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मदमस्त टपोरी सिमरन भाई

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कमरे के भीतर का माहौल अब पूरी तरह से उत्तेजना और तीव्र गति से भर चुका था। चॉल मालिक पूरी तरह से नियंत्रण खो चुका था। उसने सिमरन के उभरे हुए ****ों पर अपनी पकड़ और भी मजबूत कर ली और उन्हें बेदर्दी से मसलते हुए, अपनी पूरी ताकत के साथ सिमरन की **** में ज़ोर-ज़ोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए।हर एक धक्का गहरा, सीधा और तीव्र था, जो सिमरन के शरीर के सबसे संवेदनशील हिस्से को झकझोर रहा था। इस तीखे और लगातार होते प्रहारों ने सिमरन के भीतर दबी सारी कशिश को बाहर ला दिया। अब तक खुद को संभालने की कोशिश कर रही चॉल की 'सिमरन भाई' इस चरम सुख के वेग के आगे पूरी तरह बेबस हो गई।उसके मुँह से अब टपोरी अंदाज़ के बजाय एक गहरी, मदहोश कर देने वाली आह निकल पड़ी। कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई सिमरन की वो सिसकारियां और आहें गूंजने लगीं, जो इस बात की गवाही दे रही थीं कि वह दर्द और बेइंतहा मजे के इस अनोखे संगम को कितनी गहराई से महसूस कर रही थी। चॉल मालिक की रफ्तार के साथ उसकी सांसें और आहें भी तेज़ होती जा रही थीं, और वह इस तूफानी पल के हर एक झटके को पूरी तरह से एंजॉय कर रही थी।चॉल मालिक के उस आखिरी और बेहद ज़ोरदार धक्के के साथ ही सिमरन के शरीर का वह अंतिम अवरोध भी टूट गया। उसकी कौमार्य की सील के खंडित होते ही कमरे के भीतर एक तीखा सन्नाटा और फिर सिमरन के मुँह से निकली एक तीखी, अनियंत्रित आह गूंज उठी। यह दर्द और चरम सुख का एक ऐसा अनोखा मिला-जुला अहसास था, जिसने उसके पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया।उसकी आँखों के कोने से दर्द की एक नन्हीं बूंद छलक आई, लेकिन उसके होठों पर अब भी वही बेबाक और संतुष्ट मुस्कान कायम थी। अठारह साल की उम्र के इस पहले ही दिन, अपनी पूरी और असल स्त्रीत्व से रूबरू होने का यह अहसास उसके लिए मुकम्मल था। चॉल मालिक ने सिमरन के ****ों पर अपनी पकड़ ढीली नहीं की, बल्कि उसकी इस आह को सुनकर उसके धक्कों की रफ्तार को और बढ़ा दिया। सिमरन अपनी आँखें बंद किए, अपनी इस नई शुरुआत और इस मुकम्मल बदलाव के हर एक कतरे को अपने भीतर महसूस कर रही थी।कमरे के भीतर की उत्तेजना अब अपने अंतिम और सबसे तीव्र पड़ाव पर पहुँच चुकी थी। चॉल मालिक पूरी ताकत से सिमरन के सुडौल ****ों को अपनी हथेलियों में भींचे हुए था और उसकी **** में लगातार गहरे और ज़ोरदार धक्के लगा रहा था। दोनों की सांसें चरम सीमा पर थीं और पूरा कमरा इस तीखी हलचल से गर्माया हुआ था।तभी, अपनी चरम उत्तेजना के आखिरी बिंदु को छूते ही चॉल मालिक का पूरा बदन कांप उठा। उसने एक बेहद गहरा और अंतिम धक्का लगाया और सिमरन के शरीर के सबसे भीतर, उसकी कोख की गहराई में अपनी पूरी ऊर्जा और गर्म बीज को एक साथ मुक्त कर दिया। वह गाढ़ा प्रवाह सिमरन के भीतर गहराई तक समाता चला गया।