चुडेल की दुख भारी कहानी
रामखेलावन जी, पास के ही एक गाँव के रहने वाले थे और प्रतिदिन कोई न कोई असहज घटना कार्यालय के बाकी 4 कर्मचारियों को सुनाया करते थे। वे विशेषकर जब भी कार्यालय में प्रवेश करते तो सबसे पहले रमेस बाबू के कमरे में जाते और राम-राम कहने के साथ ही शुरू हो जाते कि बाबू कल तो गाँव में गजब हो गया था। रमदेइया को जंगल में चुडैल ने पकड़ लिया था तो मनोहर का सामना एक भयानक भूत से हो गया था।
जबतक रामखेलावन जी सभी कर्मचारियों से मिलकर कुछ भूत-प्रेत, गाँव-गड़ा की बातें नहीं बता लेते, उन्हें कल (चैन) नहीं पड़ता था। कोई कर्मचारी रामखेलावन की बातों को सहजता से सुनता तो कोई केवल हाँ-हूँ करके उस ओर कान नहीं देता और उन्हें स्टोप जला कर चाय बनाने के लिए कह देता या पानी की ही माँग करके उनसे बचने की कोशिश करता।
पर रामखेलावन की बातों को रमेसर बाबू बहुत ही सजगता से सुनते और पूरा ध्यान देते हुए बीच-बीच में हाँ-हूँ करने के साथ कुछ सवाल भी पूछते। एक दिन की बात है, रामखेलावन जी कार्यालय थोड़ा जल्दी ही पहुँच गए और सीधे रमेस बाबू के कमरे में घुस गए। पर उस समय रमेसर बाबू अपनी कुर्सी पर नहीं थे, शायद वे अभी कार्यालय पहुँचे ही नहीं थे।
रामखेलावन थोड़ा डरे-सहमे लग रहे थे और बार-बार अपने माथे पर आ रहे पसीने को गमछे से पोछ रहे थे। वे ज्यों ही कमरे से बाहर निकले त्यों ही कार्यालय के प्रांगण में उन्होंने रमेस बाबू को अपनी साइकिल को खड़े करते हुए देखा।
वे दौड़कर रमेसर बाबू के पास पहुँच गए और बिना जयरम्मी किए ही हकलाकर, घबराकर बोले, “बाबू, बाबू! कल रात को तो गजब हो गया। मेरा पूरा परिवार आफत में आ गया है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूँ?” रमेसर बाबू ने उन्हें अपने कमरे की ओर चलने का इशारा करते हुए आगे-आगे तेज कदमों से अपने कार्यालय-कक्ष में प्रवेश किए।
फिर एक कुर्सी पर रामखेलावन जी को बैठने का इशारा करते हुए अपने झोले को वहीं मेज पर रखकर एक गिलास में पानी लेकर कक्ष के बाहर आकर हाथ-ओथ धोए। उसके बाद कमरे में लगे हनुमानजी की फोटो को अगरबत्ती दिखाने के बाद अपनी कुर्सी पर बैठते हुए रामखेलावनजी से बोले,
“रामखेलावनजी, अब अपनी बात पूरी विस्तार से बताइए।”
उनकी अनुमति मिलते ही रामखेलावनजी कहना शुरू किए, “बाबू, कल मैं जब शाम को घर पर पहुँचा तो पता चला की मेरी बहू कुछ लकड़ी आदि की व्यवस्था करने जंगल की ओर गई थी और वहीं उसे किसे चुड़ैल ने धर लिया था। वह इधर-उधर जंगल में भटक रही थी तभी कुछ गाँव के ही गाय-बकरी के चरवाहों की नजर उस पर पड़ी। वे लोग स्थिति को भाँप गए और मेरी बहू को पकड़कर घर पर छोड़ गए। फिर गाँव के ही सोखा बाबा ने झाँड़-फूँक की उसके बाद उस चुड़ैंल से छुटकारा मिला।
पर आज सुबह फिर से उस पर चुड़ैल हावी हो गई है, सुबह से ही सोखा बाबा उसे उतारने में लगे हैं, पर वह छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है। समझ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं?” रामखेलावन की बातों को सुनकर रमेस बाबू थोड़े गंभीर हुए और अचानक पता नहीं क्या सूझा कि हँसने लगे।
