अधजला खंडहर
बात उन दिनों की है जब मैं कॉलेज का स्टूडेंट था| अपने कॉलेज की ओर से हम सभी कैम्प के लिए एक जंगल में गए थे| , हलकी ठंढ थी ; अत: रात में हम सबने पूरी रात कैम्प – फायर के साथ डांस करने ,गाने आदि का प्रोग्राम तय किया| मुझे और सभी साथियों को कैम्प फायर के लिए लकडियाँ इकट्ठी करने का भार सौंपा गया| मैं निकला तो सबके साथ ही लेकिन जंगल के प्राकृतिक सौन्दर्य में भटकता हुआ अकेले बहुत दूर कहीं निकल गया|
अचानक आसमान बादलों से भर गया और गरज के साथ बारिश होने लगी| बादलों के लगातार गरजने से मैं पेड़ के नीचे खड़ा रहना मुनासिब न समझ आसपास किसी घर की तलाश में एक दिशा में भागने लगा|मुझे कुछ ही दूरी पर एक लाल ईंटों से बनी शानदार बिल्डिंग नजर आई| , बिल्डिंग रोशनी से पूरी नहाई हुई थी और उसमें ढेर सारे लोग हैं – ऐसा दूर से ही लग रहा था| मैं तेजी से भागते हुए उस बिल्डिंग में जा घुसा और सामने से आती हुई एक खुबसूरत नर्स से टकराते – टकराते बचा| नर्स ने मुझे घूर कर देखते हुए कहा – “ बहुत अधिक भीग गए हो ,सर्दी लग जायेगी| उधर बाईं ओर एक स्टोर रूम है ; वहां जाकर जो भी मिले उससे कहना सिस्टर जूलिया ने दुसरे सूखे और साफ़ कपडे मुझे देने को कहा है – वह तुम्हे कपडे दे देगा|
“ मैं हक्का – बक्का मुंह फाड़े सिस्टर जूलिया को देखता रहा| मुझे एकदम से यह समझ नहीं आया कि मैं क्या करूँ| मेरी स्थिति देखकर सिस्टर जूलिया खिलखिलाकर हंस पड़ी और बोली – “पहले तो तुम अपना मुंह बंद करो वरना मुंह में मच्छड घुस जायेंगे और अब जाकर वीसा ही करो जैसा मैं ने कहा है|
” मैं हलके से ‘हाँ ‘ में सर हिला सिस्टर की बताई दिशा में जाने को मुद गया|अभी कुछेक दस कदम ही चला होउंगा कि मेरे कंधे पर किसी ने हाथ रखा| मैं चौंककर पीछे मुदा और अपने सामने आर्मी की वर्दी में एक युवक को खडा मुस्कुराता पाया| मेरे चेहरे पर आश्चर्य का बादल अपना घर बना चुका था ;
जिसे देखते ही उस युवक को हंसी आ गई| उसने धीमे ,किन्तु दृढ स्वर में कहा – “ मैं कैप्टन विनोद हूँ और यह हमारे देश की आर्मी का हॉस्पिटल है|’ कैप्टन विनोद की बातों ने मुझे आश्वस्त किया| मैं अब धीरे – धीरे सामान्य हो गया और मैं ने कैप्टन विनोद को सिस्टर जूलिया की कही बातें बताई| सुनकर ,कैप्टन विनोद के चेहरे पर रहस्यमयी मुस्कान फ़ैल गई और वे बोले –
“ तो सिसितर जूलिया से भी मिल चुके|”
“ जी , क्या मतलब है आपका ?”
