​एपिसोड 3: शब्दों का मंच और धड़कती चुनौतियाँ

971 Words
​कॉलेज का मुख्य सभागार (Auditorium) आज पूरी तरह से सजा हुआ था। चारों ओर रंग-बिरंगे पोस्टर लगे थे और हवा में एक अजीब सी उत्तेजना घुली हुई थी। आज 'युवा लेखक प्रतियोगिता' का दिन था। गीता के लिए यह सिर्फ एक प्रतियोगिता नहीं थी, बल्कि उसके बरसों के संघर्ष और रातों की तपस्या का परिणाम दिखाने का दिन था। ​गीता ने मंच के पीछे खड़े होकर एक बार फिर अपने नोट्स देखे। उसके हाथ हल्के से कांप रहे थे। उसने आज वही गुलाबी साड़ी पहनी थी, जिसे उसने कल अर्जुन से मिलते वक्त पहना था। वह बार-बार अपनी कलम को देख रही थी, जो उसके लिए उसकी सबसे बड़ी ढाल थी। तभी उसकी सहेली राधा भागती हुई आई। ​"गीता! तूने सुना? आज प्रतियोगिता का मुख्य अतिथि और जज कोई और नहीं, बल्कि शहर का सबसे बड़ा बिजनेसमैन अर्जुन खन्ना है!" राधा ने हाँफते हुए कहा। ​गीता के हाथ से कागज़ छूटते-छूटते बचा। "अर्जुन खन्ना? यहाँ?" ​"हाँ! उनका 'खन्ना ग्रुप' ही इस पूरे प्रोग्राम को स्पॉन्सर कर रहा है। सुना है कि जो जीतेगा, उसकी किताब पब्लिश करने का सारा खर्चा वही उठाएंगे," राधा ने उत्साह में कहा। ​गीता का दिल अब और तेज़ धड़कने लगा। कल की वो मुलाकात, वो तीखी बातें और अर्जुन की वो ठंडी आँखें... सब कुछ उसके दिमाग में एक फिल्म की तरह चलने लगा। क्या वह अर्जुन के सामने अपनी कहानी पढ़ पाएगी? क्या वह उसे फिर से नीचा दिखाने की कोशिश करेगा? ​तभी शोर बढ़ा और सभागार के द्वार पर काली गाड़ियों का काफिला रुका। अर्जुन खन्ना अपनी चिर-परिचित गंभीरता और रूतबे के साथ अंदर दाखिल हुआ। उसके पीछे बॉडीगार्ड्स और कॉलेज के प्रिंसिपल थे। अर्जुन ने गहरे नीले रंग का सूट पहना था और उसकी चाल में एक अजेय आत्मविश्वास था। उसकी नज़रें एक बार भीड़ को चीरती हुई मंच की ओर गईं, जैसे वह किसी को ढूँढ रहा हो। ​प्रतियोगिता शुरू हुई। एक के बाद एक लेखक मंच पर आ रहे थे और अपनी रचनाएँ पढ़ रहे थे। अर्जुन जज की कुर्सी पर बैठा हुआ बड़े गौर से सब सुन रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। वह बस बीच-बीच में अपनी डायरी में कुछ नोट कर लेता। ​अंत में नाम पुकारा गया— "अगली प्रतिभागी हैं, गीता कुमारी।" ​गीता ने एक गहरी सांस ली, भगवान का नाम लिया और मंच की ओर बढ़ी। जैसे ही वह माइक के सामने खड़ी हुई, पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया। सामने की कतार में ठीक बीचों-बीच अर्जुन बैठा था। उसकी तीखी निगाहें सीधे गीता पर जमी थीं। ​गीता ने बोलना शुरू किया, उसकी आवाज़ पहले थोड़ी लड़खड़ाई, लेकिन जैसे ही उसने अपनी कहानी के पात्रों को याद किया, उसकी आवाज़ में एक जादू सा आ गया। ​"मेरी कहानी का शीर्षक है— 'पत्थर का दिल और स्याही की रूह'। यह कहानी है एक ऐसे इंसान की जिसने दुनिया