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​सपनों की लेखिका गीता कुमारी

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​"क्या एक साधारण लड़की के सपने हकीकत की दुनिया में अपनी जगह बना सकते हैं?​यह कहानी है गीता कुमारी की, जो अपनी आँखों में हज़ारों सपने सजाए एक लेखिका बनने का ख्वाब देखती है। गीता के लिए उसके शब्द ही उसकी दुनिया हैं, लेकिन उसकी सादगी भरी ज़िंदगी में तूफान तब आता है जब उसकी मुलाकात अर्जुन से होती है।​अर्जुन—जो स्वभाव से सख्त है, लेकिन जिसका दिल रहस्यों से भरा है। जहाँ गीता भावनाओं और मिठास (Sweetness) से भरी है, वहीं अर्जुन की दुनिया में केवल वास्तविकता और अनुशासन है। जब इन दोनों की दुनिया आपस में टकराती है, तो शुरू होता है भावनाओं का एक अनकहा ड्रामा (Drama)।​क्या अर्जुन गीता के सपनों को उडान देगा या वह खुद गीता की कहानी का सबसे बडा मोड बन जाएगा? सपनों और हकीकत के बीच बुनी गई यह एक ऐसी प्रेम कहानी है, जिसमें मिठास भी है और जीवन के करवे सच भी।​जुड़िए गीता और अर्जुन के इस भावुक सफर से—'सपनों की लेखिका गीता कुमारी'।"

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​एपिसोड 1: सपनों की स्याही और वो अनजानी आहट
​पटना की सुबह हमेशा की तरह शोर-शराबे से भरी थी, लेकिन गीता के कमरे में एक अजीब सी शांति पसरी हुई थी। खिड़की से छनकर आती सूरज की पहली किरण सीधे उसकी पुरानी लकड़ी की मेज पर पड़ रही थी, जहाँ कागजों का ढेर और एक आधी खाली स्याही की दवात रखी थी। गीता कुमारी, जिसे लोग सिर्फ एक साधारण लड़की समझते थे, असल में अपने भीतर एक पूरी कायनात समेटे हुए थी। ​उसने अपनी नीली डायरी खोली। उसकी उंगलियाँ कलम को ऐसे थामती थीं जैसे कोई कलाकार अपने सबसे कीमती औज़ार को पकड़ता है। उसने लिखना शुरू किया— "सपने वो नहीं होते जो हम बंद आँखों से देखते हैं, सपने वो होते हैं जो हमें चैन से सोने नहीं देते। पर क्या होगा जब किसी के सपने ही उसकी हकीकत बन जाएं?" ​"गीता! ओ गीता! अरे बिटिया, कितनी देर तक उस डायरी में सिर खपाएगी? जा, जाकर दूध ले आ और फिर कॉलेज के लिए भी तैयार होना है," उसकी माँ की आवाज़ रसोई से गूँजी। ​गीता ने एक गहरी सांस ली और अपनी डायरी बंद कर दी। उसकी आँखों में एक चमक थी, पर होठों पर एक फीकी मुस्कान। वह जानती थी कि उसके घर वालों के लिए उसकी कहानियाँ सिर्फ 'कागज़ काले करना' थीं, लेकिन गीता के लिए वो उसकी साँसें थीं। वह एक ऐसी लेखिका बनना चाहती थी जिसके शब्दों को दुनिया सुने, जिसे लोग उसकी पहचान से जानें, न कि सिर्फ किसी की बेटी या बहन के रूप में। ​दूध लेकर लौटते समय, गीता का ध्यान सड़क के उस पार खड़ी एक चमचमाती हुई काली मर्सिडीज पर गया। उस भीड़भाड़ वाले इलाके में वो कार ऐसी लग रही थी जैसे किसी दूसरी दुनिया से आई हो। कार का पिछला दरवाजा खुला और उसमें से एक शख्स बाहर निकला। ​सफेद कड़क शर्ट, हाथ में महंगी घड़ी और चेहरे पर पत्थर जैसी कठोरता। वो अर्जुन था। ​अर्जुन ने एक पल के लिए अपनी आँखों से चश्मा हटाया और घड़ी की ओर देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे वह वक्त को अपनी मुट्ठी में कैद करना चाहता हो। गीता वहीं ठहर गई। एक लेखक की नज़र हमेशा बारीकियों को पकड़ती है। गीता ने देखा कि उस आदमी के पास सब कुछ था—पैसा, ताकत और रूतबा—लेकिन उसकी आँखों के एक कोने में एक गहरा खालीपन था। ​अचानक, हवा का एक तेज़ झोंका आया और गीता के हाथ में मौजूद उसकी डायरी का एक पन्ना, जो उसने जल्दबाजी में ठीक से दबाया नहीं था, निकलकर उड़ने लगा। गीता घबरा गई। वह पन्ना सीधे उड़ता हुआ अर्जुन के जूतों के पास जाकर गिरा। ​गीता की धड़कनें तेज़ हो गईं। वह डरते-डरते उस पन्ने को उठाने के लिए आगे बढ़ी। जैसे ही उसने झुककर पन्ना उठाना चाहा, अर्जुन की नज़र उस पर पड़ी। अर्जुन ने नीचे देखा और फिर गीता की आँखों में झांका। उसकी निगाहें इतनी तीखी थीं कि गीता को लगा जैसे वो उसके दिल के पार देख रही हों। ​"यह तुम्हारा है?" अर्जुन की आवाज़ भारी और ठंडी थी, जैसे बर्फ की सिल्ली। ​गीता ने सिर्फ सिर हिलाया। वह कुछ बोल नहीं पाई। ​"लिखना अच्छी बात है, लेकिन सड़क पर चलते समय ध्यान ज़मीन पर होना चाहिए, आसमान के सपनों में नहीं," अर्जुन ने रूखेपन से कहा और बिना किसी प्रतिक्रिया का इंतज़ार किए अपनी कार में बैठकर चला गया। ​गीता वहीं खड़ी रह गई। उसके हाथ में वो पन्ना अब भी कांप रहा था। अर्जुन के शब्द उसके कानों में गूँज रहे थे— 'आसमान के सपनों में नहीं'। गीता ने मन ही मन सोचा, "यही तो फर्क है हम दोनों में अजनबी। तुम ज़मीन की हकीकत में कैद हो, और मैं आसमान के उन सपनों की मलिका हूँ जहाँ पहुँचने का रास्ता सिर्फ मेरी कलम जानती है।" ​उसे नहीं पता था कि यह छोटी सी मुलाकात उसके जीवन के सबसे बड़े 'ड्रामा' की शुरुआत थी। उसे यह भी नहीं पता था कि जिसे वह आज एक रूखा अजनबी समझ रही है, वही अर्जुन कल उसकी लिखी कहानियों का सबसे अहम हिस्सा बनने वाला था। ​गीता ने अपनी डायरी को सीने से लगाया और मुस्कुराते हुए घर की ओर चल पड़ी। आज उसे अपनी नई कहानी का 'नायक' मिल गया था—एक ऐसा नायक जो पत्थर जैसा सख्त था, जिसे गीता को अपने शब्दों से पिघलाना था। कहानी जारी रहेगी लेखिका गीता कुमारी

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