
बाहर शहर में ज़िंदगी का शोर था, लेकिन जूलियन के कमरे के अंदर का सन्नाटा एक भारी बोझ की तरह था। वह सन्नाटा उसकी छाती को इस कदर दबा रहा था कि सांस लेना भी भारी लग रहा था।जूलियन एक अंदरूनी अकेलेपन से जूझ रहा था—एक ऐसा गहरा, चुभता हुआ खालीपन जो किसी भीड़ भरे कमरे के बीच भी एक खुले ज़ख्म की तरह दर्द देता था। बात सिर्फ इतनी नहीं थी कि वह अकेला था; दर्द तो इस बात का था कि वह सबके बीच होकर भी पूरी तरह अदृश्य (गायब) था। उसे लगता था जैसे वह कांच की एक मोटी दीवार के पीछे कैद कोई भूत हो, जो अपनी पूरी ताकत से चीख रहा है, और बाकी दुनिया मुस्कुराती हुई उसके पास से गुज़र रही है—बिल्कुल बेखबर।उसका हर एक दिन नाटक करने की एक कला बन चुका था। वह काम पर जाता, अपने चेहरे पर एक झूठी मुस्कान लाता, और अपने सहकर्मियों की हंसी में अपनी हंसी मिला देता। वह एक सामान्य, खुशहाल इंसान होने का नाटक बखूबी करता। लेकिन इस दिखावे में वह अंदर से टूट जाता था। यह एक ऐसा दर्दनाक अभिनय था जो उसकी रूह को लहूलुहान कर देता था। सबसे बुरा तब लगता था जब इस नाटक के बाद एक गहरा आत्म-ग्लानि (शर्म) का अहसास होता था। वह अपने बेडरूम के अंधेरे में खुद से फुसफुसाता, "मैं ऐसा क्यों हूँ? मैं किसी से दिल से क्यों नहीं जुड़ पाता?"यह दर्द उस वक्त और तीखा हो जाता था जब वह किसी से बात करने की कोशिश करता। वह अपनी कोई बात, अपने असली वजूद का कोई हिस्सा सामने रखने के लिए मुंह खोलता, लेकिन शब्द उसके गले में ही घुट जाते। किसी के द्वारा ठुकरा दिए जाने का डर, या उससे भी बुरा—सामने वाले की आंखों में एक कोरा, बेरुखापन देखने का खौफ, उसे हमेशा खामोश रहने पर मजबूर कर देता। कोशिश करके हार जाने का दर्द, अपनी इसी सुरक्षित पर दर्दनाक जेल में बंद रहने से कहीं ज्यादा था। वह इंसानी अहसास, किसी अपनेपन के स्पर्श के लिए तरस रहा था। वह चाहता था कि कोई उसकी आंखों में देखे और उसके इस दर्द को समझे, फिर भी वह मदद मांगने से डरता था।एक बारिश भरी दोपहर, यह दर्द बर्दाश्त से बाहर हो गया। एक छोटे से कैफे में, जहां दोस्तों और प्रेमियों की बातों की गर्माहट गूंज रही थी, जूलियन की छाती भारी हो गई। आसपास की उस ज़िंदादिली और अपने अंदर की उस बर्फीली खामोशी के बीच का अंतर सहने लायक नहीं था। उसकी आंख से एक आंसू टपका, गर्म और कड़वा। उसने जल्दी से उसे पोंछ लिया, इस डर से कि कहीं कोई उसकी इस बेबसी को देख न ले।तभी क्लारा, एक बुजुर्ग महिला जिनकी आंखों में गहरी समझ और थकावट थी, उनके सामने वाली कुर्सी पर आकर बैठ गईं। उन्होंने जूलियन के चेहरे के उस झूठे मुखौटे को नहीं देखा; उन्होंने देखा तो उसके कांपते हुए हाथ और उसकी आंखों का वह खालीपन।"आज दुनिया का बोझ कुछ ज़्यादा ही भारी लग रहा है, है ना?" उन्होंने बेहद नरमी से पूछा। उनकी आवाज़ जूलियन की बनाई हुई हर दीवार को चीरती हुई अंदर तक चली गई।जूलियन ने मुश्किल से थूक निगला, उसका गला ऐसा लग रहा था जैसे कांच के टुकड़ों से भरा हो। अब वह और नाटक नहीं कर सकता था। उसका दर्द बहने के लिए बेताब था। "मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं डूब रहा हूँ," वह रुंधे हुए गले से फुसफुसाया। उसकी आवाज़ में बरसों से छुपे हुए आंसू साफ महसूस हो रहे थे। "और हर कोई किनारे पर खड़ा होकर मुझे डूबते हुए देख रहा है, लेकिन कोई आगे नहीं आता।"क्लारा बिल्कुल नहीं झिझकीं। उन्होंने कोई झूठी सांत्वना नहीं दी और न ही यह कहा कि 'सब ठीक हो जाएगा'। इसके बजाय, उनकी अपनी आंखें भी उसी दुख से भर आईं। उन्होंने टेबल के पार अपना हाथ बढ़ाया और जूलियन की कांपती, ठंडी उंगलियों पर अपना बुजुर्ग, गर्म हाथ रख दिया।"मैं उस समंदर को जानती हूँ, जूलियन," उनकी आवाज़ भी थोड़ी कांपी। "सबसे मुश्किल बात यह मान लेना है कि तुम्हारा ठिकाना सिर्फ अंधेरा ही है। यह बात हर दिन दिल तोड़ती है, जब तुम इस इंतज़ार में रहते हो कि कोई आएगा और तुम्हें बचाएगा, जबकि तुम्हें खुद सतह पर तैर कर आना भी नहीं आता।"अगले एक घंटे तक, जूलियन एक नैपकिन में मुंह छुपाकर धीरे-धीरे रोता रहा। उसने बरसों का वह अकेलापन, वह तड़प एक अजनबी के सामने बिखेर दी, जिसने बस उसका हाथ थाम रखा था। उसने उन खौफनाक रातों का ज़िक्र किया, उस डर को बयां किया कि वह दुनिया के लिए कितना बेगाना हो चुका है, और उसे लगता है कि उसे कभी कोई प्यार नहीं कर सकता। क्लारा ने उसकी हर टूटी, अधूरी बात को बेहद ध्यान से सुना और अपनी मजबूत पकड़ से उसे यह अहसास कराया कि वह अकेला नहीं है।जब क्लारा के जाने का वक्त आया, तो जूलियन की छाती का वह दर्द जादू की तरह गायब नहीं हुआ था। वह अब भी दुख रहा था, एक गहरे ज़ख्म की तरह। लेकिन ज़िंदगी में पहली बार, वह दर्द सिर्फ उसका अकेले का नहीं था। उसका एक हिस्सा किसी ने बांट लिया था, किसी ने उसे महसूस किया था और सही माना था।जब वह ढलती हुई बारिश के बीच घर की तरफ बढ़ा, तो उसके आसपास की वह अदृश्य दीवार पूरी तरह तो नहीं टूटी, लेकिन उसमें एक दरार ज़रूर आ गई थी। वह अब भी दर्द में था, लेकिन अब वह अंधेरे में पूरी तरह अकेला नहीं था।

