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Mai akela hun

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Blurb

बाहर शहर में ज़िंदगी का शोर था, लेकिन जूलियन के कमरे के अंदर का सन्नाटा एक भारी बोझ की तरह था। वह सन्नाटा उसकी छाती को इस कदर दबा रहा था कि सांस लेना भी भारी लग रहा था।जूलियन एक अंदरूनी अकेलेपन से जूझ रहा था—एक ऐसा गहरा, चुभता हुआ खालीपन जो किसी भीड़ भरे कमरे के बीच भी एक खुले ज़ख्म की तरह दर्द देता था। बात सिर्फ इतनी नहीं थी कि वह अकेला था; दर्द तो इस बात का था कि वह सबके बीच होकर भी पूरी तरह अदृश्य (गायब) था। उसे लगता था जैसे वह कांच की एक मोटी दीवार के पीछे कैद कोई भूत हो, जो अपनी पूरी ताकत से चीख रहा है, और बाकी दुनिया मुस्कुराती हुई उसके पास से गुज़र रही है—बिल्कुल बेखबर।उसका हर एक दिन नाटक करने की एक कला बन चुका था। वह काम पर जाता, अपने चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लाता, और अपने सहकर्मियों की हंसी में अपनी हंसी मिला देता। वह एक सामान्य, खुशहाल इंसान होने का नाटक बखूबी करता। लेकिन इस दिखावे में वह अंदर से टूट जाता था। यह एक ऐसा दर्दनाक अभिनय था जो उसकी रूह को लहूलुहान कर देता था। सबसे बुरा तब लगता था जब इस नाटक के बाद एक गहरा आत्म-ग्लानि (शर्म) का अहसास होता था। वह अपने बेडरूम के अंधेरे में खुद से फुसफुसाता, "मैं ऐसा क्यों हूँ? मैं किसी से दिल से क्यों नहीं जुड़ पाता?"यह दर्द उस वक्त और तीखा हो जाता था जब वह किसी से बात करने की कोशिश करता। वह अपनी कोई बात, अपने असली वजूद का कोई हिस्सा सामने रखने के लिए मुंह खोलता, लेकिन शब्द उसके गले में ही घुट जाते। किसी के द्वारा ठुकरा दिए जाने का डर, या उससे भी बुरा—सामने वाले की आंखों में एक कोरा, बेरुखापन देखने का खौफ, उसे हमेशा खामोश रहने पर मजबूर कर देता। कोशिश करके हार जाने का दर्द, अपनी इसी सुरक्षित पर दर्दनाक जेल में बंद रहने से कहीं ज्यादा था। वह इंसानी अहसास, किसी अपनेपन के स्पर्श के लिए तरस रहा था। वह चाहता था कि कोई उसकी आंखों में देखे और उसके इस दर्द को समझे, फिर भी वह मदद मांगने से डरता था।एक बारिश भरी दोपहर, यह दर्द बर्दाश्त से बाहर हो गया। एक छोटे से कैफे में, जहां दोस्तों और प्रेमियों की बातों की गर्माहट गूंज रही थी, जूलियन की छाती भारी हो गई। आसपास की उस ज़िंदादिली और अपने अंदर की उस बर्फीली खामोशी के बीच का अंतर सहने लायक नहीं था। उसकी आंख से एक आंसू टपका, गर्म और कड़वा। उसने जल्दी से उसे पोंछ लिया, इस डर से कि कहीं कोई उसकी इस बेबसी को देख न ले।तभी क्लारा, एक बुजुर्ग महिला जिनकी आंखों में गहरी समझ और थकावट थी, उनके सामने वाली कुर्सी पर आकर बैठ गईं। उन्होंने जूलियन के चेहरे के उस झूठे मुखौटे को नहीं देखा; उन्होंने देखा तो उसके कांपते हुए हाथ और उसकी आंखों का वह खालीपन।"आज दुनिया का बोझ कुछ ज़्यादा ही भारी लग रहा है, है ना?" उन्होंने बेहद नरमी से पूछा। उनकी आवाज़ जूलियन की बनाई हुई हर दीवार को चीरती हुई अंदर तक चली गई।