“ कुछ नहीं ,चलो मैं तुम्हे सूखे कपडे देता हूँ चेंज कर लो नहीं तो सच में सर्दी लग जायेगी|
” और मैं कैप्टन विनोद के पीछे – पीछे एक बड़े से कमरे में पहुँच गया| कमरे के चारो ओर हरे रंग के परदे लगे हुए थे| ,
एक ओर एक बड़ा सा बेड पडा हुआ था और उसके सामने एक सोफा था| बीच में एक टेबल था जिस पर दो ग्लास ,एक बड़ी बोतल ब्रांडी की और एक या दो पत्रिकाएं पड़ी हुई थीं|कमरे के एक कोने में एक बड़ी सी अलमारी थी ;जिसमें से कैप्टन विनोद ने एक आसमानी रंग का कुरता – पायजामा निकालकर मुझे दिया और कमरे से लगे बाथरूम की ओर इशारा किया|
मैं बाथरूम से कपडे चेंज कर जैसे ही निकलने लगा मेरी नजर बाथरूम की एक दीवाल पर पड़ी| वह खून के छींटों से भारी हुई थी| यह देखकर मैं घबडा गया और जल्दी से बाहर निकलने को मुदा कि बाथरूम में लगे आईने में खुद को ही देखकर चौंक गया|
आईने में मेरा पूरा शरीर तो नजर आ रहा था लेकिन मेरे शरीर पर से मेरा सर गायब था|
अब मुझे डर लगने लगा और मैं हडबडा कर बाथरूम से निकल गया| ,
मुझे इस तरह बाहर निकलते देख कैप्टन विनोद ने हंसकर पूछा – “ क्या हुआ ?
अरे हाँ ,तुम ने तो अब तक मुझे अपना नाम ही नहीं बताया|”
“ कहाँ जाओगे ,
बाहर बहुत तेज बारिश हो रही है| लेकिन ,तुम जाना क्यों चाहने लगे अचानक यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ|”
“ कैप्टन विनोद आपकी बाथरूम की एक दीवाल पूरी खून के छींटों से भरी हुई है| और और आपके बाथरूम में लगा आईना भी कुछ अजीब सा है| उसमें मुझे मेरा पूरा शरीर तो दिखाई दिया लेकिन मेरा सर ही गायब था| मैं अब बिलकुल भी नहीं रुकुंगा यहाँ| बारिश में ही भीगता हुआ अपने कैम्प तक जाऊँगा|
” कहते हुए मैं कमरे से बाहर जाने वाले दरवाजे की ओर बढ़ा| “ रुको “ तभी कैप्टन विनोद की कडकती आवाज गूंजी “ तो तुमने सबकुछ देख ही लिया|”
“जी क्या मतलब है आपका ?
” मेरी आवाज में डर भर गया था|
“ मतलब चाहे जो हो|तुम तब तक यहाँ से नहीं जा सकते जबतक मैं तुम्हे कुछ बता न दूं|”
“ क्क्कक्या बताना चाहते हैं आप ?”
“ जो आजतक कोई न जान सका|”
“ जो आज तक कोई न जान सका वह मैं जानकार क्या करूंगा| प्लीज ,अब मुझे जाने दें|”
– मैं डर से रुआंसा हो गया| “नहीं , बिलकुल भी नहीं| और , तुम्हे मुझसे डरने की भी कोई जरुरत नहीं| सैनिक सबकी रक्षा के लिए होते हैं| मैं भी तुम्हारी सुरक्षा ही कर रहा हूँ|”
- कैप्टन विनोद के स्वर में कोमलता थी – “ आओ मेरे साथ इस सोफे पर बैठ जाओ| मैं तुम्हे एक कहानी सुनाता हूँ| कहानी खत्म होते ही मैं तुम्हे तुम्हारे कैम्प तक जीप से छोड़ आऊंगा| वैसे भी तुम अपने साथियों से काफी आगे निकल आये हो|वहां तक तुम अब चलते हुए शायद पहुँच न पाओ|
” कैप्टन विनोद के स्वर में जाने कैसी आश्वस्ति थी मैं जाकर उनके बगल में बैठ गया| कैप्टन विनोद ने कहना शुरू किया –