जीतने की होड़ में खुद को खो दिया है, और एक ऐसी लड़की की जिसके पास खोने को कुछ नहीं है सिवाय उसके शब्दों के..." ​जैसे-जैसे गीता पढ़ती गई, हॉल में मौजूद हर शख्स मंत्रमुग्ध हो गया। वह अर्जुन की ही कहानी सुना रही थी, लेकिन एक अलग अंदाज़ में। उसने बताया कि कैसे कठोरता के पीछे अक्सर एक गहरा दर्द छिपा होता है। उसने शब्दों से एक ऐसा चित्र खींचा कि सुनने वालों की आँखों में आँसू आ गए। ​अर्जुन कुर्सी पर सीधा होकर बैठ गया। उसकी आँखें गीता के चेहरे से हट ही नहीं रही थीं। उसे लगा जैसे गीता उसके सीने को चीरकर उसके दिल के राज पढ़ रही हो। वह हैरान था कि कोई उसे इतनी गहराई से कैसे जान सकता है, जबकि वह कल ही उससे पहली बार मिली थी। ​जब गीता ने अपनी कहानी खत्म की, तो कुछ सेकंड के लिए वहां मौत जैसा सन्नाटा रहा, और फिर पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। गीता की आँखों में नमी थी। उसने झुककर सबका अभिवादन किया और उसकी नज़र अर्जुन से मिली। अर्जुन ने ताली नहीं बजाई, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—शायद वह सम्मान था, या शायद हार की एक स्वीकारोक्ति। ​प्रिंसिपल ने मंच पर आकर विजेताओं की घोषणा के लिए अर्जुन को आमंत्रित किया। ​अर्जुन माइक पर आया। उसकी आवाज़ पूरे हॉल में गूँज उठी। "लेखन केवल शब्दों का मेल नहीं है, यह एक रूह का दूसरी रूह से संवाद है। आज मैंने यहाँ बहुत कुछ सुना, लेकिन एक रचना ऐसी थी जिसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या हम वाकई इतने पत्थर दिल हो गए हैं?" ​उसने एक पल का विराम लिया और फिर कहा, "इस प्रतियोगिता की विजेता हैं— मिस गीता कुमारी।" ​गीता की खुशी का ठिकाना न रहा। वह मंच पर गई। जब अर्जुन उसे ट्रॉफी और चेक थमा रहा था, तो उसने झुककर गीता के कान में बहुत धीरे से कहा, "तुम्हारे शब्दों में वाकई बहुत धार है गीता। लेकिन याद रखना, कहानियाँ लिखना आसान है, उन्हें हकीकत में जीना बहुत मुश्किल।" ​गीता ने ट्रॉफी थामते हुए उसकी आँखों में देखा और मुस्कुराकर जवाब दिया, "मुश्किल रास्तों पर चलना ही तो मेरी कहानियों का सार है, मिस्टर खन्ना। शुक्रिया।" ​अर्जुन मंच से उतरकर चला गया, लेकिन उसकी वो बातें गीता के मन में घर कर गईं। उसे लग रहा था कि यह जीत उसकी मंज़िल नहीं, बल्कि एक बड़े और खतरनाक खेल की शुरुआत है। ​उसी शाम, जब गीता घर लौट रही थी, एक अजनबी ने उसे एक लिफाफा थमाया। उसमें एक कार्ड था और उस पर लिखा था— "आज रात 8 बजे, 'द इंपीरियल होटल'। मुझे इस कहानी का अगला अध्याय जानना है। — अर्जुन खन्ना।" ​गीता का दिल फिर से जोरों से धड़कने लगा। यह एक डिनर इन्विटेशन था या अर्जुन की कोई नई चाल? क्या गीता को जाना चाहिए? ​कहानी जारी रहेगी... लेखिका: गीता कुमारी
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