रमेस बाबू की यह हालत देखकर रामखेलावनजी तो और भी हक्के-बक्के हो गए। उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर इनको क्या हो गया, कहीं इनपर भी तो किसी भूत-प्रेत का साया नहीं पड़ गया? अभी रामखेलावनजी यही सब सोच रहे थे तभी रमेस बाबू अपनी कुर्सी पर से उठे और बिना कुछ बोले रामखेलावन को अपने पीछे आने का इशारा करते हुए कमरे से बाहर निकल गए।
कमरे से बाहर निकल कर रमेसर बाबू पास की ही एक झाँड़ी से कुछ पत्तों को तोड़ा और मन ही मन कुछ मंत्र बुदबुदाए फिर रामखेलावन को उन पत्तों को देते हुए बोले कि आप इसे पीसकर अपनी बहू को पिला दें, और अपने घर पर ही रूकें। मैं कार्यालय में कुछ जरूरी काम-काज निपटाकर अभी 1-2 घंटे में आपके घर पर पहुँचता हूँ। रामखेलावनजी बिना कुछ बोले, केवल सिर हिलाए और उन पत्तों को लेकर घर की ओर बढ़ें। रास्ते में उन्हें केवल एक ही बात खाए जा रही थी कि रमेसर बाबू को यहाँ आए 3 साल हो गए पर कभी उन्होंने इस बात का जिक्र नहीं किया कि वे भूत-प्रेतों को उतारना भी जानते हैं।
कहीं वे मजाक में तो इन पत्तों को तोड़कर, झूठ-मूठ में कुछ बुदबुदाकर मुझे नहीं दे दिए? पर रमेस बाबू ऐसा नहीं कर सकते, वे तो बहुत गंभीर आदमी हैं, और हमारी सारी बातों को भी तो बहुत गंभीरता से लेते हैं और समय-समय पर हर प्रकार से हमारी मदद भी तो करते रहते हैं। ना-ना, वे मेरे साथ मजाक नहीं कर सकते।
यही सब सोचते-सोचते रामखेलावनजी घर पर पहुँच गए। घर के बाहर 10-15 गाँव-घर के ही लोग बैठे नजर आए। एक खटिया पर सोखा बाबा भी बैठकर लोगों से कुछ बात-चीत कर रहे थे। रामखेलावनजी को देखते ही सोखा बाबा बोल पड़े, “रामखेलावन, यह चुड़ैल तो बहुत ढीठ है, रात को छोड़ तो दी थी पर सुबह फिर से आ गई। 2-3 घंटे मैंने कोशिश किया पर छोड़कर जाने का नाम ही नहीं ले रही है,
अभी भी आंगन में नाच-कूद रही है। मेरे मंत्रों का अब तो उस पर कुछ असर भी नहीं हो रहा है, यहाँ तक कि मेरा भी मजाक उड़ा दी। इतना सब होने के बाद मैं उसे छोड़कर बाहर आकर बैठ गया हूँ। मैं अब कुछ नहीं कर सकता। मेरा जितना पावर था, वह सब अजमा लिया।” रामखेलावनजी सोखा बाबा के ही बगल में बैठते हुए अपनी लड़की को आवाज लगाए, उनकी लड़की घर में से दौड़ते हुए बाहर निकली।
फिर रामखेलावनजी ने उन पत्तों को उसे देते हुए कहा कि अभी इसे पीसकर बहू को पिला दो। अगर ना-नूकर करती है तो जबरदस्ती पिलाओ। इसके बाद रामखेलावन की लड़की उन पत्तों को लेकर घर में गई तथा उन पत्तों को पीसकर अपनी भाभी को पिलाई। अरे यह क्या, एक घूँट अंदर जाते ही रामखेलावन जी की बहू तो काफी शांत हो गई और वहीं आंगन में ही एक तरई पर बैठ गई।
अब उसके व्यवहार में काफी अंतर आ गया था। उसका कूदना-नाचना बंद हो गया। रामखेलावनजी की लड़की दौड़ते हुए घर में बाहर निकली और रामखेलावनजी की ओर देखकर बोली, “बाबू, बाबू! भउजी को अब आराम हो गया है, वे आंगन में ही अब शांति से बैठ गई हैं।” बाहर जितने लोग बैठे थे, वे सब हतप्रभ हो गए।
आखिर जो चुड़ैल इतने बड़े सोखा से बस में नहीं आई, वह दो-चार पत्तों को पिलाने से कैसे बस में आ सकती है? आखिर वे कैसे पत्ते थे? क्या किसी धर्म-स्थान से लाए गए थे या किसी बहुत बड़े पंडित, ओझा, सोखा आदि ने दिए थे? वहाँ बैठे लोगों में से एक ने रामखेलावनजी की ओर देखा पर कुछ बोले इससे पहले ही रामखेलावनजी ने उन पत्तों के बारे में बता दिया।