“दुश्मनों ने धोखे से हमारे अस्पताल को अपना निशाना बनाया| दुश्मन देश के दो सैनिक हमारे सैनिक के वेश में एक हमारे ही घायल सैनिक को लेकर आये| वह घायल था और और हमारे देश की सेना ने उसे बहुत ढूंढा लेकिन नहीं मिला था| शायद , साजिश के तहत उसे घायल होते ही घुसपैठियों ने कहीं छुपा दिया था|
अचानक अपने खोये सैनिक को अपने हॉस्पिटल में पा सभी खुश हो गए और बिना अधिक पड़ताल किये हॉस्पिटल के गेस्ट रूम में घायल को लेकर आने वाले छद्म वेष धारियों को ठहरने की इजाजत दे दी गई|
अभी उस सैनिक का इलाज चल ही रहा था कि जोरों का ब्लास्ट हुआ और पूरा हॉस्पिटल एक पल में खंडहर में तब्दील हो गया|” “ लेकिन हॉस्पिटल तो अपनी शानदार स्थिति में खडा है|
“ मेरी बातों को अनसुना कर कैप्टन विनोद ने अपनी बात जारी रखी – “ कोई नहीं बचा उस ब्लास्ट में| दीवाल पर पड़े खून के छींटे भी उसी ब्लास्ट में मारे गए हॉस्पिटल के कर्मचारियों के हैं|” “ हाँ , पर यह हॉस्पिटल तो मुझे खंडहर नहीं दिखता|
” जवाब में कैप्टन विनोद के चेहरे पर रहस्य भरी मुस्कान फ़ैल गई और उनका चेरा अजीब से भावों से भर गया| मैं उनके चेहरे को देखकर अन्दर से दहल गया|
फिर भी , मैं ने हिम्मत कर पूछा –
“ आप उस ब्लास्ट में बच कैसे गए ?” सुनते ही कैप्टन विनोद ठहाका लगा कर हंस पड़े और मुझ पर एक भरपूर नजर डालते हुए कहा –
“ यह कहानी आज से मात्र दस वर्ष पहले की है और मैं तो आज से पचास वर्ष पहले मर चुका हूँ|
” इसके आगे उनहोंने क्या कहा – मुझे कुछ नहीं मालुम|, चेहरे पर गीलेपन का अहसास जब काफी हुआ तो मैं जैसे नींद से जागा| मुझे घेरे हुए मेरे सभी सहपाठी और टीचर खड़े थे| मेरे आँख खोलते ही मेरे सर ने कहा –
“ थैंक गॉड ! तुम्हे होश आ गया|”
“ तो क्या मैं बेहोश था ?”
“ हाँ , तुन जंगल में जाने कहाँ भटक गए थे| जब सभी लौट आये और तुम नहीं आये तो हम सभी मिलकर तुम्हें ढूँढने निकले| काफीदूर जाने के बाद हमने एक जीप आती दिखाई दी जिसमें एक आर्मी मैन तुम्हे पीछे की सीट पर सुलाए हुए हमारे कैम्प को ढूंढते हुए आ रहे थे| उनहोंने हम सबको भी अपनी जीप पर बिठाया और कैम्प तक्ल छोड़ा|
हमने उन्हें काफी रोकने की कोशिश की लेकिन वे यह कहते हुए चले गए अभी नहीं रुक सकता एक जरुरी काम है|” जब हमने तुम्हारे बेहोश जाने और उन तक तुम्हारे पहुँचने के बारे में पूछा तो बोले – “ सोमेश ही बताएगा और जो भी बताएगा वह सब अक्षरश: सच होगा|
सबकी उत्सुक निगाहें अपनी ओर लगी देख मैं ने धीमे स्वर में पूछा -- + क्या उनका नाम कैप्टन विनोद था ?” सर ने “ हाँ “ में सर हिलाया| मैं ने सबको उधर चलने को कहा जिधर से सबने जीप आती देखी थी| पहले तो सर तैयार नहीं हुए लेकिन मेरे बहुत कहने पर वे राजी हो गए|
सुबह होते ही हम उधर की ओर गए| मैं उस जगह पर पहुँच कर गहरे आश्चर्य में डूब गया| वहां एक अधजला खंडहर था : जिसके एक टूटे पत्थर पर लिखा था “ आर्मी हॉस्पिटल “|,
उलझे बालों वाली लड़की
शाम के ५ बज रहे थे उसी वक़्त मेरा मोबाइल बज उठा सामने विक्रम था हमेशा की तरह वो प्यार से बोला जानेमन क्या कर रही हो? मैंने कहा कुछ नहीं बस अब ऑफिस से निकल कर PG जाउंगी, तुम क्या आ रहे हो?
