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"Unspoken Bonds: A Journey of the Soul"

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**नई दिल्ली की धूप में**
अध्याय 1 **नई दिल्ली की धूप में** नई दिल्ली की तेज़ धूप में, सड़कें तपती थीं और ट्रैफिक के शोर में जैसे जीवन खुद को साबित करने की कोशिश करता था। कॉलेज से वापस लौटते हुए अलोक कुमार ने अपनी स्कूटर एक पार्क के किनारे रोकी। यह वही पार्क था जहां वह अक्सर अपनी कहानियों के लिए प्रेरणा तलाशने आया करता था। अलोक का सपना लेखक बनने का था, लेकिन उसके परिवार की इच्छा थी कि वह सरकारी अधिकारी बने। उसकी मां और पिता की अपेक्षाएँ हमेशा से ही समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त करने की रही हैं, और उनके अनुसार सरकारी नौकरी ही एकमात्र मार्ग था। अलोक ने पार्क के एक बेंच पर बैठते हुए अपने बैग से एक नोटबुक और पेन निकाला। उसके मन में एक नयी कहानी का बीज अंकुरित हो रहा था। उसने लिखना शुरू किया, जब अचानक उसकी नज़र एक लड़की पर पड़ी। वह लड़की, जो अपने बालों को बड़े ध्यान से कंधे पर ठीक कर रही थी, उसकी आंखों में कुछ ऐसा था जिसने अलोक का ध्यान खींचा। वह लड़की वाणी गुप्ता थी, जो उसी कोचिंग क्लास में पढ़ती थी जिसमें अलोक भी था। वाणी की उपस्थिति में कुछ ऐसा था जो अलोक को आकर्षित करता था। वह बहुत ही सरल और प्यारी लगती थी। अलोक को याद आया कि उसने उसे पहले भी देखा था, पर कभी बात नहीं की थी। वह एक बार फिर से अपनी कहानी में डूबने की कोशिश कर रहा था, पर उसकी नज़रें बार-बार वाणी की ओर खिंच जाती थीं। वाणी अपने दोस्तों के साथ आई थी, जिनमें से एक हिमांशु भी था, जो अलोक का अच्छा दोस्त था। हिमांशु ने अलोक को देखा और उसे बुलाया। "अरे अलोक, यहाँ क्या कर रहे हो?" हिमांशु ने उसे देखकर पूछा। "बस यूं ही, थोड़ी ताज़ी हवा लेने आया था," अलोक ने मुस्कुराते हुए कहा। "तुम्हारे कहानियों का क्या हुआ? कोई नयी कहानी लिख रहे हो?" हिमांशु ने पूछा, उसकी आवाज में उत्सुकता थी। अलोक ने थोड़ा संकोच करते हुए कहा, "हाँ, कुछ नया सोच रहा हूँ।" इस बीच, वाणी ने अलोक की ओर देखा और मुस्कुराई। हिमांशु ने परिचय कराते हुए कहा, "वाणी, ये अलोक है। और अलोक, ये वाणी है। हम लोग एक ही कोचिंग क्लास में हैं।" वाणी ने नम्रता से सिर हिलाया और कहा, "हेलो, अलोक।" "हेलो, वाणी।" अलोक ने जवाब दिया, और फिर वे सब आपस में बातें करने लगे। अलोक ने महसूस किया कि वाणी की बातें और उसकी सोचने की शैली बहुत ही सकारात्मक और प्रेरणादायक थी। उसकी आवाज़ में एक सादगी थी जो अलोक को प्रभावित कर रही थी। धीरे-धीरे, उन्होंने अपने सपनों और इच्छाओं के बारे में बात करनी शुरू की। वाणी का सपना एक शिक्षक बनने का था। उसने बताया कि उसे बच्चों के साथ समय बिताना बहुत पसंद है और वह चाहती है कि वह एक अच्छी टीचर बने, जो बच्चों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए। अलोक ने उसकी बातों को ध्यान से सुना और उसकी सोच में खो गया। उसे महसूस हुआ कि उसके और वाणी के सपनों में कुछ समानताएं थीं। दोनों ही समाज में कुछ अच्छा करना चाहते थे, बस उनके माध्यम अलग थे। इस बीच, हिमांशु और अन्य दोस्त भी अपनी-अपनी बातें कर रहे थे। उनकी हंसी और मजाक ने वातावरण को हल्का कर दिया था। अलोक और वाणी के बीच एक अजीब सा कनेक्शन महसूस हो रहा था। वे एक-दूसरे की बातों को ध्यान से सुनते और समझने की कोशिश करते थे। अंत में, जब दिन ढलने लगा, सभी ने अपने-अपने घर जाने की सोची। अलोक ने वाणी से कहा, "वाणी, मुझे तुम्हारी सोच बहुत पसंद आई। मुझे लगता है कि हम दोनों को अपने सपनों का पीछा करना चाहिए, चाहे हालात कैसे भी हों।" वाणी ने मुस्कुराते हुए कहा, "हां, अलोक। सपने देखना और उन्हें पूरा करना ही जीवन का असली मतलब है।" इस प्रकार, उनकी मुलाकात एक नए रिश्ते की शुरुआत बनी, जिसने उनके जीवन में एक नया मोड़ लाया। अलोक को लगा कि उसकी जिंदगी में अब कुछ नया होने वाला है, जो उसे उसके सपनों के करीब ले जाएगा। और इसी सोच के साथ, वह घर लौट आया, अपने सपनों और नई दोस्ती के साथ।

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