MAHARANA PRATAB

2159 Words
- कल क्षत्रियों के लिए स्वाभिमान के पर्याय महाराणा प्रताप जी की पुण्यतिथि थी और अन्यों के लिए क्षत्रियों को गाली देने का उत्सव, सोशल मीडिया पर कई नामी व्यक्तियों और पेजों ने गालियों के इस महोत्सव को बहुत ही धूमधाम से मनाया जिसके लिए सम्पूर्ण क्षत्रिय समाज इनका आभारी है। कुत्ते को देखकर रास्ता बदल देने वाले वीरों को मानना है कि क्षत्रिय इस धरती की सबसे कायर कौम है इन्हें इस देश में रहने तक का अधिकार नहीं। मैं कल ही इस विषय पर लिखने वाला था किंतु कल कश्मीर से ब्राह्मणों का पलायन दिवस होने के कारण लिखना उचित नहीं लगा एक समय जब इस्लाम की तलवार से सारा विश्व थर्राता था एवं कुछ ही दशकों में इस्लामिक आक्रांताओं ने तलवार के बल पर कई राष्ट्रों का धर्मांतरण कर उनकी संस्कृति का समूल नाश कर दिया था लेकिन भारत आकर उनकी तलवारों की धार कुंद पड़ गई क्योंकि धर्म और संस्कृति रक्षार्थ उनके सम्मुख क्षत्रिय दीवार बनकर खड़े थे जिन्हें न जीने का मोह था न मरने का भय जो अपनी उंगली काटकर तलवारों की धार देखते थे उन प्रतिहार राजपूतों ने 300 वर्ष अरबों को भारत की इस धरती पर पांव तक नहीं रखने दिया जिस कारण अरब यात्री सुलेमान ने प्रतिहार वंश के राजपूत सम्राट मिहिरभोज को इस्लाम का सबसे बड़ा दुश्मन कहा है। आज उन क्षत्रियों को कायर और गुलाम कहा जाता है जो देश और धर्म की बात आने पर अपने सर अपने हाथों में लेकर चल दिया करते थे आक्रांताओं से जिन ब्राह्मणों की चोटी बचाने के लिए क्षत्राणियां झोली भर-भर के अपने बेटों के सर दान दिया करती थी वो ब्राह्मण आज हमें कायर कहते हैं तो पीड़ा होती है। क्षत्रिय कभी कायर नहीं रहे हमारे पुरखे संकट देखकर कभी अपने उसूलों से पीछे नहीं हटे भले ही उन्हें विजय को नीति की भेंट करना पड़ा हो उनकी हार भी मेरे लिए विजय से अधिक गौरवात्मक है उन्होंने इस राष्ट्र के भावों को उच्च किया है भले ही आज ये कृतघ्न राष्ट्र उन्हें कायर कहने की उद्दंडता करने लगा हो किंतु उन्होंने इसके हृदय पर नैतिक गौरव को अंकित किया है चाहे वो निहत्थे शत्रु पर पृथ्वीराज चौहान का वार न करना हो या महाराणा प्रताप का दो तलवारें रखना हो ताकि यदि शत्रु शस्त्रहीन हो तो उसे एक तलवार दे सके। जिन लोगों को लगता है कि अपने राज को कायम रखने के लिए क्षत्रियों ने मुगलों से संधियां की उन्हें एक बार हठी हम्मीर के बारे में जरूर पढ़ लेना चाहिए जिन्होंने क्षत्रिय धर्म के पालन में अपना राजपाठ तक उजाड़ दिया हमें संधियां करनी पड़ी क्योंकि मुगल/अफगानी/तुर्क आक्रांता क्षत्रियों से आमने सामने के युद्ध में न जीत पाने के कारण प्रजा को प्रताड़ित करते थे उनके घरों को फूंक देते थे उन्हें बंधक बनाकर मंडियों में बेचते थे जौहर शाके तो हमारे लिए खेल थे हर रोज मौत का नंगा नाच होता था किंतु निरीह प्रजा की गुहार क्या होती है अटल बिहारी बाजपेयी से पूछिए जब कंधार विमान अपहरण में 176 यात्री बंधक बना लिए गए थे और बदले में उन्हें आतंकियों को मुक्त करना पड़ा था ये तो महज एक घटना है जिससे अटल जी निरुपाय हो गए थे एवं सम्पूर्ण राष्ट्र हिल गया था। मध्यकाल में तो दो-दो लाख क्षत्रियों के खोपड़ी से दीवारें बना दी जाती थी फिर भी वो कभी झुके नहीं आज जिन्हें क्षत्रिय कायर लगते