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Zanjeer:- rishton ki rahasyamai Dastan, pyar power vs gangster

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Blurb

Ek seedha-saadha gaon ka ladka, Anurag, kaise waqt ki beraham zanjeeron mein jakadkar waqt ka sabse bada gangster ban gaya? Yeh kahani hai us galatfahami ki jisne do doston ko dushman bana diya aur do bade gangs ko janm diya.

​Jab power ki bhookh mein Jeet ne sari hadein paar kar di, tab shuru hua maut aur badle ka wo silsila jisme rishte raakh hone lage. Ek taraf Simran ka be-inteha pyar aur intezar hai, toh dusri taraf Gill ki dosti aur dushmani ka bhayankar khel.

​Kya Anurag kabhi jail ki un salakhon se nikal kar Simran ki mohabbat ko mukammal kar payega? Ya phir jurm ki ye 'Zanjeer' use kabhi peecha nahi chhodegi?

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Untitled एपिसोड१: धूल, और, ख्वाब
अध्याय 1: धूल और ख्वाब चंडीगढ़ की बस का वो आख़िरी पायदान और अनुराग के हाथों में कसी हुई उसकी पुरानी अटैची—दोनों ही जैसे एक नई दुनिया की गवाही दे रहे थे। बस से नीचे उतरते ही शहर की ठंडी हवा ने उसका स्वागत किया, लेकिन उस हवा में अपनों की खुशबू नहीं थी। वहां सिर्फ कंक्रीट की ऊंची इमारतें और भागती हुई गाड़ियों का शोर था। अनुराग ने अपने कुर्ते की बाजू से माथे का पसीना पोंछा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मासूमियत थी, वही मासूमियत जो हनुमानगढ़ के रेतीले टीलों और खेतों में पली-बढ़ी थी। उसकी आंखों में एक चमक थी—बापू की पगड़ी का मान रखने का सपना और मां की दुआओं का असर। "यही है वो शहर... चंडीगढ़," उसने धीरे से बुदबुदाया। कॉलेज का वो गेट... जब वो शहर के उस नामी कॉलेज के गेट पर पहुंचा, तो उसे लगा जैसे वो किसी महल के सामने खड़ा है। बड़े-बड़े पेड़, आलीशान बिल्डिंग और वहां घूमते हुए लड़के-लड़कियां, जो किसी फिल्म के किरदारों जैसे लग रहे थे। अनुराग ने अपनी पुरानी डायरी, जिस पर 'Zanjeer' लिखा था, उसे और ज़ोर से सीने से सटा लिया। उसे नहीं पता था कि ये डायरी एक दिन उसकी तक़दीर और इस शहर की तासीर बदल देगी। तभी, टायरों के रगड़ने की एक तेज़ आवाज़ आई। एक चमचमाती हुई कार ठीक उसके पास आकर रुकी। धूल का एक गुबार उठा और अनुराग के साफ कपड़ों पर जम गया। कार का दरवाज़ा खुला और बाहर निकली—जसमीत। महंगे चश्मे, हाथों में आईफोन और चेहरे पर वो घमंड जो सिर्फ अमीरी की पैदाइश हो सकता है। उसने अनुराग को ऊपर से नीचे तक देखा, जैसे वो कोई इंसान नहीं, रास्ते में पड़ा कोई पत्थर हो। "ओह माय गॉड! ये क्या 'पिंडू' जैसा हुलिया बना रखा है? ये कॉलेज है या कोई अनाज मंडी?" जसमीत की आवाज़ में ज़हर था। उसके पीछे खड़े उसके दोस्तों ने ठहाका लगाया। अनुराग का चेहरा लाल हो गया। उसने हिम्मत जुटाकर कहा, "जी, मैं यहां पढ़ने आया हूं... एडमीशन हुआ है मेरा।" "पढ़ने?" जसमीत करीब आई और उसके हाथ से वो पुरानी डायरी छीन ली। "इस फटी हुई डायरी से पढ़ोगे? इसे तो कचरे में होना चाहिए।" कहते ही उसने वो डायरी दूर सड़क पर फेंक दी। अनुराग की आंखों में आंसू आ गए। वो डायरी सिर्फ कागज़ का टुकड़ा नहीं थी, उसमें उसके बापू के खून-पसीने की कमाई का हिसाब और उसके खुद के लिखे हुए शेर थे। जसमीत अपनी कार में बैठते हुए बोली, "सुनो ओए लड़के, इस शहर में सर्वाइव करना है तो अपनी औकात देख कर कदम रखना। यहाँ 'standard' चलता है, तुम्हारी ये सादगी नहीं।" कार ज़ोर से आगे बढ़ गई, और अनुराग वहीं खड़ा रह गया। धूल अब उसके कपड़ों पर ही नहीं, उसके सपनों पर भी जम चुकी थी। उसने झुककर अपनी डायरी उठाई, उसे साफ किया और एक गहरी सांस ली। उस दिन चंडीगढ़ की धूप बहुत तेज़ थी, पर अनुराग के अंदर की आग उससे भी कहीं ज़्यादा तेज़ जलने लगी थी। उसे नहीं पता था कि आज जिस ज़ंजीर को उसने सीने से लगाया है, वही ज़ंजीर एक दिन इस शहर के गले का फंदा बनेगी।

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