आरंभ
आसमान पर काले बादलों की परतें धीरे-धीरे चढ़ती जा रही थीं। वे सिर्फ बादल नहीं थे, मानो अनकहे वाक्यों से भरे भारी विचार हों, जो गरज के साथ अपने होने का एलान कर रहे थे। हवा की तेज़ लपटें जैसे हर कोने में भागती फिर रही थीं — पेड़ों की शाखाएं सिहर रही थीं, और पत्ते सहम-सहम कर झुकते जा रहे थे।
एक पेड़ पर बैठे कुछ पक्षी अपने घोंसलों को बचाने की कोशिश में लगे थे। कुछ उड़कर दूर चले गए, पर कुछ अभी भी अपनी नन्हीं दुनिया को बचाए रखने की उम्मीद में जमे रहे। वहीं सड़क के किनारे एक सब्जी वाला अपने ठेले पर टारपोलिन डाल रहा था — जैसे इस बारिश से सिर्फ उसका ठेला नहीं, उसकी सारी ज़िंदगी भीग न जाए।
बस स्टैंड पर 840 नंबर की पुरानी नीली बस आकर रुकी। उसके दरवाज़े खुलते ही भीड़ की एक बौछार निकली — भीगे थैले, भीगी चिंताएं, और भीगे सपने लेकर लोग अपने-अपने गंतव्य की ओर बढ़े। लेकिन उसी भीड़ में एक चेहरा अलग था।
उसके बाल काले बादलों जैसे उड़ रहे थे, आंखें झील जैसी नीली, और चेहरा किसी अधूरी कविता-सा शांत। उसका नाम था नेहा। वह हल्के कांपते हाथों से अपने बालों को समेटती हुई पास की बेंच पर बैठ गई। हवा उसके चारों ओर घूमती रही — जैसे उसके भीतर की बेचैनी को महसूस कर रही हो।
तभी बारिश शुरू हो गई — धीमी बूंदें, फिर तेज़ धार, और फिर गरज के साथ झरते अश्रु जैसे। नेहा ने अपना फोन निकाला और सोनू को कॉल करने लगी — वही सोनू, जिससे वो एक चुपचाप प्यार करती थी, बिना ज़्यादा कहे, बिना ज़्यादा मांगे। लेकिन फोन बंद था।
कुछ ही मिनटों में बस स्टैंड खाली हो गया। लोग अपने-अपने पहचानवालों के साथ रवाना हो चुके थे, लेकिन नेहा अब भी वहीं थी। उसका अकेलापन अब भीग चुका था। बारिश अब सिर से उतरकर आत्मा में जा समाई थी। घड़ी की सुइयां बढ़ती रहीं, और आसमान और भी काला होता गया।
उसका फोन भी अब बंद हो चुका था।
पास खड़े दो आवारा कुत्ते भौंकने लगे। नेहा एकदम सकपका गई। पीछे हटते हुए उसने खुद को असहाय महसूस किया। तभी एक आवाज़ आई —
"मालकिन! लीजिए, मैं आ गया।"
नेहा ने पलटकर देखा — ये नमन था। ठाकुर परिवार का घरेलू नौकर, लेकिन उसकी आंखों में ज़रूर कुछ अपनापन था।
नेहा उसके पीछे जाकर खड़ी हो गई —
"नमन, भगाओ इन्हें… बहुत डरावने हैं ये।"
नमन ने अपने छाते को लहराया। कुत्ते डरकर भाग गए, लेकिन उसका छाता वहीं टूट गया — जैसे कोई वफ़ा की ढाल टूट गई हो।
"चलिए, मालकिन," नमन ने कहा।
नेहा और नमन अब एक ही छाते के बिना भीगते हुए घर की ओर चल पड़े। हर कदम के साथ सन्नाटा उनके साथ चल रहा था।
ठाकुर हवेली के अंदर, पाल ठाकुर — एक समय के ज़मींदार, अब ग़ुस्से में तपते पिता — दरवाज़े के पास खड़े थे। जैसे कोई शिकारी अपने बिछड़े शावक की राह ताक रहा हो। नेहा को देखते ही उन्होंने एक लंबी सांस ली, और वही सांस सैकड़ों अनकही चिंताओं को धुंआ बनाकर बाहर निकाल लाई।
"बड़े मालिक," नमन ने झुकते हुए कहा, "मालकिन को ले आया।"
"जाओ तुम," पाल ठाकुर की आवाज़ गूंजी — सख्त, लेकिन थकी हुई।
नमन सिर झुकाए अपने कमरे की ओर चला गया। नेहा भी अपने कमरे में चली गई। बाहर बारिश अब भी हो रही थी — लेकिन अब वह डरावनी नहीं, बस ज़रूरी लग रही थी। जैसे किसी पुराने दुख का शांति से बह जाना।
उस रात तीनों अलग-अलग कमरों में सोए — लेकिन तीनों के भीतर एक ही सवाल था:
"बारिश अगर भीगाती है, तो कुछ धो भी तो देती है क्या?"
