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थाने का पहला दिन: चुलबुलापन और वर्दी का रौब

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सुबह की पहली किरण जब सिमरन के कमरे की खिड़की से छनकर उसके चेहरे पर पड़ी, तो उसने अपनी आँखें एक झटके में खोल दीं। आज का दिन कोई आम दिन नहीं था। कैलेंडर की तारीख चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी—**1 जून**। आज सिमरन पूरे अठारह साल की हो गई थी, लेकिन इस जन्मदिन का तोहफा केक या गुब्बारे नहीं, बल्कि खाकी वर्दी थी।बचपन से ही पूरे मोहल्ले की नाक में दम करने वाली, कभी किसी की साइकिल छुपा देने वाली तो कभी पेड़ से आम चुराकर भागने वाली नटखट सिमरन आज एक IPS अधिकारी के रूप में अपनी ड्यूटी का पहला कदम उठाने जा रही थी।कांच के सामने खड़े होकर जब उसने अपनी वर्दी की आखिरी क्रीज को ठीक किया और सिर पर पुलिस की टोपी लगाई, तो उसकी आँखों की शरारत में एक अजीब सा रौब आ गया। उसने खुद को ही शीशे में देखकर एक आँख मारी और बुदबुदाई, *"चलो सिमरन, अब तक तो सिर्फ मोहल्ला परेशान था, आज से अपराधियों की शामत आने वाली है।"*## सिटी कोतवाली का नजाराशहर का मुख्य थाना, 'सिटी कोतवाली', हमेशा की तरह अपनी चिर-परिचित गंभीर और तनावपूर्ण लय में धड़क रहा था। चारों तरफ फाइलों के ढेर, कंप्यूटर के कीबोर्ड की खटखट, और हवालात से आती किसी मुल्जिम की धीमी आवाजें। तभी थाने के भारी लकड़ी के दरवाजे से एक ऐसी ऊर्जा ने प्रवेश किया, जिसने वहाँ की थमी हुई हवा को एकदम से बदल दिया।सिमरन ने जैसे ही कदम अंदर रखा, उसके बूटों की कड़क आवाज गूँज उठी। पुलिसकर्मी जो अपनी-अपनी फाइलों में डूबे थे, सर उठाकर देखने लगे। अठारह साल की एक लड़की, जिसके चेहरे पर दूध जैसी मासूमियत थी, लेकिन बदन पर सजी खाकी वर्दी और चाल का आत्मविश्वास किसी तपे हुए अफसर जैसा था। उसकी आँखों में अब भी वही पुरानी चुलबुलापन तैर रहा था, जिसे वह चाहकर भी छिपा नहीं पा रही थी।वह बिना रुके, सीधे सीनियर ऑफिसर—**सीनियर सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस (SSP) राघवेंद्र सिंह** के केबिन की तरफ बढ़ी।## केबिन का सन्नाटा और वो पहला सैल्यूटSSP राघवेंद्र सिंह एक सख्त, तजुर्बेकार और अनुशासनप्रिय अफसर थे। उनकी मेज पर गंभीर मामलों की फाइलें बिखरी पड़ी थीं और वे अपनी चाय का घूंट लेते हुए किसी केस की गुत्थी सुलझाने में मसरूफ थे। उनके चेहरे की झुर्रियां उनके कड़े अनुभवों की गवाही देती थीं।*तभी दरवाजे पर 'टक-टक' की आवाज हुई।*राघवेंद्र जी ने बिना सिर उठाए कहा, *"आ जाओ।"*दरवाजा खुला, लेकिन कोई अंदर नहीं आया। कुछ सेकंड की खामोशी के बाद, एक खनकती हुई, जोश से भरी आवाज पूरे केबिन में गूँज उठी:> **"सिमरन, IPS, Sir! ड्यूटी के पहले दिन, आपकी कस्टडी में हाजिर हूँ!"**> राघवेंद्र जी ने चौंककर सिर उठाया। सामने सिमरन खड़ी थी—चेहरे पर एक बड़ी सी, बेबाक मुस्कान, और हाथ माथे के पास एकदम सटीक 'सैल्यूट' की मुद्रा में थमा हुआ। उसकी इस अजीब सी 'हाजिरी' और चुलबुले अंदाज को देखकर राघवेंद्र जी का चश्मा नाक पर थोड़ा नीचे खिसक आया।## जब टकराया तजुर्बा और अल्हड़पनराघवेंद्र जी ने धीरे से अपनी चाय का कप रखा, अपनी पीठ को कुर्सी के सहारे टिकाया और सिमरन को ऊपर से नीचे तक देखा। उनके चेहरे के सख्त भाव थोड़े ढीले पड़े, लेकिन उन्होंने अपनी गंभीरता बनाए रखने की कोशिश की।*"तो तुम हो सिमरन..."