वह बोलता नहीं उसकी बंदूक बोलती है
*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम* 🌙
*इस शहर की फ़िज़ाओं में दो हुकूमतें साँस लेती हैं ऐ जान-ए-मन।*
*एक वो... जिसका आलम वर्दी वाले संभालते हैं।*
*और दूसरी... जिसकी सनद अयान खान की पलकों से जारी होती है।*
*पहली हुकूमत से अवाम खौफ़ खाती है।*
*दूसरी हुकूमत का नाम लेकर... बड़े-बड़े जिगर वालों का लहू पानी हो जाता है।*
*अयान खान।*
*सिन उनतीस बरस।*
*क़द छह फुट।*
*ज़ेब-ए-तन सियाह लिबास, लबों में सुलगती सिगरेट... क़ब्र के चराग़ जैसी।*
*चेहरा?*
*माशा-अल्लाह।*
*इतना हसीन कि रब ने फुर्सत से तराशा हो।*
*मगर ये हुस्न... ज़हर-ए-क़ातिल है।*
*ये हुस्न... मौत का पैग़ाम बनकर आता है।*
*अहल-ए-शहर कहते हैं... अयान खान की ख़ूबसूरती... जनाज़ों को आबाद करती है।*
*उसकी चश्म...*
*वीराना। गहरी। बेरहम।*
*गोया किसी ने उन आँखों से 'रहम' का हर्फ़ कुरेद कर निकाल दिया हो।*
*उन आँखों में नज़र करो... तो अपनी तक़दीर का कफ़न नज़र आता है।*
*वो गुंडा नहीं मोहतरम... न हफ्ता माँगता है।*
*वो इन सब से बुलंद है।*
*वो अदालत है। वो सज़ा है। वो फ़ैसला है।*
*उसके छह जानिसार हैं।*
*न वो अहबाब हैं... न ख़ादिम।*
*वो उसकी छह उंगलियाँ हैं।*
*अयान जिस जानिब इशारा कर दे... उधर अजल का साया लहरा जाता है।*
*वो लब नहीं हिलाता... निगाहों से फ़रमान सुनाता है।*
*और उसका फ़रमान... इस शहर की क़िस्मत का नौश्ता है।*
*गुज़िश्ता शब... उसने फ़ज़ा में उंगली जुम्बिश दी।*
*सुबह-सादिक़ छह घरों से... बिन नमाज़-ए-जनाज़ा के... मिट्टी उठी।*
*हवेली के सबसे बुलंद झरोखे से धुआँ आसमाँ को छू गया।*
*शहर जान गया... अयान खान ने स्याही से नहीं... लहू से तहरीर कर दी।*
*अयान के दामन में सब कुछ है।*
*दौलत... शोहरत... हैबत।*
*नहीं है तो सिर्फ़ एक शय...*
*सुकून-ए-क़ल्ब।*
*मगर...*
*इसी शहर के दूसरे गोशे में...*
*जहाँ अयान के हुक्म की सदाएँ नहीं पहुँचतीं...*
*वहाँ एक और आलम आबाद है।*
*एक ऐसा आलम... जहाँ हथियार नहीं... रंग हमकलाम होते हैं।* 🌈
*जहाँ गोलियाँ नहीं... क़हक़हे गूँजते हैं।*
*उसी शब... जब हवेली से धुआँ उठा...*
*एक कच्चे आशियाने से आवाज़ आई: "धड़ाम!"*
*"फ़ातिमा! अल्लाह रेहम करे! तू ठीक तो है ना बच्ची?"*
*आयशा आपा फ़िक्रमंद होकर दौड़ीं। पीछे समीर भाईजान।*
*दर वाज़ हुआ... और दोनों की निगाहें वहीं ठहर गईं।*
*पूरा हुजरा... जन्नत का नक़्शा बना पड़ा था।*
*दीवार पर आसमानी रंग... गोया फलक ज़मीं पर बिछ गया हो।*