और सामने से जो सुना उस पर विश्वास नहीं हुआ विक्रम बोला जान पैकिंग कर लो हम घूमने जा रहे है आज फ्राइडे है मंडे भी ऑफ है और ट्यूसडे की मैं छुट्टी ले लूंगा तुम बस पैकिंग करो और रास्ते के लिए कुछ खाना पैक करवा लेना मैं जल्दी पहुचता हु।विक्रम भी ना, सरप्राइज कर देता है कभी कभी, पिछले एक महीने से इसी बात पर हमारी बहस चल रही थी,
मैं उसे कह रही थी लॉन्ग वीकेंड आ रहा है प्लान बनाओ ,पर उसने अपने घर जाने की रट लगा रखी थी ! हम दोनों ही गुडगाँव मैं जॉब करते थे अलग अलग PG मैं रहते थे हफ्ते मैं ३-४ बार मिल लेते थे पर वीकेंड पर विक्रम का घर जाना जरुरी ही था उसके पेरेंट्स उसका रास्ता देखते थे।
मेरा अपना कहने को कोई नहीं था इस दुनिया मैं चाचा ने बचपन मैं पाल दिया पड़ा लिखा भी दिया अब जब वो नहीं रहे तो मैं उनकी फॅमिली मैं एक अवांछिनिए सदस्य हो गई इसलिए पिछले २ साल से PG मैं रहने आ गई थी यही विक्रम से मुलाकात हुई और कब मुलाकाते प्यार मैं बदल गई पता ही नहीं चला हम दोनों उम्र के ३० बसंत देख चुके थे अब हमाप्यार मैं लड़कपन नहीं था एक गंभीरता थी पर हम दोनों एक साथ लिव- इन मैं रहने की हिम्मत ना जुटा पाए !
खेर यह तो हुआ परिचय अब अपनी कहानी पर आती हु उस दिन जैसे मेरे पैरो को पंख लग गए थे, मैं बहुत खुश थी विक्रम के साथ इतने दिन बिताने की कल्पना से ही मैं सिहर उठी थी मैं जल्दी से सब जरुरी चीज़े पैक की, अपने वाकिंग शूज़ कसे और रेडी थी तभी फ़ोन पर मिस्ड कॉल यानि विक्रम आ गया मैंने जल्दी ही सामान गाड़ी मे रखा, और बैठते ही विक्रम को चुम लिया वो भी बहुत खुश हो गया उसने कहा रुबिन be ready हम एन्जॉय करेगे!,
हम पूरी रात ड्राइव करते रहे और जब सुबह की पहली किरण उदित हुई तो हम उत्तराखंड के एक छोटे से हिल स्टेशन पर पहुच चुके थे वहां हमने थोड़ा घूम घाम कर देखा, हमे रहने के लिए नदी किनारे एक शांत सी कॉटेज मिल गई रूम बहुत बढ़िया था बड़ी बड़ी खिड़किया और सामने खूबसूरत नदी विक्रम जानता था मुझे क्या पसंद है. ,
हमने जल्दी से फ्रेश हो कर पहले अपनी नींद पूरी करने का प्लान बनाया पर बिस्तर पर आते ही वो रोमांटिक मूड मे आ गया और फिर जो नींद आई. मेरी आँख ३ बजे के लगभग खुली विक्रम अभी भी सो रहा था मैंने उठ कर कपडे पहने और खाने के लिए कुछ ढूढ़ने लगी तभी मुझे लगा जैसे कोई गुनगुना रहा हो
मैंने दरवाजा खोला तो लॉबी के आखरी हिस्से मे बड़ी सी खिड़की पर एक लड़की अपना सर टिकाये खोई हुई सी गुनगुना रही थी उसकी पीठ मेरी और थी और उसके बाल घुंगराले बिखरे हुई स्याह काले, मुझे लगा यहाँ कोई और भी है, चलो अच्छा है साथ मैं कोई अपनी उम्र का है ट्रैकिंग मे मजा आएगा तभी विक्रम ने मुझे आवाज दी. जान कहा गई, और तभी उस लड़की ने मुड कर मुझे देखा वो बहुत ज्यादा गोरी थी मुझे देख वो मुस्कुरा दी मैंने भी मुस्कुरा कर उसका प्रतियुत्तर दिया!
