ये तो अंधा पीसे और कुत्ते खाय वाली कहावत चरितार्थ हो गई, आरक्षण बना किसके लिए और खा कौन रहा....
यह उस अधिसूचना में टाइपिस्ट बाबू की गई शब्दों की कारीगरी है, जिसके कारण असली दलित भील मीणों के साथ यह दबंग मीणा भी जुड़ गए, और पूरा का पूरा 7.5 % आरक्षण यही लोग खा गए।
उस टाइपिस्ट बाबू ने ही अपनी जाति पक्ष में मीणा मेणा मीना वाली शब्दों की ऐसी कारीगरी की थी, जिसपर उस समय संविधान निर्माताओं का ना ध्यान गया, ना ही संशोधन की किसी ने पैरवी की .....
इसपर माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी टिप्पणी करी थी, कि आरक्षण वास्तव में मीना और मीणा के फेर में फस गया है, ये व्यवस्था की गई थी उन भील मीणा के लिए, लेकिन जबरदस्ती फायदा ये लोग ले रहे हैं मीना।
और देखा जाए तो आज प्रशासनिक तौर पर भारत में सबसे ताकतवर जाती बन चुके हैं मीना, जो अकेले दम पर व्यवस्था परिवर्तन का माद्दा रखते हैं ...
सीधे-सीधे राजस्थान हाईकोर्ट की अवमानना हुई, लेकिन किसी का बाल तक बांका नहीं हुआ,
अब तो सवर्णों के पास सिर्फ एक ही रास्ता बचता है, और वो है सशस्त्र क्रांति, संघर्ष और वो भी आर-पार, करो मरो की शैली में ...
हुकम सिंह हरनावा