Story By Rohit Kumar Shukla
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Rohit Kumar Shukla

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मदमस्त टपोरी सिमरन भाई
Updated at Jul 8, 2026, 07:33
कमरे के भीतर का माहौल अब पूरी तरह से उत्तेजना और तीव्र गति से भर चुका था। चॉल मालिक पूरी तरह से नियंत्रण खो चुका था। उसने सिमरन के उभरे हुए ****ों पर अपनी पकड़ और भी मजबूत कर ली और उन्हें बेदर्दी से मसलते हुए, अपनी पूरी ताकत के साथ सिमरन की **** में ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए।हर एक धक्का गहरा, सीधा और तीव्र था, जो सिमरन के शरीर के सबसे संवेदनशील हिस्से को झकझोर रहा था। इस तीखे और लगातार होते प्रहारों ने सिमरन के भीतर दबी सारी कशिश को बाहर ला दिया। अब तक खुद को संभालने की कोशिश कर रही चॉल की 'सिमरन भाई' इस चरम सुख के वेग के आगे पूरी तरह बेबस हो गई।उसके मुँह से अब टपोरी अंदाज़ के बजाय एक गहरी, मदहोश कर देने वाली आह निकल पड़ी। कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई सिमरन की वो सिसकारियां और आहें गूंजने लगीं, जो इस बात की गवाही दे रही थीं कि वह दर्द और बेइंतहा मजे के इस अनोखे संगम को कितनी गहराई से महसूस कर रही थी। चॉल मालिक की रफ्तार के साथ उसकी सांसें और आहें भी तेज़ होती जा रही थीं, और वह इस तूफानी पल के हर एक झटके को पूरी तरह से एंजॉय कर रही थी।चॉल मालिक के उस आखिरी और बेहद ज़ोरदार धक्के के साथ ही सिमरन के शरीर का वह अंतिम अवरोध भी टूट गया। उसकी कौमार्य की सील के खंडित होते ही कमरे के भीतर एक तीखा सन्नाटा और फिर सिमरन के मुँह से निकली एक तीखी, अनियंत्रित आह गूंज उठी। यह दर्द और चरम सुख का एक ऐसा अनोखा मिला-जुला अहसास था, जिसने उसके पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया।उसकी आँखों के कोने से दर्द की एक नन्हीं बूंद छलक आई, लेकिन उसके होठों पर अब भी वही बेबाक और संतुष्ट मुस्कान कायम थी। अठारह साल की उम्र के इस पहले ही दिन, अपनी पूरी और असल स्त्रीत्व से रूबरू होने का यह अहसास उसके लिए मुकम्मल था। चॉल मालिक ने सिमरन के ****ों पर अपनी पकड़ ढीली नहीं की, बल्कि उसकी इस आह को सुनकर उसके धक्कों की रफ्तार को और बढ़ा दिया। सिमरन अपनी आँखें बंद किए, अपनी इस नई शुरुआत और इस मुकम्मल बदलाव के हर एक कतरे को अपने भीतर महसूस कर रही थी।कमरे के भीतर की उत्तेजना अब अपने अंतिम और सबसे तीव्र पड़ाव पर पहुँच चुकी थी। चॉल मालिक पूरी ताकत से सिमरन के सुडौल ****ों को अपनी हथेलियों में भींचे हुए था और उसकी **** में लगातार गहरे और ज़ोरदार धक्के लगा रहा था। दोनों की सांसें चरम सीमा पर थीं और पूरा कमरा इस तीखी हलचल से गर्माया हुआ था।तभी, अपनी चरम उत्तेजना के आखिरी बिंदु को छूते ही चॉल मालिक का पूरा बदन कांप उठा। उसने एक बेहद गहरा और अंतिम धक्का लगाया और सिमरन के शरीर के सबसे भीतर, उसकी कोख की गहराई में अपनी पूरी ऊर्जा और गर्म बीज को एक साथ मुक्त कर दिया। वह गाढ़ा प्रवाह सिमरन के भीतर गहराई तक समाता चला गया।