सूरज की पहली किरणें ठाकुर हवेली के गढ़े हुए खंभों पर उतरने लगी थीं। हवेली के बरामदे में एक पुराना पीतल का घंटा हल्के-हल्के हिल रहा था, जैसे किसी भूली-बिसरी पुकार की अनुगूंज। हवेली के भीतर बड़े से खाने के कमरे में लकड़ी की लंबी मेज पर ठाकुर पाल सिंह, उनकी पत्नी कावेरी देवी, उनके साले सकील बाबू, बेटी काजोल और बाकी घरवाले नाश्ते में व्यस्त थे।
नेहा, ठाकुर परिवार की भांजी — सुंदर, संकोची और सजीव — सुबह-सुबह कॉलेज के लिए निकल चुकी थी।
ठीक उसी वक्त, हवेली के एक कोने में झाड़ू लगाता एक दुबला-पतला लड़का धीरे-धीरे पास आता है — उसका नाम नमन।
“बड़े मालिक…” वह झुके हुए स्वर में कहता है,
“मैं… मैं पढ़ना चाहता हूँ।”
ठाकुर पाल सिंह की आंखों में एक पल के लिए सख़्ती नहीं, कोमलता तैरती है।
“तू पढ़ना चाहता है?”
“जी मालिक… बहुत मन है।”
एक लंबा मौन कमरे में छा जाता है। फिर पाल सिंह अपनी जेब से फोन निकालते हैं, कॉलेज के प्रिंसिपल को फोन लगाते हैं और कहते हैं,
“एक लड़का भेज रहा हूँ, नाम है नमन। दाखिला कर लीजिए… बाकी फीस मैं भिजवा दूंगा।”
नमन की आंखें भर आती हैं। वर्षों की धूल जैसे अचानक किसी आंधी में उड़ गई हो।
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कॉलेज की पहली सुबह… बारिश के बाद की धूप में भीगी ज़मीन चमक रही थी। छात्र-छात्राओं की भीड़ में एक सामान्य से कपड़ों में सधे हुए क़दमों से चलता नमन, खुद को किसी नए संसार में पाता है।
क्लासरूम में वह जितना संकोची था, उतना ही उसकी आंखों में गहराई थी। कुछ ही घंटों में छात्राओं का एक छोटा-सा मंडल उसके इर्द-गिर्द बनने लगता है। उन्हीं में से एक थी काव्या — सरल, शांत, और आर्थिक रूप से वैसी ही संघर्षशील जैसी नमन।
क्लास के बाद नमन कॉलेज के बाग़ में बैठकर किताब पढ़ रहा होता है, तभी एक तीखी आवाज़ आती है —
“ये देखो! ये भिखारी भी अब कॉलेज आएगा… मेरे पिताजी के पैसों पर!”
काजल थी — ठाकुर परिवार की बेटी — और अपने ‘स्टेटस’ पर गर्व करने वाली लड़की। उसके पीछे-पीछे कुछ और लड़के-लड़कियाँ हँसी उड़ाते हैं।
नमन कुछ नहीं कहता। बस सिर झुका लेता है।
तभी भीड़ को चीरती हुई नेहा आती है —
“नमन!” वह उसका हाथ पकड़ कर भीड़ से दूर ले जाती है।
“तूने बताया क्यों नहीं कि तू भी कॉलेज आ रहा है? मुझसे बाते छुपाने लगा?”
नमन झुक कर बोलता है, “मालकिन… आप जल्दी निकल जाते थे… शाम को बता देता…”
“शाम को भी नहीं बताया… तू अब मुझसे छुपाने लगा है?” नेहा की आँखें नम हो जाती हैं।
नमन अचानक घुटनों पर बैठ जाता है —
“माफ कर दीजिए, मालकिन… गलती हो गई।”
नेहा हँस पड़ती है। उसकी हँसी इतनी दिलकश थी कि कॉलेज के दूसरे छोर पर खड़ा सोनू भी चौंक कर उसकी ओर देखने लगता है। नेहा और नमन की निकटता देख उसकी आँखों में जलन की लपटें उठने लगती हैं।