देहरादून में सोहेल जी एक किराए के घर में रहते थे। कमरा बहुत ज्यादा छोटा और मिट्टी का बना हुआ था। घर में इस्तेमाल का कोई भी समान नहीं था सिवाय दो-तीन सामानों के।
संजना जी को इन सब की आदत नहीं थी क्योंकि वह एक बड़े परिवार की रहने वाली थी। जहां उन्हें किसी चीज के भी कमी नहीं थी। लेकिन जब से शादी हुई थी जब से वह एक गरीब परिवार में खुद को ढालने की कोशिश कर रही थी। जब तक तो ठीक रहा जब तक उन्हें गांव में अपने घर को संभालना था लेकिन यहां देहरादून में तो उन्हें पूरा घर ही शुरू से बनाना था यहां न रहने के लिए सही से कमरा था और ना ही इस्तेमाल का कोई खास सामान यहां तक की घर में कोई खाने पकाने का सामान भी नहीं था और ना ही मसाले थे।
संजना जी ये सब देखकर परेशान हो गई और सोहेल जी से कहने लगी, "यहां हम अपना गुजारा कैसे करेंगे? यहां तो नहीं हमारे पास कुछ खाने को है ना ही सही से रहने को है, हमारे साथ एक छोटी बच्ची भी है अगर हम अकेले होते तो मैनेज कर सकते थे लेकिन अपनी बच्ची के साथ यह सब कैसे मैनेज कर पाएंगे? अगर हम अकेले होते तो भूखे रहकर काम चल भी जाता लेकिन हमारी बच्ची को तो दूध चाहिए। प्लीज आप रात के खाने का कहीं से इंतजाम कर लीजिए कल फिर हम कोई और काम ढूंढ लेंगे".
पूरे सफर के बाद अब संजना जी को बेहद भूख लग रही थी साथ ही इनाया भी रो रही थी। शायद उसे भूख लगी थी। लेकिन थकान की वजह से संजना जी के अंदर इतनी ताकत नहीं थी कि वह बैठकर अपनी नन्ही परी को दूध भी पिला सके।
जब इनाया को रोते-रोते बहुत देर हो गई और संजना जी से नहीं देखा गया तो उन्होंने पानी पीकर ही थोड़ी हिम्मत जुटाई और अपनी बेटी को दूध पिलाने की कोशिश करने लगी।
इनाया अभी अपनी मां का ही दूध पिया करती थी इसलिए संजना जी ने कैसे ने कैसे करके उसे दूध पिलाकर सुला दिया।
बहुत देर तक ढूंढने के बावजूद सोहेल जी को कहीं से भी खाना नहीं मिल पाया जिस वजह से संजना और सोहेल रात को पानी पीकर ही सो गए