इस अंतिम और मुकम्मल जुड़ाव के अहसास से सिमरन का पूरा **** सिहर उठा। अठारहवें जन्मदिन के इस खास मौके पर, चॉल मालिक के इस संपूर्ण समर्पण और अपनी कोख में इस नए अहसास को महसूस करके सिमरन को एक गहरी आत्मसंतुष्टि मिली। दोनों हांफते हुए एक-दूसरे से सटे रहे, और सिमरन इस बेहद निजी और शक्तिशाली पल के असर में पूरी तरह डूबकर खुश हो रही थी।इस अंतिम पड़ाव पर आकर दोनों के मन की इच्छाएं और उनका आंतरिक अहंकार अपने-अपने तरीके से पूरी तरह संतुष्ट हो चुके थे। बंद कमरे के भीतर की हवा में अब दोनों की हांफने की आवाज़ें और एक गहरी खामोशी तैर रही थी।सिमरन अपनी थकी हुई और गर्म सांसों को काबू में करने की कोशिश कर रही थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेबाक और गहरी आत्मसंतुष्टि की मुस्कान थी। वह अंदर ही अंदर इस बात से बेहद खुश थी कि चॉल मालिक ने अपनी पूरी ताकत और अपना सारा बीज उसकी कोख की गहराई में उतार दिया था। अठारहवें साल के इस पहले दिन, इस मुकम्मल शारीरिक जुड़ाव और अपने भीतर समाए इस गर्म अहसास ने उसे अपनी नई जवानी और स्त्रीत्व के एक नए नशे से भर दिया था।दूसरी तरफ, चॉल मालिक सिमरन के पीछे से थोड़ा अलग हुआ, तो उसके चेहरे पर एक शातिर, घमंडी और गहरी संतुष्टि की मुस्कान तैर रही थी। वह मन ही मन अपनी इस जीत पर बेहद खुश और मगरूर हो रहा था। उसे इस बात का गहरा गुरूर था कि जिस 'सिमरन भाई' के नाम से पूरी चॉल थर-थर कांपती थी, जो खुद को लड़कों की तरह कड़क और बेखौफ समझती थी, आज उसने उसके उस सख्त मुखौटे को मरोड़ कर रख दिया था। चॉल मालिक के दिमाग में यही सोच चल रही थी कि आखिरकार उसने सिमरन भाई को भी चॉल की बाकी कमज़ोर और आम लड़कियों की तरह अपने नीचे झुकाकर एक औरत बना ही दिया था।दोनों एक ही बिस्तर के पास खड़े अपनी सांसें दुरुस्त कर रहे थे—एक अपनी जवानी के इस नए अहसास और समर्पण से खुश थी, तो दूसरा अपने पुरुष प्रधान अहंकार की इस बड़ी जीत पर मन ही मन जश्न मना रहा था।कमरे के भीतर की भारी और गर्म हवा अब धीरे-धीरे शांत हो रही थी। चॉल मालिक ने एक गहरी सांस ली और सिमरन की ढलती काया को आखिरी बार घमंड भरी नज़रों से देखा। उसके चेहरे पर अपनी इस बड़ी जीत का सुरूर साफ चमक रहा था। उसने ज़मीन पर बिखरे अपने कपड़े उठाए, उन्हें झाड़ा और बिना एक शब्द बोले, अपने बदन पर वापस डाल लिए। अपनी बेल्ट को कसते हुए उसने एक शातिर मुस्कान के साथ सिमरन की तरफ देखा, जो अभी भी बिस्तर के सहारे टिकी हुई थी, और फिर कमरे का दरवाज़ा खोलकर बाहर की संकरी गलियों में गायब हो गया। उसके जाते ही दरवाज़ा एक हल्के से शोर के साथ वापस बंद हो गया।चॉल मालिक के जाते ही कमरे में एक गहरा सन्नाटा पसर गया।सिमरन का पूरा बदन इस वक्त बुरी तरह थक चुका था। उसके पैर कांप रहे थे और **** का जर्रा-जर्रा इस नए और तीखे अनुभव के असर से तप रहा था। उसने अपनी बची-कुची ताकत समेटी और हांफते हुए बिस्तर पर पूरी तरह ढह गई। उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी, और उसके मुँह से गर्म सांसें निकल रही थीं।

