टकराव

793 Words
--- بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ *अव्वल मंज़र: दहलीज़-ए-आशियाना पे अव्वल क़दम-ए-लरज़ां* 👣 सुब्ह-ए-नौ की नर्म-ओ-नाज़ुक किरनें थीं। फ़ातिमा अपने हुजरे में सियाह नक़ाब-ए-हिजाब दुरुस्त कर रही थी। 🖤 दिल सीना-ए-बे-ताब में इस शिद्दत से धड़क रहा था कि गोया बाहर आ जाएगा... आज हयात में अव्वल बार वो अपने आशियाने की दहलीज़ से बाहर क़दम रखने वाली थी। 🥺 दर-ए-हुजरा पे समीर भाईजान खड़े थे। दस्त-ए-शफ़क़त में फ़ातिमा की तख़्लीक़ का मख़मली रोल। 🎨 आयशा आपा भी हमराह थीं। *समीर भाईजान ने नर्म-ओ-शीरीं लहजे में फ़रमाया,* *"फ़ातिमा बेटा... आयशा का दामन-ए-मोहब्बत मत छोड़ना। और हाँ... ख़ौफ़ज़दा मत होना। समझी?"* 🫂 ना कोई तवील ख़ुत्बा... ना नसीहतों का अंबार। *बस एक भाई की फ़िक्र... जो वालिद की फ़िक्र से कम ना थी।* 💚 वालिद ना सही... मगर वालिद के मर्तबे से कम भी नहीं। आयशा आपा ने फ़ातिमा का दस्त-ए-नाज़ुक अपने दस्त में लिया। *"चलो मेरी जान-ए-मन... मैं हूँ ना तुम्हारे पहलू में।"* 🤝 *फ़ातिमा ने नक़ाब के पर्द-ए-हिजाब से समीर भाईजान को देखा। उसकी ज़मुर्रद जैसी सब्ज़ चश्मों में ख़ौफ़-ओ-हरास का साया था... मगर भाईजान की शफ़क़त-ओ-मोहब्बत देख कर क़ल्ब को कुछ क़रार भी आया।* उसने आहिस्ता से सर-ए-तस्लीम ख़म किया। 🥺 *समीर भाईजान दर पे साकित खड़े उसे जाते हुए देख रहे थे।* ख़ामोश... पर उनकी ख़ामोशी में हज़ार दुआओं का जहान-ए-मानी आबाद था। 🤲 जब तक फ़ातिमा कोचा का मोड़ ना मुड़ गई, वो वहीं मिस्ल-ए-संग-ए-मर साकित खड़े रहे। *एक भाई का ख़ामोश नज़ारा... वालिद की दुआ-ए-ख़ैर से कम नहीं होता।* 💚 फ़ातिमा ने एक तवील-ओ-गहरी साँस ली और आयशा आपा की उंगलियों को अपने दस्त में कस के मह्फ़ूज़ कर लिया। *ये कोई क़ैद-ए-बे-बसी ना थी... बस अव्वल परवाज़ से क़ब्ल का वो लरज़ा-ए-ख़ौफ़ था जो हर ताइर-ए-नौ-ख़ेज़ को लाहिक़ होता है।* 🕊️ *दोम मंज़र: ऑटो की सवारी और तारीक-ओ-वीरान इमारत* 🚕 आयशा आपा और फ़ातिमा का ऑटो एक कदीम, नीम-तामीर शुदा वीरान इमारत के रू-ब-रू ट्रैफ़िक में मह्सूर हो जाता है। ऑटो-बान फ़रमाता है, मोहतरमा आगे राह मक़तू है। बीस दक़ीक़े सर्फ़ होंगे। आयशा आपा: फ़ातिमा बेटा हम यहाँ उतर जाते हैं। इस इमारत के पहलू से एक मुख़्तसर-ओ-कोताह राह है। पाँच दक़ीक़े की मुसाफ़त है। दोनों ऑटो से उतर के पा-पियादा रवाना होती हैं। नीम-सुनसान राह. नीम-तारीकी. इमारत की दीवारें शिका-रेज़ा-ओ-ख़स्ता-हाल. शिशों पे तार-ए-अंकबूत के जाले. दरवाज़े पे ज़ंग-आलूद-ओ-बोसीदा कुफ़्ल. पर कुफ़्ल खुला हुआ है. दर नीम-वाज़ है. तभी इमारत के बातिन से एक मर्द के कराहने की पुर-दर्द सदा आती है. लहू में डूबी हुई. भारी आवाज़. आह. कोई है. इमदाद. बचाओ. 