इस अंतिम और मुकम्मल जुड़ाव के अहसास से सिमरन का पूरा **** सिहर उठा। अठारहवें जन्मदिन के इस खास मौके पर, चॉल मालिक के इस संपूर्ण समर्पण और अपनी कोख में इस नए अहसास को महसूस करके सिमरन को एक गहरी आत्मसंतुष्टि मिली। दोनों हांफते हुए एक-दूसरे से सटे रहे, और सिमरन इस बेहद निजी और शक्तिशाली पल के असर में पूरी तरह डूबकर खुश हो रही थी।इस अंतिम पड़ाव पर आकर दोनों के मन की इच्छाएं और उनका आंतरिक अहंकार अपने-अपने तरीके से पूरी तरह संतुष्ट हो चुके थे। बंद कमरे के भीतर की हवा में अब दोनों की हांफने की आवाज़ें और एक गहरी खामोशी तैर रही थी।सिमरन अपनी थकी हुई और गर्म सांसों को काबू में करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेबाक और गहरी आत्मसंतुष्टि की मुस्कान थी। वह अंदर ही अंदर इस बात से बेहद खुश थी कि चॉल मालिक ने अपनी पूरी ताकत और अपना सारा बीज उसकी कोख की गहराई में उतार दिया था। अठारहवें साल के इस पहले दिन, इस मुकम्मल शारीरिक जुड़ाव और अपने भीतर समाए इस गर्म अहसास ने उसे अपनी नई जवानी और स्त्रीत्व के एक नए नशे से भर दिया था।दूसरी तरफ, चॉल मालिक सिमरन के पीछे से थोड़ा अलग हुआ, तो उसके चेहरे पर एक शातिर, घमंडी और गहरी संतुष्टि की मुस्कान तैर रही थी। वह मन ही मन अपनी इस जीत पर बेहद खुश और मगरूर हो रहा था। उसे इस बात का गहरा गुरूर था कि जिस 'सिमरन भाई' के नाम से पूरी चॉल थर-थर कांपती थी, जो खुद को लड़कों की तरह कड़क और बेखौफ समझती थी, आज उसने उसके उस सख्त मुखौटे को मरोड़ कर रख दिया था। चॉल मालिक के दिमाग में यही सोच चल रही थी कि आखिरकार उसने सिमरन भाई को भी चॉल की बाकी कमज़ोर और आम लड़कियों की तरह अपने नीचे झुकाकर एक औरत बना ही दिया था।दोनों एक ही बिस्तर के पास खड़े अपनी सांसें दुरुस्त कर रहे थे—एक अपनी जवानी के इस नए अहसास और समर्पण से खुश थी, तो दूसरा अपने पुरुष प्रधान अहंकार की इस बड़ी जीत पर मन ही मन जश्न मना रहा था।कमरे के भीतर की भारी और गर्म हवा अब धीरे-धीरे शांत हो रही थी। चॉल मालिक ने एक गहरी सांस ली और सिमरन की ढलती काया को आखिरी बार घमंड भरी नज़रों से देखा। उसके चेहरे पर अपनी इस बड़ी जीत का सुरूर साफ चमक रहा था। उसने ज़मीन पर बिखरे अपने कपड़े उठाए, उन्हें झाड़ा और बिना एक शब्द बोले, अपने बदन पर वापस डाल लिए। अपनी बेल्ट को कसते हुए उसने एक शातिर मुस्कान के साथ सिमरन की तरफ देखा, जो अभी भी बिस्तर के सहारे टिकी हुई थी, और फिर कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर की संकरी गलियों में गायब हो गया। उसके जाते ही दरवाज़ा एक हल्के से शोर के साथ वापस बंद हो गया।चॉल मालिक के जाते ही कमरे में एक गहरा सन्नाटा पसर गया।सिमरन का पूरा बदन इस वक्त बुरी तरह थक चुका था। उसके पैर कांप रहे थे और **** का जर्रा-जर्रा इस नए और तीखे अनुभव के असर से तप रहा था। उसने अपनी बची-कुची ताकत समेटी और हांफते हुए बिस्तर पर पूरी तरह ढह गई। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, और उसके मुँह से गर्म सांसें निकल रही थीं।