जूलियन ने मुश्किल से थूक निगला, उसका गला ऐसा लग रहा था जैसे कांच के टुकड़ों से भरा हो। अब वह और नाटक नहीं कर सकता था। उसका दर्द बहने के लिए बेताब था। "मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं डूब रहा हूँ," वह रुंधे हुए गले से फुसफुसाया। उसकी आवाज़ में बरसों से छुपे हुए आंसू साफ महसूस हो रहे थे। "और हर कोई किनारे पर खड़ा होकर मुझे डूबते हुए देख रहा है, लेकिन कोई आगे नहीं आता।"क्लारा बिल्कुल नहीं झिझकीं। उन्होंने कोई झूठी सांत्वना नहीं दी और न ही यह कहा कि 'सब ठीक हो जाएगा'। इसके बजाय, उनकी अपनी आंखें भी उसी दुख से भर आईं। उन्होंने टेबल के पार अपना हाथ बढ़ाया और जूलियन की कांपती, ठंडी उंगलियों पर अपना बुजुर्ग, गर्म हाथ रख दिया।"मैं उस समंदर को जानती हूँ, जूलियन," उनकी आवाज़ भी थोड़ी कांपी। "सबसे मुश्किल बात यह मान लेना है कि तुम्हारा ठिकाना सिर्फ अंधेरा ही है। यह बात हर दिन दिल तोड़ती है, जब तुम इस इंतज़ार में रहते हो कि कोई आएगा और तुम्हें बचाएगा, जबकि तुम्हें खुद सतह पर तैर कर आना भी नहीं आता।"अगले एक घंटे तक, जूलियन एक नैपकिन में मुंह छुपाकर धीरे-धीरे रोता रहा। उसने बरसों का वह अकेलापन, वह तड़प एक अजनबी के सामने बिखेर दी, जिसने बस उसका हाथ थाम रखा था। उसने उन खौफनाक रातों का ज़िक्र किया, उस डर को बयां किया कि वह दुनिया के लिए कितना बेगाना हो चुका है, और उसे लगता है कि उसे कभी कोई प्यार नहीं कर सकता। क्लारा ने उसकी हर टूटी, अधूरी बात को बेहद ध्यान से सुना और अपनी मजबूत पकड़ से उसे यह अहसास कराया कि वह अकेला नहीं है।जब क्लारा के जाने का वक्त आया, तो जूलियन की छाती का वह दर्द जादू की तरह गायब नहीं हुआ था। वह अब भी दुख रहा था, एक गहरे ज़ख्म की तरह। लेकिन ज़िंदगी में पहली बार, वह दर्द सिर्फ उसका अकेले का नहीं था। उसका एक हिस्सा किसी ने बांट लिया था, किसी ने उसे महसूस किया था और सही माना था।जब वह ढलती हुई बारिश के बीच घर की तरफ बढ़ा, तो उसके आसपास की वह अदृश्य दीवार पूरी तरह तो नहीं टूटी, लेकिन उसमें एक दरार ज़रूर आ गई थी। वह अब भी दर्द में था, लेकिन अब वह अंधेरे में पूरी तरह अकेला नहीं था।

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Anchal ka saaya - MAA
आँचल का साया: एक माँ का महात्यागभाग 1: देवकी का संसारपहाड़ों की तलहटी में बसे एक छोटे से गाँव में देवकी नाम की एक महिला रहती थी। देवकी का जीवन कभी आसान नहीं रहा। कम उम्र में ही उसके पति का देहांत हो गया था, और उसके पास जीने की एकमात्र वजह उसका तीन साल का बेटा, माधव था। देवकी के पास न तो कोई बड़ी जमीन थी और न ही कोई बैंक बैलेंस। उसके पास थी तो बस एक टूटी हुई झोपड़ी, दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए दूसरों के खेतों में मजदूरी, और दिल में अपने बेटे के लिए समंदर जैसा गहरा प्यार।गाँव के लोग अक्सर देवकी से कहते, "देवकी, तू अभी जवान है। दूसरी शादी कर ले, तेरी जिंदगी संवर जाएगी। इस बच्चे के साथ अकेले कैसे कटेगी जिंदगी?"