगल की खामोशी में गूँज उठती। गाड़ी के अंदर, उनकी दुनिया सिमट कर रह गई थी।
"तुम्हें याद है, उस दिन?" रवि ने पूछा, उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी उदासी थी। "जब तुमने कहा था कि तुम मुझे छोड़ कर जा रहे हो? तुमने कहा था कि तुम मुझसे ऊब गए हो। कि तुम्हें कुछ और चाहिए।"
सुदीप का चेहरा तना हुआ। "मैंने ऐसा कभी नहीं कहा था, रवि। मैंने कहा था कि मैं काम से जा रहा हूँ। मैंने कहा था कि मुझे कुछ समय के लिए दूर रहना होगा। तुमने गलत समझा।"
"मैंने गलत समझा?" रवि ने हँसते हुए कहा, पर उसकी हँसी में कोई खुशी नहीं थी। "मैंने देखा था तुम्हें, उस लड़की के साथ। तुमने सोचा था कि मुझे पता नहीं चलेगा? तुमने सोचा था कि मैं अंधा हूँ?"
सुदीप ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे उसे रवि की बात से चोट पहुँची हो। "वह... वह कुछ नहीं था, रवि। वह बस एक गलती थी। एक ऐसी गलती जिसे मैं सुधारना चाहता हूँ। मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ना चाहता था।"
"पर तुमने छोड़ा," रवि ने कहा, उसकी आवाज़ में एक तीखी धार थी। "तुमने मुझे अकेला छोड़ दिया। उस अँधेरे में। उस खाली कमरे में। तुम्हें लगता है मुझे वह रात भूल गई?"
"मुझे पता है," सुदीप ने कहा, उसकी आवाज़ में एक अजीब सी लाचारी थी। "मुझे पता है कि मैंने तुम्हें चोट पहुँचाई है। और मैं उसके लिए माफी चाहता हूँ। मैं तुम्हें फिर से चोट नहीं पहुँचाऊँगा। मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।"
"तो क्या तुम मुझे यहाँ हमेशा के लिए रखना चाहते हो?" रवि ने पूछा, उसकी आवाज़ में अब एक अजीब सी चुनौती थी। "इस जंगल में? इस गाड़ी में? जब तक हम मर नहीं जाते?"
"अगर तुम चाहो," सुदीप ने कहा, उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी। "मैं तुम्हारे साथ यहाँ हमेशा के लिए रह सकता हूँ। हम एक-दूसरे के लिए काफी हैं। हमें किसी और की ज़रूरत नहीं है।"
रवि ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कर लीं, जैसे वह सुदीप के शब्दों का मतलब समझने की कोशिश कर रहा हो। "तुम्हें लगता है कि यह सब सच है?"
"हाँ," सुदीप ने फुसफुसाया। "यह सब सच है। तुम मेरे हो। हमेशा से। और मैं तुम्हें कभी नहीं जाने दूँगा।"
उनकी साँसें फिर से तेज़ हो गईं, और उनके हाथ एक-दूसरे के कपड़ों में उलझ गए। बाहर जंगल की आवाज़ें और तेज़ हो गईं, जैसे वे उनकी दुनिया को निगलने को तैयार हों। पर अंदर, उनकी दुनिया सिमट कर रह गई थी, जहाँ सिर्फ वे दोनों थे, उनकी इच्छाएँ, उनके डर, और उनका प्यार।
सुबह की पहली किरणें पेड़ों की पत्तियों से छनकर गाड़ी के शीशे पर पड़ीं। अंदर, सुदीप और रवि एक-दूसरे से लिपटे हुए थे, उनकी साँसें धीमी और गहरी थीं। रात भर के तूफ़ान के बाद, जंगल शांत लग रहा था, जैसे उसने अपनी सारी ऊर्जा उनके भीतर समाहित कर ली हो।
"तुम्हें याद है," रवि ने फुसफुसाया, उसकी आवाज़ अभी भी नींद में डूबी हुई थी। "तुमने कहा था कि तुम मुझे कभी नहीं छोड़ोगे।"
सुदीप ने रवि के बालों को सहलाते हुए कहा, "और मैं नहीं छोड़ूँगा। हम यहाँ से निकलेंगे, रवि। साथ में।"
"पर कहाँ?" रवि ने पूछा, उसकी आँखें अभी भी बंद थीं। "क्या हमें कोई रास्ता मिलेगा? या हम बस यहीं रहेंगे, हमेशा के लिए?"
और मैं तुम्हारा।"
रवि ने अपनी आँखें खोलीं, और सुदीप की आँखों में देखा। उन आँखों में अब कोई डर नहीं था, बस एक अजीब सी शांति थी, और एक गहरी समझ। "और तुम मेरी आज़ादी हो," रवि ने फुसफुसाया। "एक ऐसी आज़ादी जो मुझे तुम्हारे साथ रहने में मिलती है।"
बाहर, एक चिड़िया ने चहचहाना शुरू किया, और उसकी आवाज़ जंगल में गूँज उठी। एक नई सुबह, एक नया दिन, और उनके रिश्ते का एक नया अध्याय शुरू हो रहा था, उस घने, रहस्यमयी जंगल के बीच में, जहाँ उनका प्यार फिर से जीवित हो उठा था।