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थाने का पहला दिन: चुलबुलापन और वर्दी का रौब
Updated at Jun 29, 2026, 07:34
सुबह की पहली किरण जब सिमरन के कमरे की खिड़की से छनकर उसके चेहरे पर पड़ी, तो उसने अपनी आँखें एक झटके में खोल दीं। आज का दिन कोई आम दिन नहीं था। कैलेंडर की तारीख चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी—**1 जून**। आज सिमरन पूरे अठारह साल की हो गई थी, लेकिन इस जन्मदिन का तोहफा केक या गुब्बारे नहीं, बल्कि खाकी वर्दी थी।बचपन से ही पूरे मोहल्ले की नाक में दम करने वाली, कभी किसी की साइकिल छुपा देने वाली तो कभी पेड़ से आम चुराकर भागने वाली नटखट सिमरन आज एक IPS अधिकारी के रूप में अपनी ड्यूटी का पहला कदम उठाने जा रही थी।कांच के सामने खड़े होकर जब उसने अपनी वर्दी की आखिरी क्रीज को ठीक किया और सिर पर पुलिस की टोपी लगाई, तो उसकी आँखों की शरारत में एक अजीब सा रौब आ गया। उसने खुद को ही शीशे में देखकर एक आँख मारी और बुदबुदाई, *"चलो सिमरन, अब तक तो सिर्फ मोहल्ला परेशान था, आज से अपराधियों की शामत आने वाली है।"*## सिटी कोतवाली का नजाराशहर का मुख्य थाना, 'सिटी कोतवाली', हमेशा की तरह अपनी चिर-परिचित गंभीर और तनावपूर्ण लय में धड़क रहा था। चारों तरफ फाइलों के ढेर, कंप्यूटर के कीबोर्ड की खटखट, और हवालात से आती किसी मुल्जिम की धीमी आवाजें। तभी थाने के भारी लकड़ी के दरवाजे से एक ऐसी ऊर्जा ने प्रवेश किया, जिसने वहाँ की थमी हुई हवा को एकदम से बदल दिया।सिमरन ने जैसे ही कदम अंदर रखा, उसके बूटों की कड़क आवाज गूँज उठी। पुलिसकर्मी जो अपनी-अपनी फाइलों में डूबे थे, सर उठाकर देखने लगे। अठारह साल की एक लड़की, जिसके चेहरे पर दूध जैसी मासूमियत थी, लेकिन बदन पर सजी खाकी वर्दी और चाल का आत्मविश्वास किसी तपे हुए अफसर जैसा था। उसकी आँखों में अब भी वही पुरानी चुलबुलापन तैर रहा था, जिसे वह चाहकर भी छिपा नहीं पा रही थी।वह बिना रुके, सीधे सीनियर ऑफिसर—**सीनियर सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस (SSP) राघवेंद्र सिंह** के केबिन की तरफ बढ़ी।## केबिन का सन्नाटा और वो पहला सैल्यूटSSP राघवेंद्र सिंह एक सख्त, तजुर्बेकार और अनुशासनप्रिय अफसर थे। उनकी मेज पर गंभीर मामलों की फाइलें बिखरी पड़ी थीं और वे अपनी चाय का घूंट लेते हुए किसी केस की गुत्थी सुलझाने में मसरूफ थे। उनके चेहरे की झुर्रियां उनके कड़े अनुभवों की गवाही देती थीं।*तभी दरवाजे पर 'टक-टक' की आवाज हुई।*राघवेंद्र जी ने बिना सिर उठाए कहा, *"आ जाओ।"*दरवाजा खुला, लेकिन कोई अंदर नहीं आया। कुछ सेकंड की खामोशी के बाद, एक खनकती हुई, जोश से भरी आवाज पूरे केबिन में गूँज उठी:> **"सिमरन, IPS, Sir! ड्यूटी के पहले दिन, आपकी कस्टडी में हाजिर हूँ!"**> राघवेंद्र जी ने चौंककर सिर उठाया। सामने सिमरन खड़ी थी—चेहरे पर एक बड़ी सी, बेबाक मुस्कान, और हाथ माथे के पास एकदम सटीक 'सैल्यूट' की मुद्रा में थमा हुआ। उसकी इस अजीब सी 'हाजिरी' और चुलबुले अंदाज को देखकर राघवेंद्र जी का चश्मा नाक पर थोड़ा नीचे खिसक आया।