देवकी हमेशा मुस्कुराकर अपने आंसुओं को छुपा लेती और अपने सीने से माधव को लगाते हुए कहती, "मेरा माधव ही मेरी दुनिया है। इसके चेहरे की मुस्कान देखकर मुझे मेरी पूरी जिंदगी मिल जाती है। मुझे किसी और सहारे की जरूरत नहीं।"देवकी सुबह सूरज उगने से पहले उठती थी। कड़ाके की ठंड हो या चिलचिलाती धूप, वह गाँव के जमींदार के खेतों में काम करने निकल जाती। पैर में चप्पल नहीं होती थी, लेकिन उसके कदम कभी डगमगाते नहीं थे, क्योंकि उसे पता था कि शाम को घर लौटने पर उसका माधव भूखा होगा। वह दिनभर पसीना बहाती, और बदले में जो थोड़े-बहुत पैसे या अनाज मिलता, उससे वह माधव के लिए दूध और रोटियाँ बनाती। खुद कई बार सिर्फ पानी पीकर सो जाती, लेकिन माधव का पेट हमेशा भरा रहता।भाग 2: किस्मत की क्रूर मारसमय बीतता गया और माधव अब सात साल का हो चुका था। वह गाँव के सरकारी स्कूल में पढ़ने लगा था। माधव पढ़ाई में बहुत होनहार था। वह अक्सर देवकी से कहता, "माँ, मैं बड़ा होकर बहुत बड़ा डॉक्टर बनूँगा। फिर तुम्हें कभी खेतों में काम नहीं करना पड़ेगा। तुम्हारे पैरों के छालों के लिए मैं खुद दवा बनाऊँगा।"देवकी माधव की इन बातों को सुनकर अपने सारे दुःख भूल जाती। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।एक दिन, जब माधव स्कूल से लौट रहा था, अचानक वह बेहोश होकर गिर पड़ा। उसके मुंह से झाग निकल रहा था और शरीर पूरी तरह ठंडा पड़ चुका था। गाँव के लोग उसे उठाकर देवकी की झोपड़ी में लाए। देवकी का कलेजा कांप उठा। वह बदहवास होकर माधव को अपनी गोद में लेकर रोने लगी।गाँव के छोटे डॉक्टर ने माधव को देखा और गंभीर आवाज में कहा, "देवकी, इसे शहर के बड़े अस्पताल ले जाना होगा। इसकी हालत बहुत नाजुक है। मुझे लगता है कि इसके दिल या दिमाग में कोई बड़ी बीमारी है।"देवकी के पास शहर जाने के पैसे तो दूर, किराए के भी पैसे नहीं थे। उसने गाँव के जमींदार के सामने घुटने टेक दिए, "मालिक, मेरे माधव को बचा लीजिए। मैं जिंदगी भर आपके खेतों में बिना पैसों के काम करूँगी, बस मुझे थोड़े पैसे दे दीजिए।"जमींदार ने तरस खाकर कुछ पैसे दिए। देवकी माधव को गोदी में उठाकर रात के अंधेरे में शहर जाने वाली आखिरी बस में बैठ गई। बस की खिड़की से बाहर देखते हुए वह भगवान से बस एक ही भीख मांग रही थी, "हे ईश्वर, मेरे बच्चे को बचा ले। मेरी जान ले ले, पर मेरे माधव को कुछ मत होने देना।"भाग 3: अस्पताल का अंधेराशहर के सरकारी अस्पताल में जाँच के बाद डॉक्टरों ने जो कहा, उसने देवकी के पैरों के नीचे से जमीन खिसका दी। डॉक्टर ने बताया, "माधव की दोनों किडनियाँ पूरी तरह खराब हो चुकी हैं। अगर जल्द ही इसका ट्रांसप्लांट नहीं हुआ, तो यह बच्चा कुछ ही महीनों का मेहमान है।"देवकी डॉक्टर के पैरों में गिर पड़ी, "डॉक्टर साहब, मैं अनपढ़ हूँ, मुझे ये सब समझ नहीं आता। बस इतना बताइए कि मेरा बेटा कैसे ठीक होगा? मैं अपनी जान दे दूँगी उसके लिए।"डॉक्टर ने उसे सांत्वना देते हुए कहा, "इसके इलाज में लाखों रुपये का खर्च आएगा। और सबसे बड़ी बात, इसके लिए एक किडनी डोनर की जरूरत होगी जिसका ब्लड ग्रुप इससे मैच करे।"देवकी ने तुरंत कहा, "मेरी किडनी ले लो डॉक्टर साहब! मैं उसकी माँ हूँ, मेरा खून, मेरा सब कुछ उसका है।"