उसकी कहानी जिसकी थी दीवानी 🤍✍️
एक लड़की थी, जिसे San..(मेरे द्वारा नामकरण)नाम से बुलाते थे। वह पढ़ाई में अव्वल तो नहीं थी,किन्तु ठीक ठाक तो जरूर थी। समय बीतता गया और वह अब कॉम्पिटिशन क्लास भी जाने लगी; जहॉं जेनरल कॉम्पिटिशन की तैयारियां करायी जाती थी।वह पहली बार किसी क्लासेस को ज्वाइन की थी,वो भी बी.ए. फाइनल
करने के बाद।
सब ठीक से चल रहा था; वहाॅं की पढ़ाई,सर मैम और कुछ बैचमेट्स को छोड़कर अन्य सभी बैचमेट्स भी अच्छे थे और कुछ ही महीनों के बाद वहीं पर वह एक लड़का मित्र से प्रभावित हो गयी। वह कहती थी कि ना जाने मुझे वह क्यों अच्छा लगने लगा है, उसका बोलना और उसकी बातें सुनना मुझे बहुत ही अच्छा लगता है।
वह उस लड़का मित्र से ज्यादा परिचित तो नहीं थी लेकिन वह उसके दोस्त को जानती थी जो San से सिनियर था और +2 से ही था। इसलिए उस सिनियर से कभी-कभी बातें हो जाती थी । किन्तु सिनियर को भी नहीं पता कि वह उसके दोस्त को पसंद करती हैं और न ही वह लड़का मित्र को ही पता।
वह लड़का मित्र उसके जाति से नहीं था, फिर भी उसे वह बहुत ही अच्छा लगता है।(वह सोचती है कि क्या कभी मैं उससे बात कर पाऊॅंगी भी, पता नहीं मुझे! क्योंकि मुझे तो किसी से बोलना ज्यादा पसंद नहीं है)
वह उसका पूरा नाम तो नहीं जानती लेकिन सब कोई समा.(मेरे द्वारा किया गया शॉट नेम)नाम से पुकारते हैं,वह कहती हैं शायद वही होगा।
यहाॅं से वह उससे और भी प्रभावित होती है और आगे कहती है:-
आज के क्लास में मैम रिंजनिग बता रही हैं । मैं मैम के प्रश्नों उत्तर दी और वह भी अन्सर दिया लेकिन उसका ग़लत हो गया, तो वह खुद ही बोलता है कोई बात नहीं हम दूसरा वाला तो सही बनाएंगे। उसकी ऐसी बातें सुन कर मन में हॅंसकर रह गई। मैम भी हॅंस रही थी और वह भी हॅंस रहा था। पढ़ने में वह मेरा अनुभव है कि वह अपने दोस्त से अच्छा है क्योंकि अक्सर बराबर सही उत्तर ही देता है।
वह कहती हैं :-
वह दिन 10/08/15 आज मैं उससे बात की, थोड़ा सा। दो फॉर्म उस समय निकाल था,उसी में एक का 500 रूपए लग रहे थे।
'तो वह बोलता है,आप फॉर्म डालेंगे कि नहीं!'
'तो मैं हॅंस कर बोली नहीं, मैं तो नहीं डालूंगी,आप डाल दीजिए ;आपके पास तो बहुत रूपए हैं। वह भी दो-दो दुकान के तो वह हॅंसने लगा।'
इस तरह समय बीतता गया और हमारी पढ़ाई वहां जारी रही। और बिना किसी को कुछ बोले मैं भी पढ़ाई और उसको बस देख कर, उसकी बातों को सुनकर खुशी रहती थी।
कुछ महीनों बाद कई दिनों से वहां पिकनिक की तैयारियां हो रही है। जो कि 02/01/ 16 को ले जाया जाएगा। और इसी बीच मेरी स्पेशल विषय की लिखित परीक्षा भी है,जिस कारण मैं 30/12/15 को पिकनिक में सम्मिलित होने के लिए सर को रूपया दी, तभी वह भी अपने दोस्तों के साथ सर के पास ही था। किन्तु मुझे उस परीक्षा में जाना था इसलिए ज्यादा देर नहीं रूकी।
एक जनवरी को क्लासेस बंद थी, इसलिए हम सभी 02 जनवरी को पिकनिक जाने के लिए एकत्रित हुए।
(कितना कठिन होता है,वह पल अपनी ऑंखों से देखना कि आप जिसे पसंद करते हैं, वह औरों के साथ मस्ती करने में व्यस्त हो,
फिर खुद को ही समझा लेती और उसकी खुशी को देख कर ही खुश हो जाती क्योंकि उसको तो पता ही नहीं कि मैं उसे पसंद भी करती है। )
हम सभी पिकनिक पर त्रिकुटी, तपोवन और फिर नंदन पार्क गए। सब कुछ सामान्य - सा था,कभी- कभी वह मेरे से भी बात यानी उस तरह से वह सब से बात कर रहा था। सभी बहुत मस्ती किये लेकिन वह और उसका दो दोस्त बहुत से भी बहुत ज्यादा उस पिकनिक का लुत्फ उठाया। शाम -शाम के करीब पार्क में मेरा सैंडल ही उखड़ गया; जिस वज़ह से मैं आकर गाड़ी में बैठ गई और वे सब घुम ही रहे थे।
मैं गाड़ी में बैठ उसी का ख्याल करने लगी और सोचने लगी :-
क्या उसे मेरे बारे में कुछ भी पता हुआ होगा कि मैं उसे पसंद करती हूॅं,उसको आदर्श मानती हूॅं। आगे पता नहीं क्या होगा लेकिन मैं हमेशा उसकी आवाज़ सुनना पसंद करती हूॅं।
2.