सभी लोग बिन देखे उस रमेस बाबू के प्रति नतमस्तक हो गए। सोखा बाबा ने कहा कि वास्तव में आपके रमेस बाबू तो बहुत पहुँचे निकले। जिस चुड़ैल को बस में करने के लिए मैंने सारे के सारे हथकंडे अपना लिए, उसे उनके मंत्रित दो-चार पत्तों ने बस में कर लिया। फिर तो रामखेलावनजी थोड़ा तन कर बैठ गए और लगे रमेसर बाबू का गुणगान करने।
अभी वे लोग आपस में बात कर ही रहे थे तभी रमेस बाबू की साइकिल वहाँ रूकी। रमेस बाबू को देखते ही रामखेलावनजी दौड़कर रमेसर बाबू के हाथ से साइकिल लेकर खुद ही खड़ी करते हुए बोले, रमेस बाबू, आपके पत्तों ने तो कमाल कर दिया। अब बहू काफी अच्छी है और शांति से आंगन में बैठी है।
रमेस बाबू के इतना कहते ही वहाँ बैठे सभी लोग खड़े हो गए और रमेस बाबू की जयरम्मी करने लगे। रमेस बाबू सबका अभिवादन स्वीकार करते हुए उन लोगों के बीच ही एक खाट पर बैठ गए।
फिर रमेस बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को घर में बाहर बुलवाया। वह काफी शांत थी पर रमेस बाबू को लगा कि अभी भी वह चुड़ैल यहीं है और पत्ते का असर खत्म होते ही फिर से इसे जकड़ लेगी। रमेस बाबू ने रामखेलावनजी की बहू को अपने पास बैठने का इशारा करते हुए कुछ मंत्र बुदबुदाने लगे।
अरे यह क्या, रामखेलावनजी की बहू घबराकर बोल उठी, मुझे छोड़ दीजिए, मैं जा रही हूँ, मैं अब कभी भी इसे नहीं पकड़ूँगी। मुझे जाने दीजिए, मुझे जाने दीजिए, मैं जल रही हूँ, मुझे छोड़ दीजिए। उस चुड़ैल को इस तरह गिड़गिड़ाते हुए देखकर रामखेलावनजी की काफी हिम्मत बढ़ गई।
वे बोल पड़े, रमेस बाबू, इसे छोड़िएगा मत। इसे जला कर भस्म कर दीजिए। पर वह चुड़ैल रामखेलावनजी की ओर ध्यान न देते हुए, रमेस बाबू की ओर दयनीय स्थिति में देखते हुए अपने प्राणों की भीख माँगती रही। रमेसर बाबू काफी गंभीर लग रहे थे। वे रामखेलावनजी की बहू की ओर गुस्से से देखते हुए बोले कि तुम कौन हो और इसे क्यों पकड़ीं?
इस पर वह चुड़ैल गिड़गिड़ाते हुए बोली की मैं पास के ही जंगल में रहती हूँ। मैं बंजारा परिवार से हूँ, एकबार हमारे परिवार ने इसी जंगल के बाहर अपना टेंट लगाया था। शाम के समय मैं लकड़ी लेने जंगल में प्रवेश की। मुझे पता नहीं चला कि कब मैं घने जंगल में पहुँच गई और रास्ता भी भटक गई। तब तक रात भी होने लगी थी। जंगल में पूरा अंधेरा पसरना शुरू हो गया था। मैं थोड़ी डर गई थी पर हिम्मत नहीं खोई थी। अचानक मेरे दिमाग में एक विचार आया।
मैंने सोचा कि रात के इस अंधेरे में अब रास्ता खोजना ठीक नहीं। कहीं किसी जंगली जानवर की शिकार न हो जाऊँ। इसलिए मैंने हिम्मत करके वहीं एक मोटे जंगली पेड़ पर चढ़कर बैठ गई। मैंने सोचा कि सुबह होते ही मेरे परिवार के लोग जरूर मुझे खोजने आएंगे और अगर नहीं भी आए तो मैं दिन में अपना रास्ता खोज लूँगी।
पर वह रात शायद मेरे जीवन की समाप्ति के लिए ही आई थी। मैं जिस पेड़ पर चढ़कर बैठी थी, उसी पर एक प्रेत का डेरा था। आधी रात तक तो सब कुछ एकदम ठीक-ठाक था पर उसके बाद अचानक वह प्रेत कहीं से उस पेड़ पर आ बैठा।
उसके आते ही जैसे पूरे जंगल में भयंकर तूफान आ गया हो। अनेकों पेड़ों की डालियाँ तेज हवा से डरावने रूप से हिलने लगी थीं। मुझे देखते ही वह जोरदार ढंग से अट्टहास किया और मुझे कोई प्रेतनी ही समझ कर बोला कि तुम्हें पता नहीं कि यह मेरा निवास है।