जाँच के बाद पता चला कि देवकी की किडनी माधव से मैच कर रही थी। लेकिन असली समस्या पैसों की थी। ऑपरेशन और दवाओं के लिए पाँच लाख रुपयों की जरूरत थी। सन 2026 के इस दौर में भी, एक गरीब माँ के लिए पाँच लाख रुपये किसी हिमालय पहाड़ को उठाने जैसा था।देवकी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने शहर की सड़कों पर भीख मांगना शुरू किया। वह लोगों के सामने हाथ फैलाती, "मेरे बच्चे को बचा लो, वह अस्पताल में है।" कुछ लोग तरस खाकर एक-दो रुपये दे देते, तो कुछ उसे ढोंगी समझकर आगे बढ़ जाते। रातों को वह अस्पताल के बरामदे में ठंडी जमीन पर सोती। उसने कई-कई दिनों तक खाना नहीं खाया, ताकि वह पैसों को बचा सके।भाग 4: एक माँ का अदृश्य सौदामहीने बीतते जा रहे थे, और माधव की हालत हर दिन बिगड़ती जा रही थी। दवाओं के सहारे उसका शरीर सूज गया था। उसकी आँखें अंदर धंस गई थीं। वह अपनी माँ से कहता, "माँ, मुझे बहुत दर्द होता है। क्या मैं कभी ठीक नहीं हूँगा? क्या मैं मर जाऊँगा?"देवकी अपनी आँखों के आँसू पोंछकर मुस्कुराती और कहती, "नहीं मेरा बच्चा, तू बिल्कुल ठीक हो जाएगा। डॉक्टर अंकल ने कहा है कि तू बहुत जल्द दौड़ने लगेगा।"पैसों का इंतजाम नहीं हो पा रहा था। कुल मिलाकर सिर्फ पचास हजार रुपये ही जमा हो पाए थे। समय रेत की तरह हाथ से फिसल रहा था। तभी एक दिन अस्पताल के बाहर देवकी को एक आदमी मिला। वह अमीर घरों के लिए अंगों के अवैध व्यापार या गुप्त समझौतों का काम करता था (हालांकि कानूनन यह अपराध था, लेकिन एक मजबूर माँ के लिए कानून से बड़ा उसके बच्चे का जीवन था)।उस आदमी ने देवकी से कहा, "तुम्हें अपने बच्चे के लिए पैसे चाहिए न? मैं तुम्हें पाँच लाख रुपये दिलवा सकता हूँ। लेकिन बदले में तुम्हें अपनी एक आँख और अपनी आधी लिवर किसी अमीर मरीज को देनी होगी। और हाँ, तुम्हारी एक किडनी तो तुम्हारे बच्चे को जाएगी ही।"देवकी ने एक पल भी नहीं सोचा। उसने उस आदमी का हाथ पकड़ लिया और रोते हुए कहा, "तुम मेरी दोनों आँखें ले लो, मेरा पूरा शरीर ले लो, बस मुझे अभी पैसे दे दो ताकि मेरे माधव का ऑपरेशन हो सके। मुझे इस शरीर का क्या करना है अगर मेरा बच्चा ही नहीं रहेगा।"भाग 5: ऑपरेशन और जुदाईसमझौता हो गया। देवकी को पैसे मिल गए। उसने तुरंत अस्पताल की फीस जमा की। डॉक्टरों को लगा कि किसी संस्था ने देवकी की मदद की है। ऑपरेशन का दिन तय हुआ।ऑपरेशन थियेटर में जाने से पहले माधव और देवकी को पास-पास के स्ट्रेचर पर लिटाया गया था। माधव ने बहुत कमजोर आवाज में अपनी माँ का हाथ पकड़ा और कहा, "माँ, मुझे डर लग रहा है।"देवकी ने माधव के माथे को चूमा। उसकी आँखों से आंसू टपक कर माधव के गालों पर गिरे। उसने कहा, "डरना नहीं मेरे लाल। जब तू आँखें खोलेगा, तो तेरा सारा दर्द गायब हो चुका होगा। तेरी माँ हमेशा तेरे साथ रहेगी। इस दिल की धड़कन में, तेरी साँसों में।"ऑपरेशन कई घंटों तक चला। देवकी की एक किडनी माधव के शरीर में ट्रांसप्लांट कर दी गई। इसके साथ ही, गुप्त समझौते के तहत देवकी के शरीर के अन्य अंग भी निकाल लिए गए। देवकी का शरीर इस भारी सर्जरी और कुपोषण के कारण बहुत कमजोर हो चुका था। वह कोमा में चली गई।