## जब टकराया तजुर्बा और अल्हड़पनराघवेंद्र जी ने धीरे से अपनी चाय का कप रखा, अपनी पीठ को कुर्सी के सहारे टिकाया और सिमरन को ऊपर से नीचे तक देखा। उनके चेहरे के सख्त भाव थोड़े ढीले पड़े, लेकिन उन्होंने अपनी गंभीरता बनाए रखने की कोशिश की।*"तो तुम हो सिमरन..."* राघवेंद्र जी ने अपनी भारी आवाज में कहा, *"तुम्हारे ट्रेनिंग सेंटर के हेड का फोन आया था मेरे पास। कह रहे थे कि लड़की दिमाग की बहुत तेज है, लेकिन जितनी तेज है, उतनी ही नटखट और आफत की पुड़िया है। कानून की किताबें तो तुमने रट लीं, लेकिन क्या तुम्हें पता है कि यह पुलिस थाना है? यहाँ हँसने और शरारत करने का वक्त नहीं मिलता।"*सिमरन ने सैल्यूट नीचे किया, उसकी मुस्कान और गहरी हो गई। वह एक कदम आगे बढ़ी और अपनी पलकें झपकाते हुए बोली:*"सर, ट्रेनिंग सेंटर वाले तो मेरी तारीफ में कसीदे पढ़ते ही रहते हैं! और रही बात शरारत की... तो सर, वो तो मेरे खून में है। लेकिन मैं आपको यकीन दिलाती हूँ, मेरी शरारत सिर्फ अपनों का दिल बहलाने के लिए है। अपराधियों के लिए तो मेरा ये नाम ही काफी होगा। आप बस मुझे कोई काम सौंपिए, फिर देखिये कि यह 18 साल की लड़की कैसे आपके इस थाने का नाम रोशन करती है!"*राघवेंद्र सिंह सिमरन की इस बेबाकी और आत्मविश्वास को देखकर अंदर ही अंदर मुस्कुरा उठे। उन्हें समझ आ गया था कि यह लड़की पारंपरिक पुलिस अफसरों जैसी नहीं है, लेकिन इसके इरादे चट्टान की तरह मजबूत हैं।उन्होंने टेबल पर रखी एक मोटी सी फाइल सिमरन की तरफ बढ़ाई और कहा, *"ठीक है सिमरन। तुम्हारी पहली परीक्षा आज से ही शुरू होती है। यह शहर का एक बेहद पेचीदा मामला है। जाओ, और साबित करो कि तुम्हारी बातों में जितना दम है, उतना ही दम तुम्हारी जासूसी में भी है।"*सिमरन ने फाइल अपने हाथ में ली, उसे सीने से चिपकाया और एक बार फिर पूरे रौब से सैल्यूट ठोकते हुए बोली, *"यस सर! मिशन शुरू!"* और वह अपने बूटों की खटखट के साथ केबिन से बाहर निकल गई, पीछे छोड़ गई राघवेंद्र जी के चेहरे पर एक उम्मीद भरी मुस्कान।क्या सिमरन इस पहले पेचीदा मामले को अपने अनोखे और चुलबुले अंदाज से सुलझा पाएगी? इस उपन्यास को आगे बढ़ाने के लिए, क्या आप चाहते हैं कि हम उसके इस पहले केस की तहकीकात शुरू करें?
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कजरी
Updated at Jun 6, 2026, 07:11
सूरज अभी पूरब के पहाड़ों के पीछे से ठीक से झाँका भी नहीं था कि शिवपालपुर गाँव की गलियों में कोहराम मच चुका था। गाँव की सुबह आमतौर पर भजनों, गाय-भैंसों की रंभाने की आवाज़ और चूल्हों से उठते धुएं के साथ होती थी। लेकिन आज की सुबह कुछ अलग थी। आज की सुबह कजरी के अठारहवें साल में कदम रखने की गवाह जो बन रही थी।कजरी—नाम जितना सांवला और गहरा था, लड़की उतनी ही उजली, चुलबुली और हवा के झोंके जैसी बेलगाम। आज उसका अठारहवां जन्मदिन था। गाँव के कायदे-कानून कहते थे कि अठारह की होते ही लड़की के सिर पर पल्लू और पैरों में मर्यादा की बेड़ियाँ आ जानी चाहिए। लेकिन कजरी? वह तो जैसे शिवपालपुर के सारे नियमों को अपने अँगूठे पर नचाने के लिए ही पैदा हुई थी।"अरे दौड़ो रे! कोई रोको उस कलमुँही को! लाज-शर्म सब बेच खाई है इस लड़की ने!"