ढहती दीवारें
हागिया सोफ़िया की घंटियाँ पूरे शहर में गूंज रही थीं — न उत्सव के लिए, बल्कि भय और प्रार्थना के लिए। स्वर्ण भरे महलों, टूटी सड़कों और सुनसान बाजारों से गुजरते हुए कॉन्स्टैंटिनोपल काँप रहा था, मानो वह स्वयं जानता हो कि उसका अंत निकट है।
अलेक्सियोस कोम्नेनोस ने थरथराती दीवार पर अपना हाथ रखा। शिला ठंडी थी, लेकिन उसके भीतर एक कंपन था — तोपों की गड़गड़ाहट का कंपन। हवा में धूल और धुएं का स्वाद घुला था। उसका फटा हुआ चोगा उसकी पसलियों से चिपक गया था, और उसका हाथ तलवार की मूठ पर कसकर जकड़ा हुआ था।
अलेक्सियोस केवल अठारह वर्ष का था। वह युद्ध के लिए नहीं, पुस्तकों और ज्ञान के लिए पैदा हुआ था। उसके सपने थे — पुराने ग्रंथों का अध्ययन करना, महान विचारों का अनुवाद करना। लेकिन अब, जब कॉन्स्टैंटिनोपल चारों ओर से घिर गया था, हर व्यक्ति — विद्वान से लेकर व्यापारी तक — को हथियार उठाना पड़ा था।
"लड़के!"
पीछे से एक भारी आवाज़ गूंजी।
अलेक्सियोस ने मुड़कर देखा — मैनुअल था, एक बूढ़ा योद्धा, जिसके चेहरे पर एक गहरी तलवार का निशान था। उसके पुराने जंजीरी कवच में जगह-जगह जंग लगी थी। लेकिन उसकी आँखों में अब भी ज्वाला थी — वह ज्वाला जो केवल उन्हीं में बची थी, जो जानते थे कि वे हारने के लिए लड़ रहे हैं।
"फाटक की ओर!" मैनुअल चिल्लाया। "वे फिर से हमला कर रहे हैं!"
अलेक्सियोस ने सिर झुकाया और अपनी तलवार कसकर पकड़ी। वह और मैनुअल तंग गलियों से भागते हुए फाटक की ओर बढ़े। रास्ते में उन्होंने देखा — दीवारों के सहारे सहमे हुए परिवार, रोती हुई औरतें, और फुसफुसाते हुए पादरी, जो चमत्कार के लिए प्रार्थना कर रहे थे।
जब वे सेंट रोमानुस फाटक पहुंचे, तब वहाँ का दृश्य भयावह था। फटी हुई दीवारों के बीच से सैकड़ों तुर्की सैनिकों की भीड़ अंदर घुस रही थी, उनके झंडे लाल आकाश में चमक रहे थे। युद्ध के नगाड़े दहाड़ रहे थे, और तलवारों की चमकती धारें अंधेरे में बिजलियों की तरह कौंध रही थीं।
"पंक्ति मत तोड़ना!" मैनुअल गरजा। "सम्राट के लिए! ईश्वर के लिए!"
अलेक्सियोस ने एक गहरी साँस ली और अपने थरथराते हाथों से तलवार को संभाला। तभी एक युवा तुर्की सैनिक उस पर झपटा — वह भी उतनी ही उम्र का था जितना अलेक्सियोस। दोनों की तलवारें टकराईं।
अलेक्सियोस ने बचाव किया, लड़खड़ाया, फिर एक झटके में तलवार को युवक की पसली में घुसेड़ दिया। युवक की आँखें चौड़ी हो गईं, और वह अचेत होकर नीचे गिर पड़ा।
यह अलेक्सियोस का पहला वध था। किताबों में उसने मृत्यु के बारे में पढ़ा था, लेकिन यह पहला अवसर था जब उसने उसे इतनी नजदीक से महसूस किया।
वह सोचने भी न पाया था कि दूसरा दुश्मन उसके सामने आ गया। युद्ध एक अंतहीन तूफान बन गया था — जहाँ पल भर की चूक भी मृत्यु थी।
ऊपर, धूल और धुएं के बीच, सम्राट कॉन्स्टैंटाइन ग्यारहवें अपनी घोड़ी पर सवार, दीवारों पर चक्कर काट रहे थे। उनका चमकता हुआ लाल चोगा हवा में लहरा रहा था, और उनकी तलवार सूर्य के आखिरी किरणों को पकड़ रही थी।
उन्होंने जो भी कहा, वह शोरगुल में डूब गया, पर अलेक्सियोस ने दिल से महसूस किया — समर्पण का कोई स्थान नहीं था।
न इस शहर के लिए, न उन आत्माओं के लिए जिन्होंने उसे खड़ा किया था। रात गहरी हो चुकी थी। युद्ध की भयानक गूंज के बीच, महल के पुराने कक्ष में सम्राट ने अपने विश्वासपात्रों को एकत्र किया।
कमरे में अजीब सी चुप्पी थी। तेल के दीयों की रोशनी में चेहरों पर गहरी थकान और घबराहट थी। अलेक्सियोस, मैनुअल के साथ चुपचाप कोने में खड़ा था।
कॉन्स्टैंटाइन ने सभा की ओर देखा। उनके चेहरे पर गंभीर शांति थी।
"भाइयों," उन्होंने कहा, "हमने सब कुछ किया जो हम कर सकते थे। अब ईश्वर की इच्छा पूरी होगी।"
उन्होंने एक क्षण के लिए रुक कर सबकी आँखों में झाँका।
"मैं तुमसे केवल यही मांगता हूँ — आज रात हम अपना सम्मान न खोएं। चाहे जो हो जाए, कॉन्स्टैंटिनोपल का अंतिम प्रहरी डर कर नहीं भागेगा।"
एक-एक कर, सैनिकों और सेनापतियों ने सम्राट के सामने घुटनों पर झुककर अपनी वफादारी की कसम खाई।
अलेक्सियोस ने भी अपने घुटने टेके। उसके शरीर में भय की लहर दौड़ी, लेकिन दिल में एक नई अग्नि जल उठी थी।
उस रात, शहर के हर गली-चौराहे पर मोमबत्तियाँ जलाई गईं। लोग प्रार्थना कर रहे थे, आँसुओं में डूबे हुए, लेकिन भीतर ही भीतर एक अंतिम विश्वास लिए हुए — कि यदि मृत्यु भी आए, तो वह गरिमा के साथ आए।