* राघवेंद्र जी ने अपनी भारी आवाज में कहा, *"तुम्हारे ट्रेनिंग सेंटर के हेड का फोन आया था मेरे पास। कह रहे थे कि लड़की दिमाग की बहुत तेज है, लेकिन जितनी तेज है, उतनी ही नटखट और आफत की पुड़िया है। कानून की किताबें तो तुमने रट लीं, लेकिन क्या तुम्हें पता है कि यह पुलिस थाना है? यहाँ हँसने और शरारत करने का वक्त नहीं मिलता।"*सिमरन ने सैल्यूट नीचे किया, उसकी मुस्कान और गहरी हो गई। वह एक कदम आगे बढ़ी और अपनी पलकें झपकाते हुए बोली:*"सर, ट्रेनिंग सेंटर वाले तो मेरी तारीफ में कसीदे पढ़ते ही रहते हैं! और रही बात शरारत की... तो सर, वो तो मेरे खून में है। लेकिन मैं आपको यकीन दिलाती हूँ, मेरी शरारत सिर्फ अपनों का दिल बहलाने के लिए है। अपराधियों के लिए तो मेरा ये नाम ही काफी होगा। आप बस मुझे कोई काम सौंपिए, फिर देखिये कि यह 18 साल की लड़की कैसे आपके इस थाने का नाम रोशन करती है!"*राघवेंद्र सिंह सिमरन की इस बेबाकी और आत्मविश्वास को देखकर अंदर ही अंदर मुस्कुरा उठे। उन्हें समझ आ गया था कि यह लड़की पारंपरिक पुलिस अफसरों जैसी नहीं है, लेकिन इसके इरादे चट्टान की तरह मजबूत हैं।उन्होंने टेबल पर रखी एक मोटी सी फाइल सिमरन की तरफ बढ़ाई और कहा, *"ठीक है सिमरन। तुम्हारी पहली परीक्षा आज से ही शुरू होती है। यह शहर का एक बेहद पेचीदा मामला है। जाओ, और साबित करो कि तुम्हारी बातों में जितना दम है, उतना ही दम तुम्हारी जासूसी में भी है।"*सिमरन ने फाइल अपने हाथ में ली, उसे सीने से चिपकाया और एक बार फिर पूरे रौब से सैल्यूट ठोकते हुए बोली, *"यस सर! मिशन शुरू!"* और वह अपने बूटों की खटखट के साथ केबिन से बाहर निकल गई, पीछे छोड़ गई राघवेंद्र जी के चेहरे पर एक उम्मीद भरी मुस्कान।क्या सिमरन इस पहले पेचीदा मामले को अपने अनोखे और चुलबुले अंदाज से सुलझा पाएगी? इस उपन्यास को आगे बढ़ाने के लिए, क्या आप चाहते हैं कि हम उसके इस पहले केस की तहकीकात शुरू करें?

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थाने का पहला दिन: चुलबुलापन और वर्दी का रौब
सुबह की पहली किरण जब सिमरन के कमरे की खिड़की से छनकर उसके चेहरे पर पड़ी, तो उसने अपनी आँखें एक झटके में खोल दीं। आज का दिन कोई आम दिन नहीं था। कैलेंडर की तारीख चिल्ला-चिल्ला कर कह रही थी—**1 जून**। आज सिमरन पूरे अठारह साल की हो गई थी, लेकिन इस जन्मदिन का तोहफा केक या गुब्बारे नहीं, बल्कि खाकी वर्दी थी। बचपन से ही पूरे मोहल्ले की नाक में दम करने वाली, कभी किसी की साइकिल छुपा देने वाली तो कभी पेड़ से आम चुराकर भागने वाली नटखट सिमरन आज एक IPS अधिकारी के रूप में अपनी ड्यूटी का पहला कदम उठाने जा रही थी। कांच के सामने खड़े होकर जब उसने अपनी वर्दी की आखिरी क्रीज को ठीक किया और सिर पर पुलिस की टोपी लगाई, तो उसकी आँखों की शरारत में एक अजीब सा रौब आ गया। उसने खुद को ही शीशे में देखकर एक आँख मारी और बुदबुदाई, *"चलो सिमरन, अब तक तो सिर्फ मोहल्ला परेशान था, आज से अपराधियों की शामत आने वाली है।"* ## सिटी कोतवाली का नजारा शहर का मुख्य थाना, 'सिटी कोतवाली', हमेशा की तरह अपनी चिर-परिचित गंभीर और तनावपूर्ण लय में धड़क रहा था। चारों तरफ फाइलों के ढेर, कंप्यूटर के कीबोर्ड की खटखट, और हवालात से आती किसी मुल्जिम की धीमी आवाजें। तभी थाने के भारी लकड़ी के दरवाजे से एक ऐसी ऊर्जा ने प्रवेश किया, जिसने वहाँ की थमी हुई हवा को एकदम से बदल दिया। सिमरन ने जैसे ही कदम अंदर रखा, उसके बूटों की कड़क आवाज गूँज उठी। पुलिसकर्मी जो अपनी-अपनी फाइलों में डूबे थे, सर उठाकर देखने लगे। अठारह साल की एक