pehli nazar
सर्दियों की एक सुबह थी। दिल्ली की सड़कों पर कोहरा बिखरा था।
आरव अपनी बाइक से ऑफिस जा रहा था, जब अचानक उसका ध्यान एक कैफे के बाहर रुकी एक लड़की पर गया।
सफेद स्वेटर में, हाथों में किताब पकड़े, वो लड़की जैसे इस धुंधली दुनिया में एक साफ रोशनी की तरह चमक रही थी।
आरव के पैर अपने आप थम गए।
उसे खुद समझ नहीं आया कि क्यों।
बस दिल ने कहा — "रुक जा।"
लड़की की आँखें... जैसे कह रही हों कि बहुत कुछ कहना बाकी है।
लेकिन उसके होंठ... बस एक हल्की मुस्कान के साथ खामोश थे।
आरव को एहसास हुआ —
"शायद मैंने उसे बहुत देर से ढूंढा है..."
कैफे का दरवाज़ा खुला। आरव खुद को रोक नहीं पाया।
वो अंदर चला गया, कॉफ़ी का बहाना लेकर।
"एक ब्लैक कॉफी," उसने कहा।
पर उसकी निगाहें अब भी उसी लड़की पर टिकी थीं।
तभी लड़की ने भी उसे देखा — और मुस्कुराई।
"यहाँ खाली है," लड़की ने कहा, अपने टेबल की तरफ इशारा करते हुए।
आरव थोड़ा हिचकते हुए बैठ गया।
"मैं आरव हूँ," उसने कहा, हाथ बढ़ाते हुए।
"मैं मेहर," लड़की ने हाथ मिलाया, उसकी मुस्कान थोड़ी गहरी हुई।
कॉफी आई, बातें शुरू हुईं।
छोटी-छोटी बातें — किताबों की, फिल्मों की, सपनों की।
और एक मुलाकात... एक नर्म शुरुआत बन गई।