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हरी आंखों का गुनाह माफिया की मोहब्बत

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_जब अयान की सुर्ख़ चश्म फ़ातिमा के नक़ाब-ए-हिजाब से टकराईं... तो शहर का दूसरा क़ानून टूट गया।_ 🌙

_एक माफिया रोमांस... जहाँ मोहब्बत एक गुनाह है, और उसकी पिस्तौल सज़ा का फ़रमान लिखती है।_ 🔫

_19-साला फ़ातिमा की ज़मुर्रद जैसी सब्ज़ आँखों ने वो कर दिखाया... जो कोई गोली-ए-मर्ग ना कर सकी_ 💚

_उन्होंने मुंबई के सबसे ख़तरनाक गैंग लीडर, अयान ख़ान को ख़रीद लिया।_ 🖤

_वो मौत बेच कर अपनी हयात गुज़ारता था।_

_अब वो ज़िंदा महसूस करने के लिए मर रहा है।_ 🥀

_क्या उसकी गोली उसे बख़्श देगी?_ 🔫

_या उसकी मासूमियत उसे पहले ही मार डालेगी?_ 😭

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वह बोलता नहीं उसकी बंदूक बोलती है
*बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम* 🌙 *इस शहर की फ़िज़ाओं में दो हुकूमतें साँस लेती हैं ऐ जान-ए-मन।* *एक वो... जिसका आलम वर्दी वाले संभालते हैं।* *और दूसरी... जिसकी सनद अयान खान की पलकों से जारी होती है।* *पहली हुकूमत से अवाम खौफ़ खाती है।* *दूसरी हुकूमत का नाम लेकर... बड़े-बड़े जिगर वालों का लहू पानी हो जाता है।* *अयान खान।* *सिन उनतीस बरस।* *क़द छह फुट।* *ज़ेब-ए-तन सियाह लिबास, लबों में सुलगती सिगरेट... क़ब्र के चराग़ जैसी।* *चेहरा?* *माशा-अल्लाह।* *इतना हसीन कि रब ने फुर्सत से तराशा हो।* *मगर ये हुस्न... ज़हर-ए-क़ातिल है।* *ये हुस्न... मौत का पैग़ाम बनकर आता है।* *अहल-ए-शहर कहते हैं... अयान खान की ख़ूबसूरती... जनाज़ों को आबाद करती है।* *उसकी चश्म...* *वीराना। गहरी। बेरहम।* *गोया किसी ने उन आँखों से 'रहम' का हर्फ़ कुरेद कर निकाल दिया हो।* *उन आँखों में नज़र करो... तो अपनी तक़दीर का कफ़न नज़र आता है।* *वो गुंडा नहीं मोहतरम... न हफ्ता माँगता है।* *वो इन सब से बुलंद है।* *वो अदालत है। वो सज़ा है। वो फ़ैसला है।* *उसके छह जानिसार हैं।* *न वो अहबाब हैं... न ख़ादिम।* *वो उसकी छह उंगलियाँ हैं।* *अयान जिस जानिब इशारा कर दे... उधर अजल का साया लहरा जाता है।* *वो लब नहीं हिलाता... निगाहों से फ़रमान सुनाता है।* *और उसका फ़रमान... इस शहर की क़िस्मत का नौश्ता है।* *गुज़िश्ता शब... उसने फ़ज़ा में उंगली जुम्बिश दी।* *सुबह-सादिक़ छह घरों से... बिन नमाज़-ए-जनाज़ा के... मिट्टी उठी।* *हवेली के सबसे बुलंद झरोखे से धुआँ आसमाँ को छू गया।* *शहर जान गया... अयान खान ने स्याही से नहीं... लहू से तहरीर कर दी।* *अयान के दामन में सब कुछ है।* *दौलत... शोहरत... हैबत।* *नहीं है तो सिर्फ़ एक शय...* *सुकून-ए-क़ल्ब।* *मगर...* *इसी शहर के दूसरे गोशे में...* *जहाँ अयान के हुक्म की सदाएँ नहीं पहुँचतीं...* *वहाँ एक और आलम आबाद है।* *एक ऐसा आलम... जहाँ हथियार नहीं... रंग हमकलाम होते हैं।* 🌈 *जहाँ गोलियाँ नहीं... क़हक़हे गूँजते हैं।