मैं कुछ जरूरी काम से जंगल से बाहर क्या गया, तूने मेरे बसेरे पर कब्जा कर लिया। मैं तूझे छोड़ूँगा नहीं, इतना कहकर वह मेरे तरफ झपटा, अत्यधिक डर से तो मेरी चींख निकल गई।
मैं बहुत तेज चिल्लाई की मैं कोई प्रेतनी नहीं हूँ। मैं इंसान हूँ इंसान। मेरी बातों को सुनकर तो वह और जोर से अट्टहास करने लगा और बोला कि मुझे एक संगिनी चाहिए। तुझे अगर सही-सलामत रहना है तो मुझसे विवाह करना होगा। मरता क्या न करता।
मैंने सोचा कि अब इस समय बस एक ही रास्ता है कि इसकी बातों को मान लिया जाए और दिन उगने के बाद यहाँ से खिसक लिया जाएगा। मैंने उसके हाँ में हाँ मिलाते हुए अपनी सहमति दे दी। मुझे क्या पता था कि यह सहमति मुझपर बहुत भारी पड़ेगी। इतना कहने के बाद रामखेलावन की बहू पर सवार वह चुड़ैल फूट-फूटकर रोने लगी।
रमेस बाबू थोड़े भावुक हो गए और उसके प्रति थोड़ी नरमी दिखाते हुए पानी भरा लोटा उसको पीने के लिए दे दिए। दो-चार घूँट पानी पीने के बाद उसने फिर से कहना शुरू किया। मेरी सहमति देने के बाद वह प्रेत पता नहीं कहाँ गायब हो गया, उसके गायब होते ही मैंने थोड़ीं चैन की साँस ली पर यह क्या अभी 10-15 मिनट भी नहीं बीते होंगे कि उस जंगल में जैसे भूचाल आ गया हो।
एक बहुत बड़ा तूफान आ गया हो। कितने पेड़ों की पता नहीं कितनी डालियाँ टूटकर धरती पर पड़ गईं। कम से कम सैकड़ों भूत-प्रेत वहाँ उपस्थिति हो गए थे। चारों तरफ चीख-पुकार मचा हुआ था। कुछ डरावनी अट्टहास कर रहे थे तो कुछ इस डाली से उस डाली पर कूद-फाँद रहे थे, तो कुछ ताली बजाकर नाच रहे थे। मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब क्या हो रहा है।
तब तक वही प्रेत फिर से मेरे पास प्रकट हुआ और बोला की विवाह की व्यवस्था करने चला गया था। अपने परिवार वालों को बुलाने चला गया था। शादी में इन सबको भी तो शरीक करना होगा। अरे यह क्या अब तो मेरी शामत आ गई। पूरा शरीर पीला पड़ गया।
कुछ बोलने की हिम्मत नहीं रही, तभी अचानक एक प्रेतनी वहां प्रकट हुई और उस प्रेत से लड़ने लगी। वह प्रेतनी बोल रही थी कि मेरे रहते तूँ दूसरी शादी करेगा, कदापि नहीं, कदापि नहीं। मैं ऐसा नहीं होने दूँगी और इतना कहने के साथ ही उस प्रेतनी ने उस डाल से मुझे धक्का दे दिया और जमीन पर गिरने के कुछ ही समय बाद मेरी इहलीला समाप्त हो गई थी।
इतने कहने के साथ ही वह चुड़ैल फिर से रोने लगी थी। इसके बाद रमेस बाबू ने उस चुड़ैल को चुप रहने का इशारा करते हुए कहा कि आज के बाद तूँ इन गाँव वालों को कभी परेशान नहीं करोगी। चुड़ैल ने हामी भरते हुए कहा कि ठीक है। पर मैं तो एक बहुत ही छोटी आत्मा हूँ। इन पास के जंगलों में पता नहीं कितनी भयानक-भयानक आत्माएँ विचरण करती हैं। आप उन सबसे इस गाँव वालों को कैसे बचा पाएँगे।
उस चुड़ैल की इस बात को सुनते हुए रमेस बाबू हल्की मुस्कान में बोले। तूँ तो बकस इन लोगों को, बाकी भूत-प्रेतों से कैसे निपटना है, वह तूँ मुझपर छोड़। इसके बाद रमेस बाबू ने लोगों को अब कभी न पकड़ने की बात उस चुड़ैल से तीन बार कबूल करवाई तथा साथ ही उसे थूककर चाटने के बाद ही जाने दिया।
तो पाठकगण, रमेस बाबू ने उस चुड़ैल से तो गाँव वालों को छुटकारा दिला दिया पर क्या वे दूसरे भूत-प्रेतों से उन गाँव वालों की रक्षा कर पाए??? राज को राज ही रहने दिया जाए। खैर आप लोग बताएँ कि यह भूतही काल्पनिक कहानी आप लोगों को कैसी लगी???