दूसरी तरफ, माधव का ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा। कुछ दिनों बाद जब माधव ने आँखें खोलीं, तो उसने सबसे पहले अपनी माँ को पुकारा, "माँ... माँ कहाँ है?"नर्सों और डॉक्टरों ने उसे बताया कि उसकी माँ दूसरे वार्ड में आराम कर रही है। माधव धीरे-धीरे ठीक होने लगा। उसके चेहरे पर रौनक वापस आने लगी। लेकिन देवकी कभी होश में नहीं आई। उसका कमजोर शरीर अब हार मान रहा था। उसने अपने जीवन का हर एक कतरा, अपनी हर एक साँस अपने बेटे के नाम कर दी थी।एक शाम, जब सूरज ढल रहा था, देवकी के दिल की धड़कनें रुक गईं। उसने बिना कोई शिकायत किए, बिना अपनी तकलीफ किसी को बताए, इस दुनिया को अलविदा कह दिया।भाग 6: विरासत और अहसासमाधव अब ठीक हो चुका था। जब उसे पता चला कि उसकी माँ अब इस दुनिया में नहीं रही, तो वह पागलों की तरह रोने लगा। उसने अस्पताल की दीवारों पर सिर पटक दिया, "माँ! तुम मुझसे झूठ बोल रही थी! तुमने कहा था तुम हमेशा मेरे साथ रहोगी! मुझे छोड़कर क्यों चली गई माँ?"अस्पताल के एक बूढ़े डॉक्टर ने माधव को गले से लगाया और देवकी का लिखा हुआ एक पत्र (जो उसने ऑपरेशन से पहले एक नर्स की मदद से लिखवाया था) माधव के हाथों में दिया।पत्र में लिखा था:"मेरे प्यारे माधव,जब तुम यह पत्र पढ़ रहे होगे, तो मैं तुम्हारे पास नहीं होऊँगी। लेकिन रोना मत मेरे बच्चे। तुम जब भी अपने सीने पर हाथ रखोगे, तुम्हें जो धड़कन सुनाई देगी, वह मेरी है। तुम्हारे शरीर में जो खून दौड़ रहा है, वह मेरा है। तुम्हारी आँखें जो दुनिया देखेंगी, उनमें मेरी भी एक उम्मीद होगी।मैंने तुम्हें कभी कोई खिलौना या सुख-सुविधा नहीं दी, लेकिन मैं तुम्हें एक लंबी और सेहतमंद जिंदगी देकर जा रही हूँ। खूब पढ़ना, बड़ा आदमी बनना और मेरी तरह ही दूसरों की मदद करना। तुम्हारी माँ तुमसे बहुत प्यार करती है।"माधव ने उस पत्र को अपने सीने से लगा लिया। वह समझ गया था कि उसकी माँ मरी नहीं है, बल्कि वह खुद माधव के रूप में जिंदा है।भाग 7: वर्षों बाद (उपसंहार)समय का चक्र चलता रहा। बीस साल बीत गए।आज शहर का सबसे बड़ा और मशहूर किडनी स्पेशलिस्ट डॉक्टर माधव था। उसने एक बहुत बड़ा अस्पताल खोला था, जिसका नाम था "देवकी मेमोरियल हॉस्पिटल"। इस अस्पताल के बाहर एक बहुत सुंदर संगमरमर की मूर्ति लगी थी—एक माँ की, जिसने अपनी गोद में एक बच्चे को उठा रखा था।इस अस्पताल में किसी भी गरीब मरीज से इलाज के पैसे नहीं लिए जाते थे। डॉक्टर माधव हर उस माँ के आंसू पोंछते थे जो अपने बच्चे के लिए लाचार होती थी।हर साल देवकी की पुण्यतिथि पर, डॉक्टर माधव उस मूर्ति के सामने घुटनों के बल बैठ जाते, अपनी आँखें बंद करते और कहते, "माँ, देखो तुम्हारा माधव आज हार नहीं माना। तुमने जो जिंदगी मुझे दान में दी थी, आज मैं उसे हजारों लोगों को बाँट रहा हूँ। तुम्हारी ममता की जीत हुई है, माँ।"हवा का एक झोंका आता, मानो देवकी अदृश्य रूप में माधव के सिर पर अपना हाथ रखकर कह रही हो—"जीते रहो, मेरे लाल।"

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