हम तैयार हो कर लगभग ४ बजे के करीब कसबे की और निकले मैं और विक्रम दोनों भूख से परेशान थे आगे कुछ दुरी पर एक छोटा सा ढाबा दिखा. वहा हमने चाय और आलू के पराठे खाये. ढाबे का मालिक एक बूढ़ा सा आदमी था, वो कहने लगा आप लोग कहा रुके हो हम लंचबॉक्स भी भेज सकते है. जब हमने बतया हम कहा रुके है तो उस बुढे और ढाबे पर २-३ लोगो की आँखे फ़ैल गई कोई कुछ बोला तो नहीं पर कानाफूसी होने लगी थी,
मुझे थोड़ा अजीब लगा पर हम उस वक़्त वहां से निकल कर नीचे बाजार की तरफ घूमने निकल गए. आते वक़्त रात का खाना पैक करवा हम कोई ७ बजे के लगभग कॉटेज पहुचे ! मैन गेट पर शिब्बू मिल गया, वो काटेज का केयरटेकर था. उसने बतया यहाँ सिर्फ ब्रेकफास्ट और चाय -काफी ही मिल सकती है, पर पीछे की तरफ किचन है जहा आप खुद खाना बना सकते है! विक्रम उससे आस पास घूमने की जगह पूछने लगा और मैं रूम की तरफ बढ चली लॉबी पर पहुचते मुझे ठंडी हवा का एहसास हुआ
मैं चाभी अभी कीहोल मैं लगा ही रही थी मुझे साथ के कमरे से धीमे संगीत की आवाज आई बहुत ही मधुर पर उदास सा मुझे अचानक वो लड़की याद आ गई पीछे पीछे विक्रम था वो कहने लगा अंदर चलो यहाँ क्यों खड़ी हो एक राउंड और हो जाये उसकी आँखों मैं शरारत थी मैं बस उसकी आँखों मैं खो गई मैं उससे दीवानो की तरह प्यार करती थी मेरे लिए सिर्फ वो ही तो था उसका प्यार जिस शर्त पर मिले मुझे मंजूर था !
उस रात मैं बहुत सुकून से थी विक्रम की बाहो मे, बाहर किस पहर बारिश शुरू हो गई थी पता ही ना चला. मुझे प्यास लगी थी फ़ोन उठा कर देखा तो रात के २ बज रहे थेबारिश की रिमझिम और रात का सन्नाटा अलग ही दुनिया लग रही थी, मैंने विक्रम को देखा वो किसी छोटे बच्चे की तरह सो रहा था मैंने उठ कर खिड़की खोली और बारिश की बूंदो को अपने चेहरे पर महसूस करने लगी,
तभी साथ वाले रूम से किसी के रोने की आवाजे आने लगी कोई आदमी जोर जोर से बोल रहा था और कोई लड़की रो रही थी उनकी आवाजे स्पष्ट नहीं थी जैसे दबी दबी सी थी खिड़की बंद करने की आवाज से विक्रम भी उठ बैठा कहने लगा रुबिन तुम रात को खिड़की क्यों खोल रही हो यह कॉटेज नदी के पास है जंगली जानवर भी आ सकते है !
मैंने तब दिन मैं मिलने वाली वो बिखरे बालो वाली लड़की का जिक्र किया मेरा ख्याल था वो कोई विदेशी है, विक्रम बोला उन्हें छोड़ो, कल तुम्हे एक वाटर फॉल पर ले जाऊंगा अभी इधर आओ और मुझसे लिपट जाओ ! सुबह बड़ा फ्रेश मूड था हम जल्दी से नाश्ता करके वॉटरफॉल की तरफ निकल पड़े जाते जाते शिब्बू ने कहा आप वाटर फॉल नीचे से ही देखिएगा ऊपर चोटि पर मत जाएगा उस चोटि से फिसल कर बहुत लोग जान गवा चुके है!,
लगभग ३ किलो मीटर की ट्रैकिंग करके हम उस वाटर फॉल तक पहुचे वहा काफी चहल पहल थी, पर्यटको के साथ साथ लोकल लोग भी थे .संडे जो था वाकई बहुत खूबसूरत जगह थी हम भी वहां फोटो लेने लगे., वहा पर एक छोटा सा लड़का लगभग जला हुआ पतिला, मैग्गी और कुछ कोल्डड्रिंक की बोतले लिए बैठा था विक्रम ने उसे कहा मैग्गी के साथ साथ चाय पिला सकते हो उसने हां मे सर हिलाया.