जय बजरंग बली।
जंगल की चुड़ैल
रोज की तरह ही उस दिन कम ख़त्म होने के बाद घर के लिए अपनी गाड़ी से रवाना होने लगे ! रास्ते में उन्हे हाट से कुछ समान भी लेना था तो वे और साथियों से अलग हो गये ! उन्होने घर की कुछ जरूरत के समान लिए और गाड़ी आगे बढ़ा दी !
आगे जाने पर उन्हे कुछ मछली बाज़ार दिखा और वे मछली खरीदने के लिए रुक गये ! ताज़ी मछलियाँ लेने और देखने मे टाइम ज़्यादा ही गुजर गया ! उनकी जब अपनी घड़ी पर नज़र गई तो उन्हे आभास हुआ की आज तो घर जाने मे बहुत देर हो जाएगी और ये सब लेकर घर पहुचने मे काफ़ी समय लग जाएगा !
फिर यही सब सोच कर उन्होने सोचा कि क्यू ना जंगल के रास्ते से निकला जाए तो जल्दी पहुँच जाउँगा ! तो उन्होने अपना रास्ता बदला और जंगल की तरफ़ अपनी गाड़ी को घुमा लिया ! समय ११ बज चुका था गाड़ी तेज रफ़्तार से आगे बढ़ रहां था तभी अचनाक तेज ब्रेक के साथ गाड़ी को रोकना पड़ा !
उनकी गाड़ी के आगे एक औरतज़ोर २ से रो रही थी! उन्होने सोचा इस वीराने मे ये औरत क्या कर रही हैं उन्हे लगा की कोई मजदूर की पत्नी होगी जो नाराज़ होकर घर छोड कर जॅंगल मे भाग आई हैं तो उन्होने उससे पूछा की यहाँ जॅंगल मे तुम क्या कर रही हो?
लकिन उसने कोई जवाब न देकर और ज़ोर २ से रोने लगी! सारे जंगल मे उसकी हूँ हूँ सी सिसकियाँ गूँज रही थी! फिर नाना जी ने पूछा तुम्हारा घर कहाँ हैं? लेकिन वो कुछ भी ना बोली! तब नाना जी ने कहा की आज चलो मेरे घर मे रहना सुबह अपने घर चली जाना ये जॅंगल बहुत सारे जंगली जानवर से भरा हे रात भर यहाँ मत रूको चलो आज मेरे घर मे सब के लिए खाना बना देना और कल सुबह अपने घर चली जाना ! उसने ये सुना तो झट से तैयार हो गई !
और गाड़ी मे पीछे की सीट पर बैठ गई! सिर मे बड़ा सा घूँघट डालने की वजह से उसका चेहरा छिपा हुआ था ! कुछ ही देर मे गाड़ी घर के दरवाजे पे थी! घर के लोग कब से उनकी राह देख रहे थे ! गाड़ी रुकते ही पापा ने पूछा आज तो बहुत देर हो गई और सारे लोग आ भी चुके हैं !
तब उन्होने सारी बातें अपनी माँ को बताई और कहा की आज खाना इससे बनवा लो कल सुबह ये अपने घर चली जाएगी! इतनी रात को बेचारी जंगल मे कहा भटकती ! इसलिए मैं ले आया ! पर पापा को कुछ संदेह हो रहा था की कहीं चोर तो नहीं हे रात को सोने के बाद या खाना बनाते समय कहीं घर के सामान ही चुरा कर ना ले जाए! पर बेटे की बात को कैसे माना करती !
उन्होने उस औरत को कहा देखो आज तो मैं रख ले रही हूँ लेकिन कल सुबह होते ही यहाँ से चली जाना! और जाओ रसोई मे ये समान उठा कर ले जाओ और खाना बना दो ! उसने फिर से जवाब नहीं दिया ! बस हूँ हूँ हूँ की आवाज बाहर आयी ! और वो सारा सामान लेकर माँ के पी छे बहुत दूर चल दी! रसोई मे सारा सामान रखवा कर माता जी ने उसे खाना जल्दी बनाने की सख्त हिदायत दी! और वहाँ से चली गई !
लेकिन उनका मन कुछ परेसान सा था !
फिर १० मिनट मे रसोरे मे उसे देखने चली गई की वो क्या कर रही हे और उसका चेहर भी देखना चाहती थी! लेकिन ..................................................................... वहाँ पहुची तो देखा की वो मछलियों का थैला निकल रही थी! उन्होने बहुत ज़ोर से गुस्से मे कहा यहाँ सब खाने का इंतजार कर रहे हे और तुम अभी तक मछलियाँ ही निकल रही हो कल सुबह तक बनाओगी क्या? उसके सिर पर घूँघट अभी भी था तो चेहरा देखना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था !
