अध्याय 3 — पहला नियम

581 Words
गायू सारी रात सो नहीं पाई। दरवाज़े के बाहर गार्ड खड़ा था। खिड़की पर लोहे की जाली। कमरा सुंदर था। पर आज़ादी नहीं थी। सुबह दरवाज़ा खुला। दो नौकरानियाँ अंदर आईं। “उठो,” एक ने कहा। “मालिक बुला रहे हैं।” “मालिक?” गायू ने आँखें मलते हुए कहा। “मैं कोई कुत्ता हूँ क्या?” नौकरानी ने डर के मारे इधर-उधर देखा। “प्लीज़… ये शब्द मत बोलो यहाँ।” गायू ने कंबल हटाया। “ठीक है। तो चलो अपने मालिक से मिल लेते हैं।” --- डाइनिंग हॉल पाँच-सितारा होटल जैसा था। लंबी मेज़। महँगे फूल। सिल्वर प्लेट्स। और बीच में बैठा था— वेदांत मल्होत्रा। ब्लैक शर्ट। स्लीव्स मोड़ी हुई। एक हाथ में कॉफी। उसने ऊपर देखा। गायू को। उसकी नज़र उसके चेहरे से पैरों तक गई। फिर वापस आँखों पर। “तुम लेट हो।” गायू ने कंधे उचका दिए। “मैं आपकी वाइफ नहीं हूँ कि टाइम पर उठूँ।” पूरा स्टाफ जम गया। वेदांत ने कॉफी का घूँट लिया। शांत। बहुत शांत। “नियम नंबर एक,” वह बोला। मेज़ पर एक फ़ाइल रखी। “तुम मेरी मौजूदगी में बदतमीज़ी नहीं करोगी।” गायू ने फ़ाइल खोली। उसमें 10 नियम लिखे थे। --- **नियम 1:** मुझे जवाब मत देना। **नियम 2:** मेरी इजाज़त के बिना हवेली से बाहर नहीं जाना। **नियम 3:** किसी भी आदमी से बात नहीं करना। **नियम 4:** मुझे मेरे पहले नाम से नहीं बुलाना। **नियम 5:** हर रात 9 बजे अपने कमरे में होना। **नियम 6:** मेरे सामने ऊँची आवाज़ में मत बोलना। **नियम 7:** मेरे सवालों का जवाब सच में देना। **नियम 8:** मुझे नज़रअंदाज़ नहीं करना। **नियम 9:** मेरी चीज़ों को मत छूना। **नियम 10:** भागने की कोशिश मत करना। --- गायू ने फ़ाइल बंद की। “और अगर मैंने तोड़ा?” वेदांत की आँखों में कुछ चमका। “तो सज़ा मिलेगी।” गायू ने हँसने की कोशिश की। “मारेंगे?” वह उठा। धीरे-धीरे उसके पास आया। “नहीं।” बहुत पास झुक गया। “तोड़ दूँगा।” गायू का गला सूख गया। फिर भी उसने हिम्मत की। “तो नियम नंबर एक…” उसने मुस्कराकर कहा। “आप खुद तोड़ रहे हैं। आपने मुझसे पहले बदतमीज़ी की।” पूरा हॉल सन्न। वेदांत की आँखें ठंडी हो गईं। उसने उसकी कलाई पकड़ी। कसकर। “तुम बहुत बोलती हो।” गायू ने दर्द में मुँह सिकोड़ लिया। “और आप बहुत पकड़ते हो।” एक सेकंड का सन्नाटा। फिर— वेदांत हँस पड़ा। धीमी, ख़तरनाक हँसी। “तुम पागल हो।” उसने उसे कुर्सी पर धक्का दिया। “नियम नंबर एक तोड़ दिया तुमने।” गायू ने आँखें तरेरीं। “तो सज़ा दो।” गलती कर दी। --- वेदांत ने इशारा किया। दो गार्ड आए। “इसे स्टोर रूम में बंद करो।” गायू की आँखें फैल गईं। “क्या? अंधेरे से मुझे डर लगता है!” वेदांत ने ठंडे स्वर में कहा— “मुझे परवाह नहीं।” गार्ड उसे घसीटते हुए ले गए। स्टोर रूम छोटा था। अंधेरा। बिना खिड़की। दरवाज़ा बंद। लॉक। गायू रोने लगी। “आप राक्षस हैं!” बाहर से उसकी आवाज़ आई— “धन्यवाद।” --- एक घंटे बाद दरवाज़ा खुला। वेदांत अंदर आया। गायू फर्श पर सिकुड़ी बैठी थी। आँखें लाल। उसने उसे ऊपर उठाया। “सीखा?” गायू ने धीमी आवाज़ में कहा— “आपसे नफ़रत करती हूँ।” वेदांत की पकड़ और टाइट हो गई। “अच्छा।” उसने उसके कान में कहा— “प्यार बाद में होगा।” --- 😈🖤 **TO BE CONTINUED…**
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