विक्रम उससे बाते करने मैं व्यस्त हो गया, मैं कैमरा ले थोड़ा और ऊपर को चढ़ने लगी एक पतली सी उबड़ खाबड़ पगडंडी सी थी जो वाटर फॉल के साथ साथ चल रही थी मुझे लगा जहा विक्रम बैठा है उसके शॉट ऊपर से जा कर लिया जाये वाटर फॉल की बढ़िया पिक्चर आएगी अभी थोड़ा आगे ही बड़ी थी की अचानक वो उलझे बालो वाली लड़की मुझे अपने आगे दिखाई दी वो बहुत तेजी से आगे बढ रही थी मैं लगभग भागते हुए उसके पास पहुची मैंने हाथ आगे बढ़ाया ही था को वो पलटी मैं सकपका गई मैंने कहा हेल्लो वो मुस्कुरा दी मैंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा are you alone here उसने ना मैं सिर हिलाया उसका चेहरा गोल और बहुत गोरा था, पर आँखे एकदम काली उसके बालो की तरह वो बेहद खूबसूरत थी. मैंने उससे पूछा where are *** **** इस बार वो धीमी आवाज मे बोली मैं भी भारतीय ही हु मैंने कहा ओह्ह्ह मुझे लगा आप विदेशी हो,
वो हलके से हँस दी तभी मुझे ढूंढता हुआ विक्रम आ गया मैंने परिचय करवाया मैं रुबिन और मेरे हस्बैंड विक्रम मैं झूट बोल गई उसने अपना नाम सारा बताया ! विक्रम ने चाय पीने का ऑफर दिया पर उसने मना कर दिया वो चोटि की और बढ़ चली जाते जाते विक्रम ने उसे be carefull कहा वो पलटी और मुस्कराते हुए हाथ हिला दिया हम लगभग २ घंटे वही बैठे रहे पर सारा वापिस नीचे की ओर नहीं आई मैंने कहा चलो बाजार घूम आते है पर विक्रम का मूड कुछ और था हम वापिस कॉटेज पहुचे वापसी के सारे रास्ते विक्रम शरारत करते हुए आया था कभी गले लगा लेता कभी चुम लेता कभी गोदी मैं उठा लेता मुझे लग रहा था काश यह वक़्त यही रुक जाये हम हमेशा यही रह जाए !,
जब मेरी नींद खुली विक्रम बिस्तर पर नहीं था मैं कपडे पहनते हुए उसे आवाज देने लगी पर कोई जवाब नहीं आया विक्रम कही भी नहीं था तभी बाहर लॉबी मैं कुछ आवाज आई मैंने दरवाजा खोला तो विक्रम बाहर उस खिड़की के पास खड़ा था जहा मैंने सारा को पहली बार देखा था उसी तरह सर टिकाये हुए बाहर देखते हुए. जनाब कहा खो गए ? विक्रम पलटा, और बोला मुझे कोई उदास सी धुन सुनाई दी उसका पीछा करते करते यहाँ आ गया ! साथ वाले दरवाजा हल्का सा खुला हुआ था, मुझे जिज्ञासा हुई, सारा वापिस आई के नहीं ? मैंने देखा तो रूम बिलकुल खाली था पलंग पर एक भी सिलवट नहीं परदे लगे हुए मुझे लगा सारा शायद चली गई!हमने decide किया आज डिनर खुद ही बनाएगे! विक्रम ने शिब्बू से चिकन और वोडका ले आने को कहा, हमने कॉटेज के आगण मे आग जलाई साइड मे ही चूल्हा मंगा लिया, वोडका देख शिब्बू भी हमारे साथ बैठ गया मैं चिकन पकाने लगी रात बढ़ती जा रही थी शिब्बू दो पेग लगाने के बाद सेंटी हो गया था कहने लगा,
बाबु जी हमे भी दिल्ली ले चलो अपने पास रख लेना सेवा कर देगे. विक्रम उसे समझने लगा अरे तुम तो जन्नत मे रहते हो, यहाँ काम भी कम है आराम से रहो. आज तो कॉटेज मे हम अकेले ही गेस्ट है. शिब्बू ने कहा साहब पिछले कुछ महीनो से आप ही अकेले गेस्ट हो. मैं और विक्रम एक दूसरे की शक्ल देखने लगे, हमने कहा अच्छा एक कपल और भी था हमारे साथ वाले रूम मे आदमी को तो देखा नहीं, पर लड़की से मैं कॉटेज और फिर वाटर फॉल पर भी मिली, क्यों झूठ बोलते हो?
