सब सही चल रहा था, फिर अचानक से इनाया को फीवर हो गया । संजना जी को लगा कि यह कोई सामान्य बुखार है, इसलिए उन्होंने उसे घर में रखी नॉर्मल दवाई दे दी । इनाया जब से इस दुनिया में आई थी, उसे पहली बार बुखार आया था। सबको अपनी शरारतों से परेशान करने वाली और घर को अपनी रौनक से भरने वाली इनाया आज बस रोए जा रही थी । इनाया की आदत थी कि वह जल्दी रोती नहीं थी; वह सिर्फ तभी रोती थी जब उसे तेज भूख लगती थी। वरना तो संजना जी अगर उसे अकेला छोड़कर घर के काम से बाहर भी चली जाती थीं, तो भी वह नहीं रोती थी; बस चैन से सोती रहती थी या अपने खिलौनों के साथ खेलती रहती थी।
आज तो सोहेल जी ने और न ही संजना जी ने इनाया की वह मासूम खिलखिलाहट सुनी थी जो उनके दिन भर की थकान मिटा देती थी। अपनी लाडली बेटी को इस तरह बिलख-बिलख कर रोते देखकर संजना जी का दिल बैठा जा रहा था और वह बुरी तरह परेशान होती जा रही थीं। जब हालात नहीं सुधरे, तो वे उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले गए। वहां जांच के बाद पता चला कि इनाया को टाइफाइड है। यह शब्द सुनते ही संजना जी के सब्र का बांध टूट गया और वह जोर-जोर से रोने लगीं।
वह बहुत ज्यादा घबरा रही थीं कि इस अनजान और बड़े शहर में वह अपनी छोटी सी बच्ची को कैसे संभालेंगी। यहां न तो उन्हें कोई समझने वाला था और न ही सही सलाह देने वाला कोई बड़ा - बुजुर्ग । संजना जी को ऐसी बीमारियों और बच्चों की देखभाल का कोई खास अनुभव भी नहीं था । आखिर उनकी उम्र भी तो अभी बहुत कम थी, मुश्किल से 22 साल। वह खुद को बहुत अकेला और असहाय महसूस कर रही थीं ।
फिर सोहेल जी ने उन्हें हिम्मत बंधाई, बड़े प्यार से समझाया और डॉक्टर की बताई हुई सारी दवाइयां लेकर वे दोनों भारी मन से घर आ गए। उन्होंने पूरी सावधानी से इनाया का ख्याल रखा, लेकिन जब तीन-चार दिन बीत जाने के बाद भी दवाइयों से फीवर कम नहीं हुआ, तो सोहेल जी की चिंता भी बढ़ गई। उन्होंने संजना जी से कहा कि अब बेहतर यही होगा कि वे कुछ समय के लिए गांव चले जाएं, ताकि वहां अपनों की देखरेख में इनाया ठीक हो सके। संजना जी उस वक्त कुछ कह नहीं पाईं, क्योंकि वह अपनी बेटी की गिरती सेहत को लेकर पहले ही बहुत डरी हुई थीं। लेकिन जैसे ही गाँव जाने की बात उनके कानों में पड़ी, उनके जेहन में पुरानी यादों का तूफान उठ खड़ा हुआ और उन्हें पुरानी सारी बातें याद आने लगीं।