लड़की, जिसके चेहरे पर दूध जैसी मासूमियत थी, लेकिन बदन पर सजी खाकी वर्दी और चाल का आत्मविश्वास किसी तपे हुए अफसर जैसा था। उसकी आँखों में अब भी वही पुरानी चुलबुलापन तैर रहा था, जिसे वह चाहकर भी छिपा नहीं पा रही थी। वह बिना रुके, सीधे सीनियर ऑफिसर—**सीनियर सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस (SSP) राघवेंद्र सिंह** के केबिन की तरफ बढ़ी। ## केबिन का सन्नाटा और वो पहला सैल्यूट SSP राघवेंद्र सिंह एक सख्त, तजुर्बेकार और अनुशासनप्रिय अफसर थे। उनकी मेज पर गंभीर मामलों की फाइलें बिखरी पड़ी थीं और वे अपनी चाय का घूंट लेते हुए किसी केस की गुत्थी सुलझाने में मसरूफ थे। उनके चेहरे की झुर्रियां उनके कड़े अनुभवों की गवाही देती थीं। *तभी दरवाजे पर 'टक-टक' की आवाज हुई।* राघवेंद्र जी ने बिना सिर उठाए कहा, *"आ जाओ।"* दरवाजा खुला, लेकिन कोई अंदर नहीं आया। कुछ सेकंड की खामोशी के बाद, एक खनकती हुई, जोश से भरी आवाज पूरे केबिन में गूँज उठी: > **"सिमरन, IPS, Sir! ड्यूटी के पहले दिन, आपकी कस्टडी में हाजिर हूँ!"** > राघवेंद्र जी ने चौंककर सिर उठाया। सामने सिमरन खड़ी थी—चेहरे पर एक बड़ी सी, बेबाक मुस्कान, और हाथ माथे के पास एकदम सटीक 'सैल्यूट' की मुद्रा में थमा हुआ। उसकी इस अजीब सी 'हाजिरी' और चुलबुले अंदाज को देखकर राघवेंद्र जी का चश्मा नाक पर थोड़ा नीचे खिसक आया। ## जब टकराया तजुर्बा और अल्हड़पन राघवेंद्र जी ने धीरे से अपनी चाय का कप रखा, अपनी पीठ को कुर्सी के सहारे टिकाया और सिमरन को ऊपर से नीचे तक देखा। उनके चेहरे के सख्त भाव थोड़े ढीले पड़े, लेकिन उन्होंने अपनी गंभीरता बनाए रखने की कोशिश की। *"तो तुम हो सिमरन..."* राघवेंद्र जी ने अपनी भारी आवाज में कहा, *"तुम्हारे ट्रेनिंग सेंटर के हेड का फोन आया था मेरे पास। कह रहे थे कि लड़की दिमाग की बहुत तेज है, लेकिन जितनी तेज है, उतनी ही नटखट और आफत की पुड़िया है। कानून की किताबें तो तुमने रट लीं, लेकिन क्या तुम्हें पता है कि यह पुलिस थाना है? यहाँ हँसने और शरारत करने का वक्त नहीं मिलता।"* सिमरन ने सैल्यूट नीचे किया, उसकी मुस्कान और गहरी हो गई। वह एक कदम आगे बढ़ी और अपनी पलकें झपकाते हुए बोली: *"सर, ट्रेनिंग सेंटर वाले तो मेरी तारीफ में कसीदे पढ़ते ही रहते हैं! और रही बात शरारत की... तो सर, वो तो मेरे खून में है। लेकिन मैं आपको यकीन दिलाती हूँ, मेरी शरारत सिर्फ अपनों का दिल बहलाने के लिए है। अपराधियों के लिए तो मेरा ये नाम ही काफी होगा। आप बस मुझे कोई काम सौंपिए, फिर देखिये कि यह 18 साल की लड़की कैसे आपके इस थाने का नाम रोशन करती है!"* राघवेंद्र सिंह सिमरन की इस बेबाकी और आत्मविश्वास को देखकर अंदर ही अंदर मुस्कुरा उठे। उन्हें समझ आ गया था कि यह लड़की पारंपरिक पुलिस अफसरों जैसी नहीं है, लेकिन इसके इरादे चट्टान की तरह मजबूत हैं। उन्होंने टेबल पर रखी एक मोटी सी फाइल सिमरन की तरफ बढ़ाई और कहा, *"ठीक है सिमरन। तुम्हारी पहली परीक्षा आज से ही शुरू होती है। यह शहर का एक बेहद पेचीदा मामला है। जाओ, और साबित करो कि तुम्हारी बातों में जितना दम है, उतना ही दम तुम्हारी जासूसी में भी है।"* सिमरन ने फाइल अपने हाथ में ली, उसे सीने से चिपकाया और एक बार फिर पूरे रौब से सैल्यूट ठोकते हुए बोली, *"यस सर! मिशन शुरू!"* और वह अपने बूटों की खटखट के साथ केबिन से बाहर निकल गई, पीछे छोड़ गई राघवेंद्र जी के चेहरे पर एक उम्मीद भरी मुस्कान।

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