शिब्बू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया वो कुछ नहीं बोला, विक्रम ने कहा क्या हुआ- शिब्बू अपना गला साफ़ करते हुए बोला, साहब मैं अपनी माँ की कसम खाता हु आप यहाँ अकेले ही गेस्ट हो आप आ गए नहीं तो मैं खुद अपने गांव जाना वाला था. मैंने कहा फिर वो लड़की कौन थी ? कहा से आई ? -- शिब्बू ने बतया इस कॉटेज के बारे मे बहुत कहानिया फ़ैली हुई है, यह बहुत पहले अंग्रेजो के ज़माने मे किसी साहब बहादुर का घर था , और यहाँ कुछ मौते हुई थी तब से आस पास के लोग यहाँ आवाजे सुनने लगे, कभी कोई उदास सी धुन कभी लड़की के गाने की कभी रोने की, मेरा यह सुनकर खून जम गया था, पर शिब्बू हमें सांत्वना देते हुए बोला साहब मैंने तो आजतक ऐसा कुछ देखा ना सुना मैं तो रोज़ यही रहता हु कभी कुछ नहीं देखा!
डिनर जैसे तैसे निपटा के हम दोनों रूम मे आ गए, विक्रम मुझे ढाढस बंधाते हुए बोला चरसी है कहा इस की बातो मैं आ रही हो, पर अंदर से वो भी डरा हुआ लग रहा था वोडका उतर चुकी थी और नींद भाग गई थी, मैं और विक्रम इधर उधर की बाते करते हुए टाइम बिता रहे थे रात के १० बज गए थे, बारिश शुरू हो गई, उसने माहौल को और बोझील बना दिया था
बाते करते करते हम कब सो गए पता ही नहीं लगा! रात के किसी वक़्त मुझे लगा जैसे मेरे ऊपर कोई झुका हुआ है मैंने आँखे खोली तो सारा थी !सारा कंधो से पकड़ कर मुझे उठा रही थी मेरा नाम बार बार पुकार रही थी, उसकी आवाज किसी कुँए से आती हुई लग रही थी मैं हड़बड़ा कर उठी सारा मेरा हाथ पकड़ कर मुझे खिंचती हुई अपने साथ ले जाने लगी डर के मारे मेरे गले से आवाज तक नहीं निकल रही थी मैंने पीछे मुड़ कर देखा विक्रम बिस्तर पर ही था !
सारा मुझें साथ वाले कमरे मे ले गई, उस कमरे की शक्ल ही बदली हुई थी, हॉल के कोने मे बड़ी सी चेयर पर एक अंग्रेज रोबीला सा आदमी बैठा हुआ वायलिन बजा रहा था उदास धुन, उसकी आँखे बंद थी सारा उसके पैरो के पास जा कर बैठ गई वो रोने लगी . सारा ने उसका हाथ अपने हाथ मे लिया और कहने लगी प्लीज अल्बर्ट डोंट गो डोंट लीव मी , पर उस आदमी पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, सारा का चेहरा लाल हो गया था,
अचानक वो आदमी खड़ा हुआ, और मेरी ओर बढने लगा मैं जड़ थी जैसे मेरे आँखों के सामने कोई पिक्चर चल रही थी, तभी सारा के हाथ मे, ना जाने कहा से बन्दुक आ गई थी सारा फिर बोली अल्बर्ट स्टॉप. पर वो आदमी आगे बढ़ता ही जा रहा था. और फिर एक धमाका और ढेर सा धुँआ, और तब पहली बार मेरे गले से चीख निकली विक्रम और शिब्बू भागते हुए मेरे पास आये,
मैं उस कमरे मैं जड़ खड़ी हुई थी और लगातार चीखे जा रही थी वहां कुछ भी नहीं था, विक्रम मुझे उठा कर अपने कमरे मे लाया, मुझे पानी पिलाया, मैं पसीने मैं भीगी हुई थी, वो बार बार मुझसे पूछ रहा था क्या हुआ? क्या हुआ? पर मैं कुछ बता नहीं पा रही थी, फिर कब मैं बेहोश हो गई पता नहीं लगा !