🆘 *सोम मंज़र: चांदी का क़दीम खंजर* 🗡️ फ़ातिमा साकित-ओ-सामित हो जाती है. फ़ातिमा: आपा. अंदर कोई इंसान-ए-नातवां है. उसे इमदाद-ए-फ़ौरी चाहिए. आयशा आपा फ़ातिमा का दस्त-ए-लरज़ां थामती हैं. फिर अपनी ज़ुल्फ़-ए-परेशां में मख़्फ़ी एक छोटा-सा खंजर निकालती हैं. नक़रा का. क़दीम-ओ-बा-वक़ार. फ़ातिमा के दस्त-ए-नाज़ुक में वदीअत कर देती हैं. फ़ातिमा: आपा. ये किस मक़्सद के लिए? 😳 आयशा आपा: तुम अभी ये दुनिया-ए-फ़ानी देखने जा रही हो फ़ातिमा. इसकी हाजत-ए-शदीद पड़ेगी. इसे संभाल के रखना. और यहीं साकित-ओ-सामित रहना. मैं अंदर जा के सूरत-ए-हाल देख के आती हूँ. आयशा आपा फ़ातिमा को वहीं तन्हा-ओ-बे-कस छोड़ के इमारत के दर-ए-नीम-वाज़ से अंदर दाख़िल हो जाती हैं. *चहारुम मंज़र: ख़ामोशी-ए-मर्ग और क़दम-ए-फ़ैसला* 😶‍🌫️ एक दक़ीक़ा. दो दक़ीक़े. पाँच दक़ीक़े. आयशा आपा वापस नहीं आतीं. इमारत के बातिन से अब कोई सदा नहीं आ रही. ना मर्द-ए-नातवां की. ना आपा की. मुकम्मल-ओ-मुतलक़ सन्नाटा. फ़ातिमा का क़ल्ब-ए-मुज़्तरिब शिद्दत से धड़कता है. दस्त-ए-रास्त में खंजर-ए-नक़रा. दस्त-ए-चप में पेंटिंग की फ़ाइल-ए-मख़्सूस. फ़ातिमा: आपा. कोई जवाब नहीं. फ़ातिमा एक तवील-ओ-पुर-सोज़ साँस लेती है. नक़ाब-ए-हिजाब दुरुस्त करती है. खंजर को मज़बूती-ए-तमाम से थामती है. और इमारत के नीम-वाज़ दर से अंदर क़दम-ए-जुर्रत रख देती है. *अंदर तारीकी-ए-मुतलक़ थी। फ़िज़ा में बारूद-ओ-ख़ून-ए-नाहक़ की बू रची-बसी थी।* 💀 *क्योंकि सियाह रातों का सुल्तान अयान ख़ान वहीं खड़ा था... जफ़र-ए-मलऊन की कनपटी पे पिस्तौल-ए-मर्ग ताने।* 🔫 *अभी बस आग़ाज़ है... जब ये सियाह शब... ज़मुर्रद आँखों से टकराएगी... सिर्फ़ फ़ातिमा की आँखें सब्ज़ हैं। पूरी कायनात में वाहिद। तो ज़मीन लरज़ेगी। क़यामत का समाँ बंध जाएगा।* 🌙💀 *क्योंकि लौह-ए-महफ़ूज़ पर सब्त है... कि इन दो साहिलों को... एक समंदर बनना है।* ऐ मेरे प्यारे क़रीन... सुनो ज़रा ग़ौर से, सियाह रातों का सुल्तान चला है... नक़ाब वाली हूर पे। एक की निगाहों में क़त्ल का मंसूबा... एक की जान में ख़ौफ़ का दरिया, रंग-ए-हयात की दहलीज़ पर होगा... इश्क़ और नफ़रत का फ़ैसला। ऐ दुनिया वालो... तैयार हो जाओ क़यामत के मंज़र के लिए, कल टकराएगा तूफ़ान-ए-बला... ना वो झुकेगा... ना वो डर के रुकेगी। हवेली की दीवारें गवाह बनेंगी... जब मोहब्बत ख़ून से लिखी जाएगी, एक क़ातिल के सीने में... नक़ाब वाली आग लगाई जाएगी। 🔥⛓️ वल्लाहु आलम... अगला बाब अनक़रीब। ऐ क़रीन... क्या अयान फ़ातिमा को देखते ही पहचान लेगा कि ये वही सब्ज़ आँखें हैं? Comment "SABZ AANKHEN" 💚 100 Comments = कल "टकराव" - ख़ून का पहला क़तरा ---
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