हैं वो जरा इस्लाम का इतिहास पढ़ ले इस्लाम जहां भी गया उसे उस देश की मूल संस्कृति के उच्छेदन में 50 वर्ष नहीं लगे लेकिन भारत में 600 वर्ष मुसलमानों का शासन रहने के बावजूद सनातन धर्म जिंदा है तो ये क्षत्रियों की तलवारों का जौहर है आम क्षत्रिय संघर्ष से कभी असम्बद्ध नहीं रहा उसे सदैव अपने क्षेत्र के लोगों की रक्षा का दायित्व बोध रहा। कभी कौटुम्बिक मोह ने उसे रोका भी तो क्षत्राणियों ने मोह उग्रह हेतु अपने सर थाल में सजाकर दे दिए। आज भी किसी क्षेत्र में क्षत्रिय 5% भी हो तो किसी आततायी में इतना साहस नहीं की वो उन्हें प्रताड़ित कर सके उदाहरण पश्चिमी उत्तरप्रदेश है जहां दलित और मुस्लिम की युति भी क्षत्रियों को दबा नहीं पाती बिहार में जब नक्सलियों के भेष सत्ता समर्थित अहीरों ने सवर्णों की बस्तियां उजाड़ी तो क्षत्रियों ने अपना वो उग्र रूप दिखाया कि अहीरों ने लोगों को अपनी जाति बताना छोड़ दिया था कश्मीर से ब्राह्मण पलायन को मजबूर हुए किंतु किसी आततायी में साहस है तो डोगरा क्षत्रियों को छेड़कर देखे कश्मीर में स्वयं न अल्पसंख्यक हो जाये तो कहना कैराना नए नए पैदा हुए वीर जाट, गूजरो का क्षेत्र है अपने घर छोड़कर क्यों भाग गए भाई?? अपनी वीरता क्षत्रियों को गाली देकर ही दिखानी है क्या सबको?? भदरी रियासत में मोहर्रम के दिन किसी मुसलमान ने एक बंदर मार दिया था तब से उदय प्रताप सिंह मोहर्रम के दिन जानबूझकर उसी रास्ते पर भंडारा कराते हैं जिस रास्ते से ताजिया निकलती है किसी सरकार मे साहस है तो रोक ले उन्हें ये क्षत्रिय रक्त है, हम ढाई इंच की जुबान चलाकर वीरता नहीं दिखाते। किसी की फेसबुक पोस्ट देखी जिसमें टोडरमल की हवेली को संरक्षित करने की बात लिखी थी क्यों भाई यदि मान सिंह गद्दार था तो ये टोडरमल और बीरबल कैसे वफादार हो गए?? गद्दारी का प्रमाणपत्र अपनी सुविधानुसार देते हो क्या? बीरबल और टोडरमल को गद्दार तो मैंने किसी के मुंह से नहीं सुना न ही इनके कारण इनकी सम्पूर्ण जाति को किसी ने कायर या गुलाम कहा? तीन चार दिन पूर्व मंचों के स्थापित वीर रस के कवि जिनकी कविता राणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान जैसे राजपूतों के बिना पूरी नहीं होती होगी उनकी एक पोस्ट पर एक सिख ने कंमेंट किया इस देश के क्षत्रिय गद्दार है ये इस देश में रहने के भी योग्य नहीं और उन कवि ने उस सिख का समर्थन किया मैंने अपना विरोध दर्ज कराते हुए उन स्वघोषित देशभक्त को याद दिलाया कि भाई गुरुगोविंद सिंह औरंगजेब के बेटे बहादुरशाह से संधि कर दक्कन के अभियान में गए थे तो मैं गुरुगोविंद सिंह को गद्दार कहूँ क्या आखिर बहादुरशाह भी तो मुग़ल ही था न?? गुरुगोविंद सिंह को अस्त्र-शस्त्र संचालन की शिक्षा बज्जर सिंह राठौड़ ने दी थी जो कि जाति से क्षत्रिय थे गोविंद सिंह के देहावसान के उपरांत सिखों की जिसने कमान संभाली वो वीर बंदा बहादुर क्षत्रिय था आज अपनी ईर्ष्या में गुरुगोविंद सिंह को अपमानित कर रहे हो जिन्होंने एक क्षत्रिय के चरण में बैठकर शस्त्र चलाना सीखा है। और 1857 के विद्रोह की असफलता में सिखों का बहुत बड़ा हाथ था तो सिखों को गद्दार कहूं? जलियांवाला बाग हत्याकांड में डायर के आदेश पर सिखों ने ही गोलियां चलाई थी तो मैं पूरी कौम को गद्दार कहूं? खालिस्तान की मांग