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चॉल मालिक ने मसले चूतड़
कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था और चॉल का सारा शोरगुल इस बंद कमरे की दीवारों से टकराकर बाहर ही थम गया था। आज का दिन सिमरन के लिए बेहद खास था। आज वह पूरे 18 साल की हो गई थी। उम्र का यह पड़ाव उसके लिए सिर्फ एक संख्या का बदलना नहीं था, बल्कि एक नई शुरुआत थी। चॉल की संकरी गलियों में लोग उसे 'सिमरन भाई' के नाम से जानते थे। वही कड़क अंदाज़, ढीला-ढाला कुर्ता और चेहरे पर एक सख्त मुखौटा, जिसे देखकर बड़े-बड़ों की हिम्मत जवाब दे जाती थी। लेकिन इस वक्त, इस बंद कमरे के एकांत में, आईने के ठीक सामने वह कोई 'भाई' नहीं थी। यहाँ वह सिर्फ एक लड़की थी, जो अपने वजूद और अपनी बदलती काया से रूबरू हो रही थी। उसने अपने बदन से कपड़ों को अलग कर दिया और आईने के बिल्कुल सामने जाकर खड़ी हो गई। कमरे की मद्धम रोशनी में उसका अक्स साफ दिखाई दे रहा था। सिमरन ने अपनी नज़रें खुद पर टिका दीं। समय के साथ उसके शरीर में आए बदलाव अब पूरी तरह निखर चुके थे। उसने अपने हाथों से अपनी ढलती काया को छुआ। अपनी पतली कमर और नीचे सुडौल ****ड़ों के भारीपन का अहसास उसे एक अलग ही खुशी दे रहा था। जब उसकी नज़रें ऊपर उठीं, तो उसने आईने में अपने उभरे हुए ****ों को देखा। उन पर मौजूद गहरे काले **** इस बात का अहसास करा रहे थे कि वह अब पूरी तरह एक वयस्क स्त्री बन चुकी है। अपनी इस नई जवानी, इस सुडौल बनावट और मुकम्मल खूबसूरती को देखकर सिमरन के होठों पर एक गहरी और आत्मसंतुष्ट मुस्कान तैर गई। जिस **** को उसने दुनिया की नज़रों से हमेशा छुपा कर रखा था, आज अपने 18वें जन्मदिन पर उसे खुद के इस रूप को देखकर अंदर से एक अजीब सी खुशी और गर्व महसूस हो रहा था। कमरे का बंद दरवाज़ा अचानक एक हल्के झटके के साथ खुला और चॉल मालिक ने अंदर कदम रखा। अचानक हुई इस दस्तक से कमरा जैसे एक पल के लिए ठहर गया। सिमरन आईने के सामने उसी अवस्था में खड़ी थी, लेकिन उसके चेहरे पर कोई घबराहट या डर नहीं आया। चॉल मालिक की नज़रें जैसे ही अंदर पड़ीं, उसकी आँखें सिमरन के खुले बदन पर टिक गईं। आईने की मद्धम रोशनी में सिमरन के ****, सुडौल ****ड़ों की सुस्पष्ट रेखाएं और उसकी ढलती जवानी का उभार साफ नजर आ रहा था। इस बेबाक और खूबसूरत मंज़र को देखकर चॉल मालिक के चेहरे पर एक गहरी, शातिर और **** मुस्कान तैर गई। उसकी आँखों की वो चमक बता रही थी कि जो 'सिमरन भाई' पूरी चॉल को अपनी उंगलियों पर नचाती है, उसका यह रूप बेहद अनमोल है। अपनी तारीफ और चॉल मालिक के चेहरे के इन भावों को देखकर सिमरन के भीतर का आत्मविश्वास और बढ़ गया। वह ज़रा भी झिझकी नहीं, बल्कि उसके चेहरे की वो आत्मसंतुष्ट मुस्कान एक टपोरी अंदाज़ में बदल गई। उसने आईने में देखते हुए