गाँव के सबसे बुजुर्ग और रूढ़िवादी रामखिलावन चाचा अपनी लाठी पटकते हुए नीम के पेड़ के नीचे हाँफ रहे थे। उनके चश्मे का शीशा धुंधला हो चुका था, लेकिन जो नजारा उन्होंने अभी-अभी देखा था, उसने उनके बुढ़ापे के बचे-कुचे उसूलों को हिलाकर रख दिया था।## हंगामा-ए-बरपागाँव के मुख्य कुएँ के पास, जहाँ सुबह-सुबह औरतें पानी भरने और मर्द दातून करने जुटते थे, वहाँ सन्नाटा पसर गया था। वजह साफ़ थी। कजरी ठीक कुएँ की मुँडेर पर खड़ी थी।कोई सलवार-सूट नहीं, कोई घाघरा-चोली नहीं। वह लाल रंग की ब्रा और काले रंग की पैंटी पहने, भीगे बालों को झटकते हुए खिलखिलाकर हँस रही थी। उसकी अठारह साल की अल्हड़ जवानी और बेबाक बदन पर भोर की पहली किरणें ऐसे चमक रही थीं जैसे किसी संगमरमर की मूरत पर रोशनी पड़ रही हो।> "क्या हुआ चाचा? कभी कोई लड़की नहीं देखी क्या? या इस उम्र में भी दिल धड़कने लगा?" कजरी ने कमर पर हाथ रखकर, आँख मारते हुए रामखिलावन को चिढ़ाया।> गाँव की औरतें अपनी साड़ियों के पल्लू से आँखें मूंदने का नाटक कर रही थीं, लेकिन उंगलियों के बीच की जगह से कजरी को घूर भी रही थीं। कुछ बड़बड़ा रही थीं, "हाय दइया! ये कलयुग नहीं, महाकलयुग है! ऐसी बेशर्म लड़की तो खानदान डुबो देगी।"वहीं, गाँव के जवान लड़के—जो रोज़ सुबह खेतों की तरफ जाने के बहाने ढूंढते थे—आज कुएँ के पास ही जम गए थे। उनकी निगाहें कजरी के इस बिंदास और कातिलाना अंदाज़ पर टिकी थीं। कोई विमल चबाना भूल गया था, तो किसी के हाथ से दातून गिर गई थी।## बगावत या बस एक शरारत?कजरी के लिए यह कोई अश्लीलता नहीं, बल्कि गाँव के उन ठेकेदारों के मुंह पर एक करारा तमाचा था जो रोज़ उसकी स्कर्ट की लंबाई और कुर्ते के गले को नापते थे। कल ही तो पंचायत ने फैसला सुनाया था कि गाँव की लड़कियां जींस नहीं पहनेंगी और शाम ढलने के बाद घर से बाहर नहीं निकलेंगी। कजरी ने उसी वक्त ठान लिया था कि वह इस बंदिश की धज्जियां उड़ाकर रहेगी।"कजरी! नीचे उतर, ओ कजरी!"भीड़ को चीरते हुए कजरी की माँ, बिमला देवी, हाथ में एक बड़ी सी चादर लेकर रोती-बिलखती भागती हुई आईं। उनका चेहरा शर्म और डर से लाल था।"नीचे उतर बेटी! लाज रख ले मेरी! तेरे बापू को पता चलेगा तो वो कुएँ में कूद जाएंगे!" बिमला ने चादर कजरी की तरफ फेंकते हुए कहा।कजरी ने हवा में ही चादर को लपक लिया, लेकिन उसे ओढ़ने के बजाय उसने उसे एक महारानी के केप (Cape) की तरह अपनी पीठ पर बांध लिया। वह कुएँ से नीचे कूदी—एकदम हिरणी जैसी फुर्ती के साथ।"माँ, बापू को बोलो कि कुएँ में कूदने की ज़रूरत नहीं है। पानी बहुत ठंडा है, उन्हें जुकाम हो जाएगा!" कजरी ने हँसते हुए अपनी माँ के गाल चूमे।### पंचायत का बुलावाकजरी का यह 'हंगामा' सिर्फ कुएँ तक सीमित नहीं रहा। दोपहर होते-होते यह खबर पूरे शिवपालपुर और आसपास के तीन गाँवों में आग की तरह फैल गई। स्मार्टफोन के इस दौर में, गाँव के किसी लड़के ने चुपके से कजरी का एक छोटा सा वीडियो बना लिया था, जो अब 'शिवपालपुर की बिजली' नाम से व्हाट्सएप ग्रुप्स में तैर रहा था।