*फ़र्श पर सुर्ख नन्हे नक़्श-ए-पा... जैसे कोई हूर-ए-जन्नत रक़्स करके गई हो।*
*एक कोने में ज़र्द आफ़ताब की किरनें... दूसरे में सब्ज़ चमन की बहार।*
*सत्तर रंग। सत्तर अदाएँ।*
*एक छोटे से हुजरे में... फ़ातिमा ने कुल कायनात समेट दी थी।*
*और वसत में खड़ी थी वो।*
*फ़ातिमा।*
*उम्र उन्नीस साल।*
*क़द पाँच फ़ुट दो इंच। नाज़ुक... आबगीने की गुड़िया सी... छू लो तो रेज़ा-रेज़ा हो जाए।*
*सर-ता-पा सियाह नक़ाब।*
*सिर्फ़ दो रोज़न।*
*और उन रोज़नों में...*
*दो सब्ज़ आँखें।* 💚
*फ़राख़... बादाम सी... सब्ज़ आँखें।*
*जिनमें शरारत थी... तीन बरस की तिफ़्ल जैसी।*
*मासूमियत थी... जैसे सहर की पहली शबनम।*
*और एक पुर-असरार कशिश थी...*
*कि जो एक मरतबा देख ले... वो उम्र भर की नींद खो दे।*
*न आयशा आपा ने... न समीर भाईजान ने... न मुहल्ले की किसी मोहतरमा ने...*
*आज तक उसका चेहरा देखा था।*
*फ़ातिमा बस मुस्कुरा देती थी... ख़ामोश रहती थी।*
*उसका नक़ाब... उसकी पहचान था। उसका सुकून था।*
*उसके पास न ज़र था... न शोहरत।*
*था तो बस... एक कच्चा आशियाना... रंगों की तश्तरी... और दिल में बे-शुमार ख़्वाब।*
*वो दुनिया के शर से बेख़बर थी।*
*उसे मालूम न था...*
*कि इसी शहर में... एक ऐसी हस्ती भी दम भरती है...*
*जिसकी एक नज़र-ए-इनायत... या नज़र-ए-ग़ज़ब... तक़दीरें बदल देती है।*
*एक तरफ़... वो जिसके नाम से हाकिम-ए-वक़्त के हाथ लरज़ जाते हैं।*
*दूसरी तरफ़... वो जिसके रंगों से दीवारें फ़िरदौस का मंज़र पेश करती हैं।*
*दो जहान। दो किनारे।*
*एक दोज़ख़ का सुल्तान।*
*एक जन्नत की शहज़ादी।*
*मगर रब-ए-कायनात की मर्ज़ी कुछ और थी।*
*उसने लौह-ए-महफ़ूज़ पर लिख दिया था...*
*कि इन दो किनारों को... एक समंदर बनना है।*
*मगर अभी नहीं।*
*अभी तो सिर्फ़ इब्तिदा है।*
*अभी तो फ़ासले हैं... अभी आज़माइशें हैं।*
*क्योंकि जब मौत की वीरान चश्म...*
*हयात की सब्ज़ आँखों से टकराएगी...*
*तो ज़मीं हिलेगी... आसमाँ काँपेगा।* 💚💀
*क्या होगा जब हुक्म का क़ानून...*
*सत्तर रंगों के ख़्वाब से उलझेगा?*
*इसके बाद... कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।*
*न वो हँसी। न वो हैबत। न वो फ़ातिमा।*
*न ही... अयान खान।*
*वल्लाहु आलम... अगला बाब जल्द।* 🌙
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पहले ये जान लो...
जब अयान खान की वीरान नज़र...
फ़ातिमा की सब्ज़ आँखों से टकराएगी...
तो इस शहर का कानून ही बदल जाएगा। 💚💀
EP 2 - सब्ज़ आँखों का ख़्वाब और सियाह रात का साया
जल्द आ रहा है... इंशाअल्लाह। 🌙