उन्होने उससे कहा तुम जल्दी से खाने की तैयारी करो मैं आग सुलगा देती हूँ काम जल्दी हो जाएगा ! और वे जल्दी से चूल्हा जलाने की तैयारिया करने लगी ! लेकिन साथ ही वो उसका चेहरा देखने की भी कोशिश कर रही थी ! लेकिन वो जितना देखने की कोशिश करती वो और पल्लू खींच लेती! अंत मे हार कर वे बोली देखो मैने आग सुलगा दी हैं अब आगे सारा काम कर लो !
कुछ ज़रूरत हो तो बुला लेना ! लेकिन वो फिर कुछ नहीं बोली ! अब उन्हें लगा की यहाँ से जाने मे ही ठीक हैं ! वरना मेरा भी समय खराब होगा और हो सकता हैं अंजान लोगों से डर रही हो ! ये सब सोच कर उन्होंने उसे कहा की मैं आ रही हूँ जल्दी से खाना बना कर रखना ! और वहाँ से निकल गई ! मन अभी तक परेसांन ही था ! कभी अपने कमरे कभी बच्चों के कभी बाहर सब को देख रही थी, कहीं कुछ अनहोनी ना हो जाए! एक मिनट भी आराम से नहीं बैठ पाई !
अभी पाँच मिनट ही हुए थे पर उनके लिए वो घड़ी पहाड़ सी हो रही थी ! समय बीत ही नहीं रहा था ! आठ मिनट बड़ी मुश्किल से गुज़रे और वे तुरंत ही कुछ सोच कर रसोरे की तरफ दौड़ी ! और वहाँ पहुँच कर आया जैसे ही उन्होने रसोई घर का नज़ारा देखा , उनकी आँखे फटी की फटी रह गई !
उनके पैर बिल्कुल ही जम गये ना उनसे आगे जाया जा रहा था ना ही पीछे ! उनके हृदय की धडकने रुक रही थी ! वो औरत रसोरे मे बैठ कर सारी कच्ची मछलिया खा रही थी ! सारे रसोरे में मछलियाँ और खून बिखरा पड़ा था ! उसके सिर से घूँघट भी उतरा पड़ा था ! इतना खौफनाक चेहरा आज तक उन्होने नहीं देखा था ! बाल, नाख़ून सब बढ़े हुए थे !
मछलियाँ खाने मे मगन होने की वजह से उसे कुछ ध्यान भी नहीं था ! और खुशी से कभी २ वो आवाज़े भी निकल रही थी ! हूँ हूँ सी आवाज़े गूँज रही थी ! रसोरा पिछवारे मे होने की वजह से और लोगों का ध्यान भी इधर नही आ रहा था ! माँ को भी कुछ नहीं समझ आ रहा था , कि चिल्लाने से कहीं घर के लोगों को नुकसान ना पहुचाए !
वो चुड़ैल से अपने घर को कैसे बचाए उन्हे समझ नहीं आ रहा था ! बस भगवान का नाम ही उनके दिमाग़ मे आ रहा था ! अचानक वे आगे बढ़ने लगी उसकी तरफ ! और झट से एक थाल लिया और चूल्हे की तरफ दौड़ी ! उस चुरैल की नज़र भी पापा पर पड़ चुकी थी सो वो भी कुछ सोच कर उठी अपनी जगह से ! माँ कुछ भी देर नहीं करना चाहती थी ,
उन्हे पता था की आज अगर ज़रा सी भी लापरवाही हुई तो अनहोनी हो जाएगी ! उस चुरैल के कुछ करने से पहले ही उन्हे चूल्हे तक पहुचना था ! और चूल्हे के पास पहुँच कर उन्होने जलता हुआ कोयला थाल मे भर लिया ! और चुड़ैल की तरफ लेकर जोर से फेंका ! आग की जलन की वजह से वो अजीब सी डरावनी आवाज़े निकालने लगी !
अब तो उसकी आवाज़े बाहर भी जा रही थी सारे लोग बाहरसे रसोरे की तरफ भागे ! वो चुड़ैल ज़ोर से हूँ हूँ जोर की आवाज़ निकल रही थी और पूरे रसोरे मे दौड़ रही थी और माता जी को पकड़ना भी चाह रही थी ! लेकिन अब सारे लग रसोरे मे आ चुके थे काफी लोगों की भीड़ देख कर वो और भी डर गयी थी !
लोंगों की भीड़ को थेलती हुई वो बाहर जॅंगल की तरफ भाग गये और सारे लोग ये मंज़र देख कर डरे साहमे से खड़े थे ! और मन हीं मन माता जी की हिम्मत की दाद दे रहे थे तो ऐसे छूटा चुरैल से पीछा !