अपनी कमर पर हाथ रखा, थोड़ा सा तिरछी हुई ताकि उसकी काया का उभार और साफ दिखे, और अपने उसी जाने-पहचाने कड़क और बिंदास टपोरी स्टाइल में हंसते हुए बोली: "अपुन माल बन गई है रे बाप!" उसकी ज़ुबान से निकले इन शब्दों में चॉल की वही पुरानी ठसक थी, लेकिन आज उसमें एक औरत की जवानी का नशा और अपनी खूबसूरती का घमंड भी पूरी तरह शामिल था। चॉल मालिक उसकी इस बेबाकी को देखकर बस देखता ही रह गया। चॉल मालिक से अब और ज़ब्त नहीं हुआ। सिमरन के उस बेबाक अंदाज़ और उसकी सुडौल काया के आकर्षण ने उसके भीतर की कशिश को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया था। उसने बिना एक पल गंवाए आगे बढ़कर अपने दोनों भारी हाथ सिमरन के **** और गद्देदार ****ड़ों पर जमा दिए। जैसे ही उसके हाथों ने उन सुडौल रेखाओं को अपनी गिरफ्त में लेकर धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया, कमरे की हवा में एक अजीब सी गर्मी घुल गई। 'सिमरन भाई' जिसके नाम से पूरी चॉल थर-थर कांपती थी, इस वक्त चॉल मालिक के इस छुअन का पूरा लुत्फ़ उठा रही थी। उसके चेहरे पर डर या गुस्से का कोई नामोनिशान नहीं था, बल्कि उसके होठों पर एक गहरी, मदहोश कर देने वाली मुस्कान और चौड़ी हो गई। अपनी जवानी के इस नए अहसास और चॉल मालिक की बेताबी ने उसे एक अलग ही किस्म का मज़ा दे दिया था। उसने आईने में चॉल मालिक की आँखों में आँखें डालीं और मुस्कुराते हुए धीरे-धीरे आगे की तरफ झुक गई। उसके इस तरह झुकते ही उसकी कमर का कर्व और गहरा हो गया, और उसके ****ड़ों का उभार चॉल मालिक के हाथों में और ज़्यादा कस गया। सिमरन का यह अंदाज़ साफ बयां कर रहा था कि आज वह अपने 18वें जन्मदिन पर 'भाई' का मुखौटा पूरी तरह उतारकर अपनी इस नई जवानी के खेल को अपनी शर्तों पर खेलने के लिए तैयार थी। चॉल मालिक के हाथों की कशिश अब और बढ़ चुकी थी। सिमरन के झुकते ही उसने अपनी उंगलियों की पकड़ को और मज़बूत किया और उसके सुडौल ****ड़ों के दोनों हिस्सों को धीरे-धीरे बाहर की तरफ फैलाना शुरू कर दिया। इस हरकत से सिमरन के नितम्बों के बीच की गहरी, संवेदनशील रेखाएं पूरी तरह खुलने लगीं और कमरे की मद्धम रोशनी में उसकी काया का सबसे **** चॉल मालिक के सामने बेपर्दा होने लगा। अपनी जवानी के इस पहले दिन, इस तरह के तीखे और सीधे स्पर्श ने सिमरन के भीतर एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी थी। वह दर्द या हिचक के बजाय एक गहरे, अनजाने आनंद से भर उठी। चॉल मालिक जैसे-जैसे उन रेखाओं को खोलकर सहला रहा था, सिमरन के चेहरे की मुस्कान और गहरी होती जा रही थी। उसे इस बात की बेहद खुशी थी कि जिस बदन को उसने आज तक एक सख्त लिबास में छुपा कर रखा था, वह आज किसी को इस कदर दीवाना बना रहा था। वह आँखें बंद किए उस छुअन को महसूस कर रही थी और मन ही मन अपनी इस नई वयस्क पहचान और अपनी काया के इस असर का पूरा लुत्फ़ उठा रही थी।

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