करने वाले क्षत्रिय तो नहीं हैं न फिर सिखों को क्यों न गद्दार कहूँ आतंकियों का साथ देने वाले dsp देवेंद्र सिंह सिख कौम से है तो क्यों न सिखों गद्दार कहूं? मैं खुलकर कहता हूं मराठा और सिखों तुम्हारा जितने वर्ष शासन नहीं रहा है उससे अधिक अकेले राणा सांगा की देह पर घाव थे इसलिए तुम हमें वीरता सिखाने का प्रयास भी मत करना क्षत्रियों के हज़ारों वर्षों के रक्तरंजित संघर्ष से अपनी तुलना करना बंद करो आज भी तुम्हारी जितनी जनसंख्या नहीं होगी उससे अधिक 712 ई. से शुरू हुए बाहरी आक्रमणों से लेकर हज़ारों वर्ष तक क्षत्राणियां हरवर्ष अपने बेटों के सर दान दिया करती थीं ऐसे-ऐसे भी घर होते थे जिनके यहां कोई पुरुष ही न शेष रहता सब रण में खेत हो जाते "बारह बरस तक कूकुर जीवै, तेरह वर्ष जीवै सियार, बरस अट्ठारह क्षत्रिय जीवै, आगे जीवन को धिक्कार" जैसी लोकोक्तियाँ यूं ही नहीं प्रचलित हो गई हमने अपने मस्तकों की कीमत सदा माटी से सस्ती रखी है। आज जो ये मराठे हिंदुत्व का ज्ञान देते फिर रहे हैं और फिल्मों में "जब शिवा जी की तलवार चलती है तो ब्राह्मणों का जनेऊ और औरतों का घूंघट सलामत रहता है" जैसे डायलॉग के माध्यम से अपनी छवि सुधारने का प्रयास कर रहे हैं इन्होंने मुगलों से ज्यादा हिंदुओ को लूटा और उनकी महिलाओं का बलात्कार किया है बंगाल में ब्राह्मणों के मठ में मौत का नंगा नाच किया है इन मराठों ने मंदिरों तक को नहीं छोड़ा ये कामातुर मराठे एक वेश्या की रक्षार्थ लड़ने वाले 4000 क्षत्रियों का बेरहमी से कत्ल कर दिया था। शिवा जी की सूरत लूट कांड के बाद जब जयसिंह ने दक्कन पर चढ़ाई की तब अपनी जान बचाने के लिए शिवाजी ने पहली और आख़िरी बार स्वयं को हिन्दू कहा है वहीं आमेर घराना जिसे हिन्दू और स्वयं क्षत्रिय गद्दार कहते नहीं थकते औरंगजेब की सेना में होते हुए भी जयसिंह ने कभी हिंदुओ का धर्मांतरण और मंदिरों का विध्वंस नहीं होने दिया औरंगजेब के दरबार का इटेलियन लेखक niccolao manucci अपनी पुस्तक storia do mogor में लिखता है कि जय सिंह के दक्कन अभियान के दौरान चवल के कुछ हिन्दू जय सिंह के पास पुर्तगालियों द्वारा जबरन ईसाई बनाने की शिकायत लेकर आये तो जय सिंह अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने तुरंत अपनी सेना का रुख चवल की ओर कर दिया। जय सिंह ने मराठों की लूट के विपरीत मथुरा और वृंदावन में घाट और धर्मशालाएं बनवाईं उन्होंने प्रयाग संगम में स्नान करने पर लगने वाले कर से हिंदुओ को मुक्त कराया इससे गुजराती व्यापारियों और मराठों को अत्यधिक लाभ हुआ, भाजपा शासन में पैदा हुए तथाकथित हिंदूवादियों क्षत्रियो ने धर्म और देशभक्ति तुम्हारी तरह संघ की शाखाओं में जाकर नहीं सीखी है कोई मुग़ल धर्म को आधार बनाकर क्षत्रियों को कभी अपने नियंत्रण में नहीं रख सका औरंगजेब ने जैसे ही कट्टरता की नीति अपनाई राठौड़ क्षत्रियों ने विद्रोह कर दिया भला वीर दुर्गादास राठौड़ को कौन नहीं जानता जिन्होंने संघर्ष करते हुए पूरा जीवन घोड़े की पीठ पर ही व्यतीत कर दिया? राम मंदिर विध्वंस के बाद से सुप्रीम कोर्ट के फैसला आने तक 500 वर्ष अयोध्या के सूर्यवंशी क्षत्रियों ने अपने सिर पे पगड़ी और पैरों में जुते-चप्पल नहीं धारण किये और आज उन क्षत्रियों को तुम धर्म का ज्ञान देते हो 2 दिन