दादा जी के साथ घर पहुँची चुड़ैल
दादाजी शहर में क्लर्क थे उस दिन सारे लोग जल्दी कार्यालय का सारा काम ख़त्म करके घर की तरफ निकल रहे थे |दादा जी उस समय के बड़े अधिकारियों मे से एक थे |रोज की तरह ही उस दिन कम ख़त्म होने के बाद घर के लिए अपनी गाड़ी से रवाना होने लगे | रास्ते में उन्हे हाट से कुछ समान भी लेना था तो वे अपने साथियों से अलग हो गये |
उन्होने घर की कुछ जरूरत के समान लिए और गाड़ी आगे बढ़ा दी | आगे जाने पर उन्हे कुछ मछली बाज़ार दिखा और वे मछली खरीदने के लिए रुक गये |
ताज़ी मछलियाँ लेने और देखने मे टाइम ज़्यादा ही गुजर गया | उनकी जब अपनी घड़ी पर नज़र गई तो उन्हे आभास हुआ की आज तो घर जाने मे बहुत देर हो जाएगी और ये सब लेकर घर पहुचने मे काफ़ी समय लग जाएगा|फिर यही सब सोच कर उन्होने सोचा कि क्यू ना जंगल के रास्ते से निकला जाए तो जल्दी पहुँच जाउँगा | तो उन्होने अपना रास्ता बदला और जंगल की तरफ़ अपनी गाड़ी को घुमा लिया |
रात के 10 बज चुके थे गाड़ी तेज रफ़्तार से आगे बढ़ रही थी तभी अचनाक तेज ब्रेक के साथ गाड़ी को रोकना पड़ा |उनकी गाड़ी के आगे एक औरत ज़ोर-जोर से रो रही थी!उन्होने सोचा इस वीराने मे ये औरत क्या कर रही हैं उन्हे लगा की कोई मजदूर की पत्नी होगी जो नाराज़ होकर घर छोड कर जॅंगल मे भाग आई हैं तो उन्होने उससे पूछा की यहाँ जॅंगल मे तुम क्या कर रही हो?
लकिन उसने कोई जवाब न देकर और ज़ोर जोर से रोने लगी| सारे जंगल मे उसकी हूँ हूँ हूँ हूँ सी सिसकियाँ गूँज रही थी! फिर दादा जी ने पूछा तुम्हारा घर कहाँ हैं?लेकिन वो कुछ भी ना बोली! तब दादा जी ने कहा की आज चलो मेरे घर मे रहना सुबह अपने घर चली जाना ये जॅंगल बहुत सारे जंगली जानवर से भरा हे रात भर यहाँ मत रूको चलो आज मेरे घर मे सब के लिए खाना बना देना और कल सुबह अपने घर चली जाना ! उसने ये सुना तो झट से तैयार हो गई !
और गाड़ी मे पीछे की सीट पर बैठ गई! सिर मे बड़ा सा घूँघट डालने की वजह से उसका चेहरा छिपा हुआ था ! कुछ ही देर मे गाड़ी घर के दरवाजे पे थी! घर के लोग कब से उनकी राह देख रहे थे ! गाड़ी रुकते ही माँ ने पूछा आज तो बहुत देर हो गई और सारे लोग आ भी चुके हैं !
तब उन्होने सारी बातें अपनी माँ को बताई और कहा की आज खाना इससे बनवा लो कल सुबह ये अपने घर चली जाएगी! इतनी रात को बेचारी जंगल मे कहा भटकती ! इसलिए मैं ले आया ! पर माँ को कुछ संदेह हो रहा था की कहीं चोर तो नहीं हे रात को सोने के बाद या खाना बनाते समय कहीं घर के सामान ही चुरा कर ना ले जाए! पर बेटे की बात को कैसे माना करती !
उन्होने उस औरत को कहा देखो आज तो मैं रख ले रही हूँ लेकिन कल सुबह होते ही यहाँ से चली जाना! और जाओ रसोई मे ये समान उठा कर ले जाओ और खाना बना दो ! उसने फिर से जवाब नहीं दिया ! बस हूँ हूँ हूँ की ध्वनि सी बाहर आई! और वो सारा सामान लेकर माँ के पी छे २ चल दी!
रसोई मे सारा सामान रखवा कर माँ ने उसे खाना जल्दी बनाने की सख्त हिदायत दी!और वहाँ से चली गई !लेकिन उनका मन कुछ परेसान सा था !फिर ५ मिनट मे रसोरे मे उसे देखने चली गई की वो क्या कर रही हे और उसका चेहर भी देखना चाहती थी!लेकिन वहाँ पहुची तो देखा की वो मछलियों का थैला निकल रही थी!
उन्होने बहुत ज़ोर से गुस्से मे कहा यहाँ सब खाने का इंतजार कर रहे हे और तुम अभी तक मछलियाँ ही निकल रही हो कल सुबह तक बनाओगी क्या? उसके सिर पर घूँघट अभी भी था तो चेहरा देखना मुश्किल था ! उन्होने उससे कहा तुम जल्दी से खाने की तैयारी करो मैं आग सुलगा देती हूँ काम जल्दी हो जाएगा !