शाम को गाँव के बरगद के पेड़ के नीचे एक आपातकालीन पंचायत बुलाई गई। मुखिया गजानन सिंह अपनी मूंछों को ताव देते हुए हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। उनके चेहरे पर गंभीर शिकन थी।"सोनू के बापू, तुम्हारी लड़की ने आज जो किया है, उसने हमारे गाँव की पगड़ी को धूल में मिला दिया है। अठारह साल की लड़की, और ऐसे तंग कपड़ों में... छी! राम-राम," मुखिया ने थूकते हुए कहा।कजरी के पिता, रामस्वरूप, सिर झुकाए हाथ जोड़े खड़े थे। उनकी आँखों में आँसू थे। लेकिन तभी भीड़ को चीरती हुई कजरी खुद वहाँ आ पहुँची। इस बार उसने एक साधारण सी सूती साड़ी पहनी थी, लेकिन उसके चलने का अंदाज़ और आँखों की चमक वही पुरानी थी।> "मुखिया जी! पगड़ी सिर पर होती है, किसी लड़की के कपड़ों में नहीं छिपी होती," कजरी की आवाज़ पूरी पंचायत में गूंज उठी।> सबके मुंह खुले के खुले रह गए। एक अठारह साल की लड़की, जिसके ऊपर पूरा गाँव थू-थू कर रहा था, वह बिना किसी डर के पंचायत के सामने आँखें मिलाकर खड़ी थी।शिवपालपुर के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू हो चुका था। कजरी का यह हंगामा सिर्फ कपड़ों का नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सोच के खिलाफ एक ऐसी जंग की शुरुआत थी, जिसे पूरा गाँव आसानी से भूल नहीं पाएगा।---## अध्याय: बरगद की छाँव और धड़कते दिलपंचायत की वो तूफानी शाम बीत चुकी थी, लेकिन शिवपालपुर की हवाओं में अभी भी कजरी के नाम की सनसनी घुली हुई थी। गाँव के लोग सोच रहे थे कि कल की डांट और हंगामे के बाद कजरी शायद घर के किसी कोने में दुबक कर रो रही होगी। लेकिन कजरी को समझना गाँव वालों के बस की बात कहाँ थी? वह तो उस बहती नदी की तरह थी, जिसे चट्टानें रोकने की कोशिश करें तो वह अपना रास्ता और ज़्यादा खूंखार या खूबसूरत बना लेती है।अगली सुबह, जब गाँव के ज़्यादातर लोग खेतों की तरफ जा चुके थे, कजरी अपने उसी बेबाक और चुलबुले अंदाज़ में घर से निकल पड़ी। आज फिर उसने समाज के बनाए बंधनों को ठेंगा दिखाते हुए सिर्फ अपनी पसंद के अंतःवस्त्र पहने हुए थे।
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गली का गुंडा सिमी भाई
Updated at Jun 4, 2026, 09:57
सिमी भाई ने जग्गू और बिल्लू की बात सुनकर हवा में हाथ लहराया और अपनी जेब में हाथ डालते हुए बोली, "अबे चल बे, बहुत हो गई चाय-वाय। चल बस अड्डे चलते हैं, आज वहाँ तगड़ा माल साफ करेंगे। हाथ साफ़ किए कई दिन हो गए!"उसका यह हुक्म सुनते ही जग्गू और बिल्लू ने अपनी चाय के कुल्हड़ फटाफट नीचे रखे और खड़े हो गए। सिमी भाई अपनी उसी ढीली-ढाली हाफ पैंट और खुली कॉलर वाली शर्ट में, अंदर से पूरी तरह बेफिक्र और नंगी, अपने उसी खास टपोरी अंदाज़ में आगे बढ़ गई।तीनों दोस्त एक कतार में बस अड्डे की तरफ चल दिए। रास्ते भर सिमी भाई अपनी आदतन तीखी सीटी बजाती रही और राह चलते लोगों को अपनी रंगबाज़ नजरों से घूरती रही। जग्गू और बिल्लू उसके अगल-बगल चल रहे थे, और पूरा माहौल एक बार फिर उनके उसी पुराने, बेखौफ टपोरी रंग में रंग चुका था।
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