अब तो ये मेरे लिए दिनचर्या में शामिल हो गया। कुछ परेशानियाॅं भी हुई। एक लड़के ने परेशान भी किया। क्योंकि वह थोड़ा मज़ाक़िया था और वह कहीं भी किसी जगह बोल पड़ता था,जिस कारण बगल वाले दुकानदार मुझे बोलने लगा;यह लड़का तो बहुत आवारा है जबकि ऐसा शायद नहीं था लेकिन मैं क्या कहती इसलिए फिर ऐसा वह किसी के साथ न करें इसलिए मैं,सर से कह कर थोड़ी -सी डांट भी दिलवाई।
शायद कुछ दिनों तक तो वह मुझसे नाराज़ रहा, लेकिन एक दिन वह खुद ही बोलता है कि दीदी आप तो हमको सुधार दिये, सॉरी जो आपको मैं परेशान किया।
मैं उसको बस इतना ही बोली कि मैं डांट सुनवाई उसके लिए मुझे भी माफ़ कर देना और हम दोनों बहुत खुश हुए (यह संसार में सभी कुछ आदमी ने अपने ढंग से व्यवस्थित किया है और जिस पर उसका बस नहीं चल वह है आत्मिक जुड़ाव इसलिए इंसानियत की सबसे बड़ी पहचान होती है कि आपके वज़ह से किसी को आत्मिक शांति की अनुभूति हो।)
वह कहने लगा,
"आप मेरे लिए राखी लाइएगा, ठीक है।"
"ठीक है!"
वह , मैं और सभी हॅंसने लगें।
(सुखद पल था, शायद सभी के लिए।)
(हर सुखद पल को न जाने क्यों यह काल क्षीण स्वरूप दे देता है और वह श्रापित पल में बदल देता है।)
आज कोचिंग क्लास में सभी उसी को याद करके दुखी और भावुक थे क्योंकि वह हम सब को हमेशा के लिए छोड़कर इस जगत से बहुत दूर चला गया ।
उस दिन मैं घर पर आकर खूब रोई और उससे माफी मांगते हुए उसकी शांति की प्रार्थना करते हुए एक निश्चय भी की कि सब को शालीनतापूर्वक समझने और समझाने का प्रयास करूंगी और ना किसी से नाराज़ रहूंगी,न किसी को नाराज़ करने का कोशिश करूंगी।
(कभी-कभी कुछ घटनाएं हृदय पर ऐसे अंकित हो जाते हैं, जिसे शायद ही कोई भूल सकता है और यह भी उन्हीं में से एक है।)
3.
वह लड़की डायरी लिखते हुए कहती हैं
"इस साल भर में कुछ दुख के पल थे तो कुछ ख़ुशी के पल भी रहे।"
"और हम सभी उस पल के साक्षी भी रहे।"
पिछले बार की तरह इस बार भी हम सभी पिकनिक मनाने जा रहे हैं और वह भी दुमका (डैम)।इस बार हमलोग कुछ ही लड़कियां और ज्यादा लड़के सब है।
"मैं पूछ ली उससे कि क्या तुम जाओगी"( लेखिका)
तो वह खुश होकर कहती है
"जी प्यारी बहना! मैं अवश्य जाऊंगी। और तूं भी चल।"
अगले दिन फिर पिछले दिनांक में हम सभी पिकनिक के लिए क्लासेस में करीब 5बजे सुबह पहुंचे।
सर दो गाड़ियां रिजर्व किए, जिसमें एक पर सर और सभी लड़की और दो लड़के भी बैठे। और एक पर मैम और मैम की दोस्त और बचे सभी लड़के बैठे।
( मैं (लेखिका)सोच रही थी कि क्या अजीब बात है कि वह लड़की की खुश न होकर उदास थी जबकि वह लड़का मित्र भी हम सबों के साथ ही है।)
मुझसे नहीं रहा गया और मैं उससे पूछ ली कि :-
" क्या हुआ तुम्हें?"
तो उसका जबाब सुनकर मैं दंग भी थी और हॅंस भी रही थी
वह कहती है :-
"तुमको नहीं लगता यह भी अपने दोस्त के तरह ही व्यवहार कर रहा है!"
मैं बोली -
"हां! स्वाभाविक है, दोस्त तो उसी का है ना फिर।" तुमने तो अभी तक उससे बोला ही नहीं है, तो वह तुमसे कैसे बात करेंगे।
वह कहती हैं -
"हां, यह भी सही बोली तूं!"और हम दोनों हल्की शांत हवा की तरह मुस्कुरा उठे।
और मैं खिड़की की तरफ़ देखते हुए इस मिलन को मन की नोट्स पर शब्दों में पिरोने लगी। मुस्कुरा उठी।