और वे जल्दी से चूल्हा जलाने की तैयारिया करने लगी !लेकिन साथ ही वो उसका चेहरा देखने की भी कोशिश कर रही थी ! लेकिन वो जितना देखने की कोशिश करती वो और पल्लू खींच लेती! अंत मे हार कर वे बोली देखो मैने आग सुलगा दी हैं अब आगे सारा काम कर लो !
कुछ ज़रूरत हो तो बुला लेना ! लेकिन वो फिर कुछ नहीं बोली ! अब उन्हें लगा की यहाँ से जाने मे ही ठीक हैं ! वरना मेरा भी समय खराब होगा और हो सकता हैं अंजान लोगों से डर रही हो ! ये सब सोच कर उन्होंने उसे कहा की मैं आ रही हूँ जल्दी से खाना बना कर रखना !
और वहाँ से निकल गई ! मन अभी तक परेसांन ही था ! कभी अपने कमरे कभी बच्चों के कभी बाहर सब को देख रही थी, कहीं कुछ अनहोनी ना हो जाए!एक मिनट भी आराम से नहीं बैठ पाई ! अभी पाँच मिनट ही हुए थे पर उनके लिए वो घड़ी पहाड़ सी हो रही थी ! समय बीत ही नहीं रहा था !
आठ मिनट बड़ी मुश्किल से गुज़रे और वे तुरंत ही कुछ सोच कर रसोरे की तरफ दौड़ी ! और वहाँ पहुँच कर …..जैसे ही उन्होने रसोई घर का नज़ारा देखा , उनकी आँखे फटी की फटी रह गई ! उनके पैर बिल्कुल ही जम गये ना उनसे आगे जाया जा रहा था ना ही पीछे !
उनके हृदय की धडकने रुक रही थी ! वो औरत रसोरे मे बैठ कर सारी कच्ची मछलिया खा रही थी ! सारे रसोरे में मछलियाँ और खून बिखरा पड़ा था ! उसके सिर से घूँघट भी उतरा पड़ा था !
इतना खौफनाक चेहरा आज तक उन्होने नहीं देखा था ! बाल, नाख़ून सब बढ़े हुए थे ! मछलियाँ खाने मे मगन होने की वजह से उसे कुछ ध्यान भी नहीं था ! और खुशी से कभी २ वो आवाज़े भी निकल रही थी !हूँ हूँ हूँ सी आवाज़े गूँज रही थी !
रसोरा पिछवारे मे होने की वजह से और लोगों का ध्यान भी इधर नही आ रहा था ! माँ को भी कुछ नहीं समझ आ रहा था , कि चिल्लाने से कहीं घर के लोगों को नुकसान ना पहुचाए !वो चुड़ैल से अपने घर को कैसे बचाए उन्हे समझ नहीं आ रहा था !बस भगवान का नाम ही उनके दिमाग़ मे आ रहा था !
अचानक वे आगे बढ़ने लगी उसकी तरफ !और झट से एक थाल लिया और चूल्हे की तरफ दौड़ी ! उस चुड़ैल की नज़र भी माँ पर पड़ चुकी थी सो वो भी कुछ सोच कर उठी अपनी जगह से !
माँ कुछ भी देर नहीं करना चाहती थी , उन्हे पता था की आज अगर ज़रा सी भी लापरवाही हुई तो अनहोनी हो जाएगी !उस चुड़ैल के कुछ करने से पहले ही उन्हे चूल्हे तक पहुचना था !और चूल्हे के पास पहुँच कर उन्होने जलता हुआ कोयला थाल मे भर लिया !और चुड़ैल की तरफ लेकर जोर से फेंका !
आग की जलन की वजह से वो अजीब सी डरावनी आवाज़े निकालने लगी !अब तो उसकी आवाज़े बाहर भी जा रही थी सारे लोग बाहरसे रसोरे की तरफ भागे !वो चुड़ैल ज़ोर २ से हूँ हूँ हूँ …………… की आवाज़ आयीनिकाल रही थी और पूरे रसोरे मे दौड़ रही थी और माँ को पकड़ना भी चाह रही थी !
लेकिन अब सारे लग रसोरे मे आ चुके थे तो लोगों की भीड़ देख कर वो और भी डर गई थी !लोंगों की भीड़ को थेलती हुई वो बाहर जॅंगल की तरफ भागी !और सारे लोग ये मंज़र देख कर डरे साहमे से खड़े थे ! और मन हीं मन माँ की हिम्मत की दाद दे रहे थे !तो ऐसे छूटा चुड़ैल से पीछा