सड़क पर बिना जूते-चप्पल के निकलकर देखो तुम्हें तुम्हारी औकात पता चल जाएगी? यदि मुग़ल दरबार में रहना गद्दारी है तो औरंगजेब के शासन में सबसे अधिक मनसबदार यही लुटेरे मराठे थे बहमनी का पूरा प्रशासन ब्राह्मणों और मराठों के हाथ में था मराठों ने 300 वर्षों से अधिक बहमनी, अहमदनगर, बीजापुर,गोलकुंडा,बेरार और बिदरपुर शासन में ग़ुलामी की है। मलिक अम्बर के वक्त शाहजी मुगलों से अहमदनगर की स्वतंत्रता के लिए अम्बर के साथ खड़े होकर लड़ रहे थे। यही शाहजी अहमदनगर के खात्मे के बाद बीजापुर से मिल गये। इसी तरह शिवाजी के नाना जाधव राव अहमदनगर और मुगल दोनों की तरफ से लड़े। लेकिन गद्दार सिर्फ क्षत्रिय और आमेर घराना है क्योंकि उसने हिंदुओ को इन लुटेरों की भांति कभी लूटा नहीं। जो कायस्थ जाति ही मुग़लों की देन है जिन्हें आधा मुग़ल कहा जाता था वो भी क्षत्रियों को गद्दारी का प्रमाणपत्र देने आ जाते हैं जबकि मुगलों के असली चाटुकार यही थे। जब राणा सांगा खानवा में बाबर की सेना से जूझ रहे थे तो खानवा गांव के निवासी बाबर की सेना को रसद पहुंचा रहे थे और आज ये दोगले हमसे पूछते हैं क्षत्रिय क्यों हार गए? अरे हम तो वो हैं जिनकी तलवारों के सम्मुख आधुनिक तोपों से युक्त बाबर की सेना के पसीने छूट गए थे बाबर की भयभीत सेना ने राणा सांगा से लड़ने तक से इंकार कर दिया था एक हाथ,एक आंख और एक पांव से हीन अस्सी घावों से अलंकृत सांगा जब रणभूमि में आता था तो उसकी छवि देखकर ही अच्छे अच्छो के कच्छे गीले हो जाते थे हम दुश्मन से नहीं भाजपा शासन में पैदा हुए तथाकथित देशभक्तों के गद्दार पुरखों से हारे हैं। जब 14वीं 15वीं शताब्दी में राणा खेता, राणा कुम्भा,राणा सांगा जैसे क्षत्रिय नागौर ,गुजरात, और मालवा सल्तनत से युद्धरत थे तो ये कायर मराठे बहमनी सम्राज्य और दक्कन सुल्तानों की गुलामी कर रहे थे। देश में ब्रिटिश हुकूमत सत्ता में आई तो उसके पीछे बहुत हद तक यही मराठे थे जिन्हें फिल्मों के माध्यम से आज देशभक्त बनाकर परोसा जा रहा है इनकी लूट-मार और बलात्कारों से राजघराने इतने त्रस्त हो चुके थे कि उन्हें ब्रिटिशों का सरंक्षण लेना ही उचित लगा क्योंकि ये कायर महिलाओं का सामूहिक बलात्कार,उनके स्तनों को काटने,ब्राह्मणों एवं निःशस्त्र नागरिकों की हत्या करने एवं मंदिरों को जलाने के लिए कुख्यात थे और जब राज्य की सेनाएं नागरिकों की रक्षार्थ आगे आती तो ये कायर मैदान छोड़कर भाग जाते आज इसे ये कायर गोरिल्ला युद्ध पद्धति कहते हैं। सेना को जातीय आधार पर देखना मुझे उचित नहीं लगता किन्तु जिन वीरों को लगता है कि उन्हें इतिहास में लड़ने का अवसर नहीं दिया गया तो वीरों जरा बताना 70 वर्षों के लोकतंत्र में तुम्हारी कौम ने कितने वीरता पुरस्कार जीते हैं हम सीना ठोंककर कहते हैं कि आज भी सबसे अधिक परमवीर चक्र क्षत्रियों के पास हैं तुम्हें लड़ने से किसने मना किया भाई लोकतंत्र है सेना में जाकर दिखाओ न अपनी वीरता या तुम्हारी सारी वीरता क्षत्रियों को गाली देने में है?? ®सिंहरिओम पेड़ हो जाएंगे फलों के खिलाफ इतना मत बोलिये जड़ो के खिलाफ। गूजर अपना जिक्र न होने से नाराज न हों ये तब की बातें हैं जब तुम भैंस चरा रहे थे तुम क्या लड़ते...:-आहत क्षत्रिय-:-
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