जब मेरी आँख खुली सवेरा हो गया था विक्रम परेशान सा मेरे सिरहाने बैठा हुआ था रूम के दूसरे कोने मैं शिब्बू दिवार से सर लगा कर ऊंघ रहा था, मैंने उठने की कोशिश की तो विक्रम ने मेरी मदद की ऐसा लग रहा था जैसे मैं सदियो से बीमार हु बहुत कमज़ोरी लग रही थी. शिब्बू को विक्रम ने काफ़ी बना कर लाने को कहा, फिर मुझे बाहों मे भरते हुए कहा क्या हुआ था ? रुबिन तुम रात को वहां क्यों चली गई थी ?
मैंने सारी बात बता दी विक्रमसुन कर सन्न रह गया, उसने जैसे तैसे पैकिंग की मुझे सहारा दे कर तैयार करवाया और हम निकल पड़े कॉटेज से जैसे जैसे दूर जा रहे थे मेरे शरीर मे जैसे जान आती जा रही थी हम बाजार मे पहुच गए, विक्रम ने उस छोटे से ढाबे पर गाड़ी रोक दी वो बुड्डा चाय बना लाया विक्रम और मेरी सफ़ेद शक्ल देख कर वो बोला साहब हम तो पहले ही दिन आपको बताने वाले थे पर शहर के लोग ऐसे बातो को कहा मानते हो,
फिर जो उसने कहानी सुनाई
वो इस प्रकार थी-
यह बात उस ज़माने की है, जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने वाले थे यह कॉटेज अंग्रेज अफसर अल्बर्ट केथ की थी उसकी फॅमिली इंग्लैंड में थी वो लगभग ४० साल का हट्टा कट्टा आदमी था, कुछ साल पहले वो बंगाल से एक एंग्लोइण्डियन लड़की सारा को अपने साथ ले आया था,
वो बेचारी उससे बहुत प्यार करती थी पर जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने लगे तो अल्बर्ट सारा को छोड कर जाने लगा उसे वो साथ कैसे ले जाता इंग्लैंड मैं उसकी बीवी और ४ बच्चे थे ! सारा सारी जिन्दगी जिसे प्यार समझ रही थी वो तो बस मन बहलाव था,
उसने बहुत कोशिश की अल्बर्ट ना जाये पर वो ना माना और फिर सारा ने उसे गोली मार दी और खुद वॉटरफॉल से छलाँग मार कर आत्महत्या कर ली। तब से ही उनकी आत्मा भटक रही है ! मैं सारे रास्ते यही सोचती हुई आई की, क्यों सारा ने मुझे चुना क्या वो कुछ बताना चाहती थी, मुझे इशारा करना चाहती थी ?
जब गुडगाँव करीब आने लगा तो मैंने विक्रम को कहा क्या तुम भी मुझे छोड़ तो नहीं जाओगे हमारे रिश्ते का भी तो कोई नाम नहीं विक्रम मेरी और हैरानी से देखने लगा वो कुछ नहीं बोला जिंदगी वापिस आ कर फिर बिजी हो गई एक शाम मेरा फ़ोन बजा - हेल्लो जानेमन रेडी हो जाओ मम्मी पापा आ रहे है उलझे बालो वाली लड़की ने मेरी जिंदगी सुलझा दी थी