* *उसी शब... जब हवेली से धुआँ उठा...* *एक कच्चे आशियाने से आवाज़ आई: "धड़ाम!"* *"फ़ातिमा! अल्लाह रेहम करे! तू ठीक तो है ना बच्ची?"* *आयशा आपा फ़िक्रमंद होकर दौड़ीं। पीछे समीर भाईजान।* *दर वाज़ हुआ... और दोनों की निगाहें वहीं ठहर गईं।* *पूरा हुजरा... जन्नत का नक़्शा बना पड़ा था।* *दीवार पर आसमानी रंग... गोया फलक ज़मीं पर बिछ गया हो।* *फ़र्श पर सुर्ख नन्हे नक़्श-ए-पा... जैसे कोई हूर-ए-जन्नत रक़्स करके गई हो।* *एक कोने में ज़र्द आफ़ताब की किरनें... दूसरे में सब्ज़ चमन की बहार।* *सत्तर रंग। सत्तर अदाएँ।* *एक छोटे से हुजरे में... फ़ातिमा ने कुल कायनात समेट दी थी।* *और वसत में खड़ी थी वो।* *फ़ातिमा।* *उम्र उन्नीस साल।* *क़द पाँच फ़ुट दो इंच। नाज़ुक... आबगीने की गुड़िया सी... छू लो तो रेज़ा-रेज़ा हो जाए।* *सर-ता-पा सियाह नक़ाब।* *सिर्फ़ दो रोज़न।* *और उन रोज़नों में...* *दो सब्ज़ आँखें।* 💚 *फ़राख़... बादाम सी... सब्ज़ आँखें।* *जिनमें शरारत थी... तीन बरस की तिफ़्ल जैसी।* *मासूमियत थी... जैसे सहर की पहली शबनम।* *और एक पुर-असरार कशिश थी...* *कि जो एक मरतबा देख ले... वो उम्र भर की नींद खो दे।* *न आयशा आपा ने... न समीर भाईजान ने... न मुहल्ले की किसी मोहतरमा ने...* *आज तक उसका चेहरा देखा था।* *फ़ातिमा बस मुस्कुरा देती थी... ख़ामोश रहती थी।* *उसका नक़ाब... उसकी पहचान था। उसका सुकून था।* *उसके पास न ज़र था... न शोहरत।* *था तो बस... एक कच्चा आशियाना... रंगों की तश्तरी... और दिल में बे-शुमार ख़्वाब।* *वो दुनिया के शर से बेख़बर थी।* *उसे मालूम न था...* *कि इसी शहर में... एक ऐसी हस्ती भी दम भरती है...* *जिसकी एक नज़र-ए-इनायत... या नज़र-ए-ग़ज़ब... तक़दीरें बदल देती है।* *एक तरफ़... वो जिसके नाम से हाकिम-ए-वक़्त के हाथ लरज़ जाते हैं।* *दूसरी तरफ़... वो जिसके रंगों से दीवारें फ़िरदौस का मंज़र पेश करती हैं।* *दो जहान। दो किनारे।* *एक दोज़ख़ का सुल्तान।* *एक जन्नत की शहज़ादी।* *मगर रब-ए-कायनात की मर्ज़ी कुछ और थी।* *उसने लौह-ए-महफ़ूज़ पर लिख दिया था...* *कि इन दो किनारों को... एक समंदर बनना है।* *मगर अभी नहीं।* *अभी तो सिर्फ़ इब्तिदा है।* *अभी तो फ़ासले हैं... अभी आज़माइशें हैं।* *क्योंकि जब मौत की वीरान चश्म...* *हयात की सब्ज़ आँखों से टकराएगी...* *तो ज़मीं हिलेगी... आसमाँ काँपेगा।* 💚💀 *क्या होगा जब हुक्म का क़ानून...* *सत्तर रंगों के ख़्वाब से उलझेगा?* *इसके बाद... कुछ भी पहले जैसा नहीं रहेगा।* *न वो हँसी। न वो हैबत। न वो फ़ातिमा।* *न ही... अयान खान।* *वल्लाहु आलम... अगला बाब जल्द।* 🌙 --- पहले ये जान लो... जब अयान खान की वीरान नज़र... फ़ातिमा की सब्ज़ आँखों से टकराएगी... तो इस शहर का कानून ही बदल जाएगा। 💚💀 EP 2 - सब्ज़ आँखों का ख़्वाब और सियाह रात का साया जल्द आ रहा है... इंशाअल्लाह। 🌙

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